आगरा, जागरण संवाददाता। महामारी के दौर जब लोग घरों से बाहर निकलने में भी डर रहे हैं। कोरोना संक्रमितों के पास जाने में उनके अपने ही जाने में घबरा रहे हैं। ऐसे में सांस और आस के बीच तमाम चालक उम्मीद की एंबुलेंस दौड़ा रहे हैं। वह महामारी से जूझते लोगों की अग्रिम पंक्ति में रहकर मदद कर रहे हैं। इन्हींं चालकों में एक नाम राजकुमार का है। वह कोरोना संक्रमित मरीजों को घरों से अस्पताल पहुंचा रहे हैं। संक्रमित की मौत होने पर उसके अपने शव को हाथ लगाने से परहेज कर रहे हैं, एंबुलेंस चालक आगे बढ़कर मदद कर रहे हैं। शव को अपने हाथों से एंबुलेंस में रखकर शमशान घाट तक ले जा रहे हैं। राजकुमार ने कोरोना संक्रमितों की मदद की खातिर खुद को परिवार से आइसोलेट कर लिया है। वह अब तक कई सौ कोरोना संक्रमितों को अपनी एंबुलेंस से अस्पताल ले जाकर भर्ती करा चुके हैं।
सदर के सेवला जाट के रहने वाले 35 वर्षीय राजकुमार के परिवार में पत्नी मटरो के अलावा तीन बेटी और एक बेटा है। बड़ी बेटी 14 साल और छोटी तीन साल की है। राजकुमार कहते हैं वह कई साल से एंबुलेंस चला रहे हैं। मगर, पिछले एक साल में महामारी ने काफी कुछ बदल दिया है। ऐसे में उनके सामने भी एंबुलेंस से मरीजों और शवाें को ले जाने की चुनौती थी। खुद के साथ ही परिवार को भी इस महामारी से सुरक्षित रखना था। उन्होंने करीब तीन सप्ताह पहले खुद को परिवार से पूरी तरह अलग कर लिया। एक ही घर में रहने के दौरान वह परिवार के लोगों से नहीं मिलते हैं।
वह घर में छत पर बने कमरे में रह रहे हैं। अपना खाना-पीना, बर्तन और कपड़े सब अलग कर लिए हैं। बर्तन और कपड़े खुद ही धोते हैं। पत्नी और बच्चों को कह अपने पास नहीं आने की हिदायत दे रखी है। तीन साल की छोटी बेटी उनसे काफी घुलीमिली है। मगर, तीन सप्ताह से उसे गोद में लेकर नहीं खिलाया है। पत्नी और बच्चों की दूर से ही कुशलता ले लेते हैं। पहले बच्चे पास आने की जिद करते थे। मगर, उन्हें समझाया कि दूरी उनकी सुरक्षा के लिए है तो वह मान गए।
राजकुमार बताते हैं कि वह सुबह छह बजे घर से निकलने के बाद साढ़े छह बजे एंबुलेंस पर आ जाते हैं। एहतियात के तौर पर वह किट के साथ ही मास्क और ग्लब्स लगातार पहनकर रखते हैं। सुबह सात से दस बजे के दौरान उन्हें शवों को शमशान घाट तक लेकर जाना होता है। इनमें कोरोना संक्रमण के चलते मरने वाले भी होते हैं। कई बार तो ऐसा भी हुआ कि शव को हाथ लगाने में उसके अपने ही घबरा रहे थे। उन्होंने खुद आगे बढ़कर शव को एंबुलेंस में रखा और शमशान घाट लेकर गए।
वहीं 11 बजे से दोपहर तीन बजे तक कोरोना संक्रमित मरीजों को घरों से अस्पताल तक पहुंचाने का काम करते हैं। कई बार ऐसा होता है कि किसी मरीज में कोरोना संक्रमण की पुष्टि होने पर उसके स्वजन एंबुलेंस में बैठाने से भी घबराते हैं। ऐसे में उन्हें ही आगे बढ़कर मरीज की मदद करनी पड़ती है। उसे गाड़ी में बैठाने से लेकर अस्पताल के अंदर तक पहुंचाना होता है।
लोगों की कृतज्ञता जताती आंखें देती हैं हौसला
राजकुमार कहते हैं कोराेना संक्रमितों की मदद करने पर उनके स्वजन की कृतज्ञता जताती आंखें उन्हें हौसला देती हैं। अपने मरीज को लेकर चिंतित परिवार उसे अस्पताल तक पहुंचाने पर जिस तरह से धन्यवाद देता है, उसे शब्दों में बयां करना मुश्किल है। यह सब उन्हें महामारी की मुसीबत में फंसे लोगों की मदद करने की प्रेरणा देता है।









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