जागरण संवाददाता, आगरा: हम पढ़े लिखे हैं। हमें पानी की कीमत पता है, लेकिन इसके बाद भी हम कभी नल खुला छोड़ देते हैं, तो कभी शेविंग के दौरान पानी बहाते हैं। कार को सबमर्सिबल के पंप से धोते हैं, तो कभी टंकी भरने के बाद उसे बंद करना भूल जाते हैं। यह ऐसी छोटी बातें हैं, अगर इनका ख्याल रखा जाए, तो हर दिन एक व्यक्ति कई लीटर पानी बचा सकता है। अगर पूरे शहर की बात की जाए, तो लाखों लीटर पानी बर्बाद होने से बचाया जा सकता है। इससे तेजी से गिरते भूगर्भ जल पर भी अंकुश लग सकता है।

आगरा शहर की आबादी करीब 20 लाख है। आकड़ों के अनुसार एक व्यक्ति को 35 लीटर पानी उपलब्ध हो पाता है। इसमें औसतन 12 लीटर पानी पीने के काम में आता है, जबकि एक बार शौच के लिए जाने पर फ्लश चलाने पर सात लीटर पानी खर्च होता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के मानकों के अनुसार आगरा में पानी की उपलब्धता बहुत ही कम है। एक व्यक्ति को एक दिन में 150 लीटर पानी मिलना चाहिए, लेकिन जिस तरीके से यहां भूगर्भ जल तेजी से कम हो रहा है। उसे देखते हुए यह संभव नहीं लग रहा है। आने वाले दिनों में किल्लत और भी बढ़ सकती है। पानी की बर्बादी सालभर होती है, जिसे रोकने में जल संस्थान पूरी तरह से नाकाम है। कार्रवाई के नाम पर रस्म अदायगी होती है।

220 करोड़ रुपये की है बकायेदारी

जीवनी मंडी और एमबीबीआर प्लांट से हर दिन 300 एमएलडी पानी की आपूर्ति होती है। इसमें छावनी परिषद सहित अन्य को जीवनी मंडी से पानी मिलता है। जल संस्थान द्वारा जल का प्रयोग किए जाने के बाद निर्धारित टैक्स लिया जाता है। इसके लिए मीटर लगाए जाने चाहिए, लेकिन वर्तमान में बिना मीटर के काम चलाया जा रहा है। पानी के प्रयोग के बाद लोगों को चाहिए कि वे टैक्स जमा करें, लेकिन ऐसा नहीं किया जा रहा है। दो लाख लोगों पर 220 करोड़ रुपये की बकायेदारी है। जिसकी वसूली के हर संभव प्रयास किए जा रहे हैं।

नहीं हैं संसाधन

संस्थान के पास संसाधनों का अभाव है। हाल यह है कि कर्मचारियों के सेवानिवृत्त होने के छह माह या फिर एक साल के बाद फंड सहित अन्य का भुगतान होता है।

आरओ प्लांट पर नहीं है किसी का जोर

शहर में पानी का कारोबार तेजी से बढ़ता जा रहा है। खाद्य सुरक्षा एवं औषधि प्रशासन द्वारा आरओ प्लांट पर छापे मारे जाते हैं, लेकिन ठोस कार्रवाई नहीं की जाती है। न ही जिला प्रशासन द्वारा बिना अनुमति के चल रहे आरओ प्लांट को बंद कराया जाता है। हाल यह है कि आरओ प्लांट का संचालन घरों से किया जा रहा है। सबमर्सिबल के पानी को ट्रीट किया जाता है। विशेषज्ञों के अनुसार शहर में एक हजार से अधिक आरओ प्लांट हैं। इनकी संख्या तेजी से बढ़ती जा रही है। करोड़ों रुपये का पानी का कारोबार है। 80 फीसद प्लांटों में पानी को ट्रीट करने के बाद नालियों में बहा दिया जाता है। 70 फीसद पानी बर्बाद चला जाता है। पानी को बचाने के लिए कोई इंतजाम नहीं किए जाते हैं। सिर्फ बैठकों तक दिशा-निर्देश सीमित रहते हैं।

जागरूकता की मुहिम पर नहीं है ध्यान

नगर निगम हो या फिर जल संस्थान अथवा अन्य सरकारी विभाग। बारिश के पानी को बचाने के लिए जागरूकता की मुहिम पर ध्यान नहीं देते हैं। यही वजह है कि अरबों लीटर पानी बर्बाद हो जाता है। अगर पानी को बचाने का प्रयास किया जाए, तो इससे न सिर्फ भूगर्भ जल बढ़ेगा बल्कि पानी की जरूरत भी पूरी होगी। पानी के लिए परेशान नहीं होना पड़ेगा।

By Jagran