मैं रोया परदेस में, भीगा मां का प्यार। दुख ने दुख से बात की, बिन चिट्टी बिन तार।

छोटा करके देखिए, जीवन का विस्तार। आंखों भर आकाश है, बांहों भर संसार।

आगरा, अली अब्बास। मां-बेटे के रिश्ते को बयां करती गीतकार और शायर निदा फाजली की यह पंक्तियां राजकीय शिशु गृह में आठ महीने से मां की गोद का इंतजार करते अबोध बालक सही साबित होती हैं। फर्क बस इतना है कि जन्म देने के बाद एक मां उसे जंगल में कांटों पर छोड़कर चली गई थी। वहीं उसे यशोदा की मूरत में गोद लेने आई मां ममता की छांव देने को आतुर थी। उसके रोने से इस मां की आंखों से आंसू छलक रहे थे। उसे चुप कराने को व्याकुल हो रही थी। आठ महीने के अबोध गोद में लेते ही उसे सीने से लगाया तो चुप हो गया। मां की आंखों से आंसू अब भी छलक रहे थे, लेकिन ये खुशी के थे।

उत्तर प्रदेश के एक जिले के रहने वाले ट्रांसपोर्ट व्यवसाई की शादी को 20 साल हो चुके थे। उनकी पत्नी प्राथमिक विद्यालय में शिक्षिका हैं। संतान के लिए दंपती सभी बड़े डाक्टरों को दिखा चुके थे। गुरुद्वारे से लेकर मंदिर और दरगाह तक शायद ही कोई ऐसा दर बचा हो जहां आंगन में किलकारी गूंजने के लिए प्रार्थना न की हो। दंपती ने दो साल पहले बच्चे को गोद लेने का फैसला किया। उन्होंने केंद्रीय दत्तक अधिग्रहण संस्थान प्राधिकरण (कारा) के माध्यम से आवेदन किया। बच्चे को गोद लेने के लिए आगरा के राजकीय शिशु एवं बाल गृह काे चुना।

इधर, शिशु गृह में बालक जब भी रोता तो वहां रहने वाली बालिकाएं उसे यही कहकर चुप करातीं कि मां आएगी और तुम्हें ले जाएगी। मगर, उसे गोद लेने वाली मां कब आएगी, यह चुप करने वाली बहनें नहीं जानती थीं। उन्हें इतना यकीन था कि छोटे भाई की मां एक दिन जरूर आएगी। करीब एक महीने पहले ट्रांसपोर्टर उनकी शिक्षिका पत्नी की अबोध से मैचिंग हुई। शिक्षिका ने अबोध को वीडियो काल के माध्यय से पहली बार देखा। उसे रोते देखकर शिक्षिका का मन अंदर से व्याकुल हो गया। ठीक वैसे ही जैसे कि एक मां अपने बेटे के रोने पर बेचैन हो उठती है। दूसरी बार वीडियाे काल की, तो अबोध का मुस्कुराता हुआ चेहरा दिखाई दिया। पति-पत्नी इसके बाद पिछले महीने राजकीय शिशु एवं बाल गृह आगरा पहुंचे। उन्होंने अबोध को गोद लेने से संबंधित प्रक्रिया पूरी करने की जानकारी ली। चार दिन पहले पति-पत्नी शिशु गृह पहुंचे। उसे गोद लेने की प्रक्रिया पूरी करके अपने साथ ले गए।

मां के साथ बाबा-मौसी और बहन समेत आए थे दस लोग

अबोध को गोद लेने के लिए मां और पिता अकेले नहीं आए थे। उनके साथ अबाेध के बाबा, चाचा, मौसी-मौसा और छोटी बहन सभी आए थे। मां के अलावा यह सब भी बालक को बारी-बारी से गोद में लेकर दुलार रहे थे।

अपनों के बीच जाकर खिल उठा फूल

आठ महीने का अबोध मां-बाप समेत पूरे परिवार के बीच जाकर फूल की तरह खिल उठा। गोद लेने वाले माता-पिता ने उसका फाेटो भेजा इसमें वह बहुत सुंदर नजर आ रहा था। बुरी नजर से बचाने के लिए मां ने उसे काला टीका लगा रखा था।

सिकंदरा हाईवे किनारे कंटीली झाड़ियों में मिला था

पिछले वर्ष अक्टूबर में सिकंदरा हाईवे पर रुनकता की झाड़ियों में नवजात बालक मिला था। उसे कंटीली झाड़ियों के बीच में कोई फेंक गया था। इससे उसके शरीर पर खरोंच के निशान भी आ गए थे। वहां से गुजरती एक नर्स को उसके रोने की आवाज सुनाई दी। वह नवजात को अपने साथ ले आई। इसकी सूचना पुलिस को दी। नवजात को चाइल्ड लाइन के माध्यम से राजकीय शिशु गृह में आश्रय दिया गया था। कानूनी प्रक्रिया के बाद उसे स्वतंत्र घोषित करने के बाद उसकी डिटेल केंद्रीय दत्तक अधिग्रहण संस्थान प्राधिकरण (कारा) की वेबसाइट पर डाली थी।

ट्रांसपोर्ट व्यवसाई और उनकी शिक्षक पत्नी ने कारा के माध्यम से बच्चे को गोद लेने के लिए आवेदन किया था। दंपती मैचिंग के बाद आठ महीने अबोध को गोद लेने की प्रक्रिया पूरी करके उसे अपने साथ ले गए।

विकास कुमार, अधीक्षक राजकीय शिशु एवं बाल गृह

 

Edited By: Prateek Gupta