आगरा, निर्लोष कुमार। मैनपुरी में खेत के समतलीकरण में मिले प्राचीन हथियार योद्धाओं के हैं। हथियारों पर बने निशान इस बात पर मुहर लगा रहे हैं। इस तरह के निशान हथियारों के आपस में टकराने पर बनते हैं। इनमें एक मीटर लंबी तलवार (एंटीना सोर्ड) और चार धार वाला भाला (फोर एज्ड बार्ब्ड स्फियर हैड) बहुत खास हैं। इससे पूर्व इस तरह के हथियार कहीं और नहीं मिले हैं। इन ताम्र निधियों के 3800 से 4000 वर्ष पुराना होने का अनुमान लगाया जा रहा है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआइ) द्वारा ताम्र निधियों के डाक्यूमेंटेशन का काम किया जा रहा है।

मैनपुरी में कुरावली के गणेशपुर में बहादुर सिंह फौजी के खेत में टीले के समतलीकरण के दौरान तांबे से बने प्राचीन शस्त्रों का जखीरा मिला था। इनमें तलवारें, भाले और मानवाकृतियां शामिल हैं। खेत से मिलीं 77 ताम्र निधियों को एएसआइ की टीम आगरा ले आई थी। बाद में खेत में नौ दिन तक अन्य पुरावशेषों की तलाश को खोदाई की गई थी। इसमें गेरुए मृद्भांड (ओसीपी) के टुकड़े मिले थे।

इन्हें भी आगरा लाया गया है। इनमें करीब एक मीटर लंबी दोधारी तलवार खास है। इससे पूर्व 50-60 सेमी लंबी तलवारें मिलती रही हैं, जिससे इस तलवार को इस्तेमाल करने वाले योद्धा के युद्धकला में काफी पारंगत होने का अनुमान लगाया जा रहा है। इसी तरह चार धार वाला भाला (फोर एज्ड बार्ब्ड स्फियर हैड) भी उस समय की हथियार कला की अनुपम निशानी माना जा रहा है। इस तरह का भाला इससे पूर्व कहीं नहीं मिला है। इन हथियारों का इस्तेमाल आम आदमियों द्वारा नहीं, बल्कि योद्धाओं द्वारा किया जाता था।

अधीक्षण पुरातत्वविद् डा. राजकुमार पटेल ने बताया कि हथियारों पर जिस तरह के निशान हैं, उनसे यही प्रतीत होता है कि इनका इस्तेमाल योद्धाओं द्वारा किया जाता होगा। शिकार में इस्तेमाल होने वाले हथियारों पर इस तरह के निशान नहीं होते हैं। ताम्र निधियों का डाक्यूमेंटेशन किया जा रहा है। इसके बाद इन्हें सफाई के लिए रसायन शाखा को भेजा जाएगा।

तलवारों व भालों पर बने हुए हैं हुक

तलवारों पर नीचे की तरफ हुक बने हुए हैं। किसी तलवार में यह बाईं तरफ ताे किसी में दाईं तरफ हैं। इससे यह अंदाजा लगाया जा रहा है कि योद्धा द्वारा बाएं या दाएं हाथ का इस्तेमाल करने के हिसाब से इन्हें बनाया जाता होगा। भालों में भी नीचे की तरफ हुक बने हुए हैं। एक भाले में रिंग के लिए छेद भी बना हुआ है, जिससे उसे फिक्स किया जाता होगा।

उन्नत कोटि की निर्माण कला

एएसआइ के विशेषज्ञों का मानना है कि मैनपुरी में मिले हथियार शुरुआती काल के नहीं हैं। यह उस समय के हैं, जब हथियार निर्माण कला काफी परिष्कृत और विकसित हो चुकी थी। हथियारों को बनाने वाले इस काम में निपुण थे।

यहां भी मिले हैं तांबे के हथियार

इटावा के सैफई में करीब सात दशक पूर्व ताम्र पाषाण काल की एक तलवार मिली थी। सहारनपुर के सकतपुर में मई, 2016 में आधा दर्जन प्राचीन ताम्र कुठार मिले थे। इनकी कार्बन डेटिंग फ्लोरिडा स्थित बेटा-इनकारपोरेशन में कराई गई थी। कार्बन डेटिंग के आधार पर इसका कालक्रम ईसा से 1945 वर्ष पूर्व (करीब चार हजार वर्ष पूर्व) का साबित हुआ था। एएसआइ ने इसे गंगा घाटी की सभ्यता का माना था। 

Edited By: Prateek Gupta