साम्राज्य नहीं रहा, सदियों से चली आ रही चौहान वंश की परंपरा, क्वार की नवमी पर गद्दी पर विराजते हैं राजा
आगरा के खंदौली ब्लॉक के बमान गांव में चौहान वंश की सदियों पुरानी परंपरा आज भी जीवित है, जहाँ शारदीय ...और पढ़ें

खंदौली के बमान में कुलदेवी आशापूर्णा माई का मंदिर।
गजेंद्र शर्मा, (खंदौली) आगरा। इतिहास के पन्नों में राजाओं के साम्राज्य भले ही सिमट गए हों, लेकिन उनकी परंपराएं आज भी लोगों की आस्था और विरासत को जीवंत रखे हुए हैं। आगरा जिले के खंदौली ब्लॉक के बमान गांव में चौहान वंश की ऐसी ही ऐतिहासिक परंपरा आज भी पूरी श्रद्धा के साथ निभाई जा रही है।
यहां क्वार की शारदीय नवरात्रि की नवमी पर चौहान वंश के वंशज राजा ज्वाला प्रसाद सिंह परंपरागत रूप से गद्दी पर विराजमान होते हैं। इससे पहले वह नौ दिनों तक व्रत रखकर कुलदेवी आशापूर्णा माई की विधि-विधान से पूजा-अर्चना करते हैं। कुलदेवी के दर्शन और पूजन के बाद गद्दी पर बैठने की परंपरा सदियों से चली आ रही है।
इस अवसर पर आसपास के गांवों के साथ-साथ देश-विदेश में रह रहे चौहान वंश से जुड़े परिवार भी कुलदेवी के मंदिर पहुंचकर दर्शन करते हैं। यहां लगने वाला मेला केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि चौहान वंश के इतिहास, सामाजिक एकता और पारिवारिक विरासत का प्रतीक भी है।
राजस्थान के नीमराना से मथुरा होते हुए बमान तक पहुंचा चौहान वंश
चौहान वंश की वंश परंपरा के अनुसार, इनके पूर्वज राजस्थान के नीमराना क्षेत्र से निकलकर मथुरा और आगरा की सीमा पर यमुना किनारे बसे मादौर गांव पहुंचे थे। यहां कुलदेवी आशापूर्णा देवी की प्रतिमा स्थापित की गई। मान्यता है कि मादौर में प्रवास के बाद चौहान वंश के पूर्वज आगरा जिले के खंदौली ब्लॉक के मुड़ी गांव आए। इसके बाद बमान गांव में अपनी राजधानी स्थापित कर आसपास के क्षेत्र में अपना शासन चलाया।
बमान में भी चौहान वंश ने अपनी आराध्य कुलदेवी आशापूर्णा माई की स्थापना की। समय के साथ यह स्थान वंश की आस्था और परंपरा का प्रमुख केंद्र बन गया। आज भी यहां कुलदेवी के प्रति लोगों की गहरी श्रद्धा है। वंश से जुड़े परिवार किसी भी शुभ कार्य में कुलदेवी का स्मरण करना नहीं भूलते।
पृथ्वीराज चौहान की विरासत से जुड़ी वंश परंपरा
चौहान वंश का इतिहास भारत के मध्यकालीन इतिहास में महत्वपूर्ण स्थान रखता है। पृथ्वीराज चौहान का शासन अजमेर और दिल्ली से जुड़ा रहा। वर्ष 1192 में तराइन के दूसरे युद्ध के बाद उत्तर भारत की राजनीतिक परिस्थितियों में बड़ा बदलाव आया। बमान के चौहान वंश से जुड़ी पारिवारिक मान्यताओं के अनुसार, पृथ्वीराज चौहान के बाद उनके वंश की परंपरा आगे बढ़ाने में चौहान वंश की अन्य शाखाओं की भूमिका रही।
इसी वंश परंपरा से जुड़े पूर्वजों के राजस्थान से मथुरा और फिर आगरा क्षेत्र में आने की बात कही जाती है। स्थानीय परंपरा के मुताबिक, बमान में चौहान वंश के पूर्वजों ने अपनी सत्ता स्थापित की और यहां से आसपास के गांवों के साथ सामाजिक एवं प्रशासनिक संबंध विकसित किए।
बताया जाता है कि बमान में लगभग ढाई सौ वर्षों से इस वंश की गद्दी से जुड़ी परंपरा लगातार निभाई जा रही है। हालांकि, वंशावली और शासनकाल से जुड़े इन विवरणों की ऐतिहासिक पुष्टि के लिए पुराने दस्तावेजों एवं अभिलेखों का अध्ययन आवश्यक है।
