आगरा को बंदरों के उत्पात से मिलेगी निजात, वन्यजीव संस्थान बनाएगा कार्य योजना
आगरा में बंदरों के बढ़ते उत्पात से निजात दिलाने के लिए भारतीय वन्यजीव संस्थान (डब्ल्यूआइआइ) देहरादून एक नई कार्य योजना ...और पढ़ें

ताजमहल के पास से पकड़े गए बंदर।
जागरण संवाददाता, आगरा। वन विभाग हो या फिर नगर निगम। बंदरों को पकड़ने का पुराना तरीका अपनाता है। पिंजरा लगाया जाता है और उसमें खाना रख दिया जाता है। कुछ बंदर फंसते हैं तो बाकी भाग जाते हैं। जिस तरीके से बंदरों के उत्पात पर अंकुश लगना चाहिए। वह नहीं हो पाता है। जिसे देखते हुए अब भारतीय वन्यजीव संस्थान (डब्ल्यूआइआइ) देहरादून कार्य योजना बनाएगा।
बंदरों को पकड़ने में पहली बार तकनीक का भी सहारा लिया जाएगा। शहर में 500 से अधिक बंदरों के झुंड हैं और इनकी संख्या डेढ़ लाख के आसपास है। अल्फा श्रेणी के बंदर सबसे खतरनाक श्रेणी में शामिल हैं। इनकी संख्या 30 हजार से अधिक है।
नगर निगम और कलक्ट्रेट में बंदरों की हर दिन पांच से सात शिकायतें पहुंचती हैं। जिला अस्पताल में इससे कहीं अधिक लोग एंटी रैबीज इंजेक्शन लगवाने के लिए पहुंचते हैं। बंदरों को पकड़ने की जिम्मेदारी वन विभाग के पास थी लेकिन छह माह पूर्व यह कार्य नगर निगम को मिल गया था। निगम की टीम ने 500 बंदरों को पकड़ वैक्सीनेशन किया है।
नगर निगम के पशु कल्याण अधिकारी डा. अजय कुमार सिंह ने बताया कि हाई कोर्ट के आदेश के बाद बंदरों को पकड़ने की जिम्मेदारी वन विभाग की है। शासन के आदेश पर अब भारतीय वन्यजीव संस्थान, देहरादून से बंदरों को पकड़ने की कार्य योजना बन रही है। इसमें एक से दो माह का समय लगेगा। जल्द ही टीम आगरा भी आ सकती है।
नहीं बने हैं खाना खिलाने के केंद्र
नगर निगम प्रशासन को शहर में खाना खिलाने के केंद्र बनाने थे लेकिन यह कार्य अभी तक नहीं हुआ है। लोग अपने हिसाब से कहीं भी बंदरों को खाना खिलाते हैं।
एक करोड़ रुपये से अधिक हो चुके हैं खर्च
शहर में सबसे पहले बंदरों को पकड़ने की जिम्मेदारी वाइल्ड लाइफ एसओएस को मिली थी। यह कार्य तत्कालीन मंडलायुक्त प्रदीप भटनागर के कार्यकाल में हुआ था। एक हजार बंदरों की नसबंदी के बाद संबंधित क्षेत्र में छोड़ दिया गया था। इससे पूर्व 500 बंदरों को शहर से बाहर छोड़ा गया था।
