मैं ताजगंज हूं। दुनिया को अपने सौंदर्य पर रिझाने वाले ताज के संगमरमरी हुस्न पर इठलाता और इतराता। ताजमहल शहंशाह शाहजहां और मुमताज की रूहानी मोहब्बत की दास्तां सुनाता है तो मेरे पास भी उसे तराशने वालों के अनगिनत किस्से हैं। मेरी गली-कूचों में आज भी वो फनकार बसते हैं, जिनके फन के कद्रदानों की कमी नहीं। मकराना की खानों से आए संगमरमर से ताज सजा तो वर्षों बाद मेरा आंगन भी लाल बलुई पत्थर (रेड सैंड स्टोन) से अलंकृत हो उठा। ग्रेनाइट और रेड सैंड स्टोन की सड़कें, मुगलकालीन जाली वर्क की नुमाइंदगी करतीं स्टोन पिलर लाइटें और एक रंग में रंगे मकान मुझे खास अनुभव कराते हैं। अब तो ताज के मुरीद भी मेरे इस रूप पर वाह-वाह कर उठते हैं। कभी मुहल्ला कहे जाने वाले ताजगंज के इसी खूबसूरत सफर की रिपोर्ट।

आगरा, निर्लोष कुमार। ताज के समान अपने सौंदर्य पर ताजगंज आज भले ही इतराता हो, मगर कुछ वर्ष पहले तक यह ऐसा नहीं था। ताजमहल से जुड़ा क्षेत्र एक मुहल्ले की तरह था। सिल्ट से अटी नालियों से उठती दुर्गंध पर्यटकों को परेशान करती थी। शाम ढलते ही सड़कों पर अंधेरा पसरने लगता था। झूलते हुए तार सिर से टकराते थे, अतिक्रमण से निकलना मुश्किल था। कुछ सड़कें तो ठीक थीं, लेकिन गलियों की पूछिए मत। अब ऐसा नहीं है। यहां की सड़कें चमाचम हैं। ग्रेनाइट और रेड सैंड स्टोन को तराश कर बने कोबल स्टोन (समान आकार के पत्थर) की बनी सड़कें हर आने वाले का पार्किंग से स्वागत करती नजर आती हैं। रोड के किनारे बने पाथवे पर लगीं स्टोन पिलर लाइट के तो कहने ही क्या? यह भले ही अब लगी हों, लेकिन हर आने-जाने वाले को मुगलिया दौर में ले जाती हैं। इन पर किया गया जाली वर्क देखते ही बनता है। शाम ढलते ही जब यह रोशन होती हैं तो हर कोई इन पर मुग्ध हो उठता है। झिलमिलाती लाइटों के बीच पर्यटक इवनिंग वॉक करते दिखते हैं। कभी सिर से टकराने वाले तार अब डक्ट में भूमिगत हो चुके हैं।

एक रंग में रंगे हैं मकान

ताजगंज में पूर्वी गेट स्थित शिल्पग्राम से लेकर पश्चिमी गेट पर नीम तिराहा तक मार्ग में पडऩे वाले सभी मकान एक ही रंग में रंगे गए हैं। ताजगंज में सड़कों, पाथवे और स्टोन पिलर लाइटों में रेड सैंड स्टोन लगा है, इसलिए मकानों पर भी उनसे मिलता-जुलता हल्का गुलाबी रंग सरकार द्वारा कराया गया था। यह हमें गुलाबी नगरी जयपुर की याद दिलाता है। दुकानों पर लगे साइनेज भी एकसमान बने हुए हैं।

रास्ते बताते हैं इतिहास

शिल्पग्राम से ताज पूर्वी गेट जाने वाले रास्ते पर मार्ग के दोनों ओर आगरा के लोगो बने हुए हैं। अंग्रेजी एल्फाबेट 'ए' में ताज के गुंबद को मिलाकर बनाए गए लोगो पर्यटकों को आकर्षित तो करते ही हैं, उन पर उकेरा गया ताज से जुड़ा इतिहास उन्हें जानकारी देता है। ताज के रास्तों पर साइनेज भी रेड सैंड स्टोन के बने हुए लगे हैं।

और बदल गई तस्वीर

वर्ष 2012 में ताजमहल और ताजगंज में सुंदरीकरण को 197.2 करोड़ रुपये से ताजगंज प्रोजेक्ट की योजना बनी। सुप्रीम कोर्ट से अनुमति मिलने के बाद वर्ष 2014 में यहां काम शुरू हुआ। नवंबर, 2016 में प्रोजेक्ट पूरा होते ही क्षेत्र की तस्वीर बदल गई।

अभी और स्मार्ट होगा ताजगंज

स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट में ताजगंज में भी काम होना है। इसमें पेड़ों पर आकर्षक लाइटिंग की जानी है। काम होने के बाद शाम ढलते ही ताजगंज का नजारा देखने वाला होगा।

यहीं बसे थे ताज बनाने वाले

ताजमहल का निर्माण वर्ष 1632 से 1648 के दौरान हुआ। मुख्य मकबरा इस दरम्यान बना और बाद में अन्य स्मारक बनते गए। ताज बनाने वाले मजदूर ताजगंज में ही बसे थे। ताजगंज में चार कटरे, कटरा फुलेल, कटरा रेशम, कटरा जोगीदास और कटरा उमर खां बने हुए हैं। यह मुगलकालीन हैं, जिसकी पुष्टि यहां बने चारों गेट करते हैं। ताज का रखरखाव करने वाले लोग यहीं रहा करते थे।

ताजमहल के नाम पर हुआ नामकरण

एप्रूव्ड टूरिस्ट गाइड एसोसिएशन के अध्यक्ष शमसुद्दीन बताते हैं कि ताजगंज का नामकरण ताजमहल के नाम पर ही हुआ है। शुरुआत में ताजमहल 'रोजा-ए-मुनव्वरा' के नाम से जाना जाता था। बाद में यह मुमताज महल का मकबरा के नाम से प्रसिद्ध हुआ। अब यह ताजमहल के नाम से प्रसिद्ध है।

Posted By: Prateek Gupta

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