नवमी पर गद्दी पर बैठने से पहले नौ दिन का व्रत
क्वार की नवरात्रि की नवमी बमान के चौहान वंश के लिए विशेष महत्व रखती है। इस दिन राजा ज्वाला प्रसाद सिंह परंपरागत रूप से गद्दी पर विराजमान होते हैं। इस अनुष्ठान से पहले वह पूरे नौ दिनों तक व्रत रखते हैं और कुलदेवी आशापूर्णा माई की आराधना करते हैं। नवमी के दिन विधि-विधान से पूजा-अर्चना करने और कुलदेवी के दर्शन के बाद गद्दी पर बैठते हैं।
इस दौरान उनके साथ पांच पंडितों का परंपरागत मंडल भी बैठता है। आयोजन में धार्मिक रीति-रिवाजों के साथ क्षेत्र की परंपराओं और सामाजिक विषयों पर चर्चा होती है। इस अवसर पर कुलपुरोहित पंडित भगवान दास की विशेष भूमिका रहती है। बाइसी से जुड़े लोग उनके माध्यम से परंपरागत भेंट अर्पित करते हैं।
यह आयोजन राजसी वैभव के प्रदर्शन से अधिक पूर्वजों की विरासत, कुलदेवी के प्रति आस्था और सामाजिक संबंधों को बनाए रखने का माध्यम माना जाता है।
गुरसौटी से आती है पहली भेंट, 22 खेरे के गांवों की रहती है भागीदारी
नवमी के दिन बमान में आयोजित होने वाले इस धार्मिक समारोह में क्षेत्र के अनेक गांवों के लोग शामिल होते हैं। परंपरा के अनुसार, सबसे पहली भेंट सादाबाद के गुरसौटी गांव से आती है। इसके बाद बाइसी से जुड़े अन्य गांवों के लोग कुलदेवी के दरबार में पहुंचकर अपनी श्रद्धा के अनुसार भेंट अर्पित करते हैं।
चावली, मुड़ी, रुधनू और चौकड़ा सहित कई गांवों के लोगों की इस आयोजन में भागीदारी रहती है। स्थानीय मान्यता के अनुसार, बाइसी में शामिल गांवों के लोग पीढ़ियों से इस परंपरा को निभाते आ रहे हैं। नवमी के दिन बमान में श्रद्धालुओं की आवाजाही बनी रहती है और पूरा वातावरण धार्मिक आस्था से सराबोर हो जाता है।
मुंडन संस्कार के लिए देश-विदेश से पहुंचते हैं परिवार
बमान स्थित कुलदेवी आशापूर्णा माई का मंदिर चौहान वंश के लोगों के लिए विशेष धार्मिक महत्व रखता है। इस वंश से जुड़े परिवार देश के अलग-अलग हिस्सों के साथ विदेशों में भी रहते हैं, लेकिन कुलदेवी के प्रति उनकी आस्था उन्हें अपनी जड़ों से जोड़े रखती है।
परिवारों में बच्चों के मुंडन संस्कार सहित अन्य धार्मिक कार्यों के लिए भी कुलदेवी के मंदिर पहुंचने की परंपरा है। नवरात्रि की नवमी पर यहां विशेष मेला लगता है, जिसमें दूर-दराज से लोग शामिल होते हैं। इस अवसर पर पुरानी पीढ़ी नई पीढ़ी को अपने वंश के इतिहास, कुलदेवी की महिमा और पूर्वजों से जुड़ी परंपराओं के बारे में बताती है।
आस्था, इतिहास और सामाजिक एकता का प्रतीक है बमान की गद्दी
बमान में क्वार की नवमी पर आयोजित होने वाला यह समारोह क्षेत्र की सांस्कृतिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा है। बदलते समय के साथ जीवनशैली और सामाजिक परिस्थितियों में भले ही बदलाव आया हो, लेकिन कुलदेवी की पूजा, गद्दी पर विराजने और बाइसी के गांवों की सहभागिता जैसी परंपराएं आज भी लोगों को एक सूत्र में बांधती हैं।
बमान की यह परंपरा बताती है कि किसी वंश की पहचान केवल उसके अतीत से नहीं, बल्कि उन संस्कारों से भी बनती है जिन्हें उसकी आने वाली पीढ़ियां श्रद्धा के साथ आगे बढ़ाती हैं। कुलदेवी आशापूर्णा माई का दरबार आज भी चौहान वंश के लोगों के लिए आस्था, एकजुटता और अपनी जड़ों से जुड़े रहने का प्रमुख केंद्र बना हुआ है।
