आगरा, जागरण टीम। दादी-नानी के नुस्खों की गलत जानकारी आपके शिशु को बड़ी मुसीबत में डाल सकती है। खासकर आंखों में काजल लगाना और राेने से चुप कराने को जुबान पर शहद लगाना दोनों बच्चे के लिए नुकसानदेह होते हैं। चिकित्सक माताओं और परिवार के बुजुर्गों को ऐसा न करने की सलाह देते हैं। नवजात शिशु देखभाल सप्ताह के तहत इन दिनों नवजात की विशेष देखभाल को लेकर चिकित्सकों द्वारा जागरूक करने का काम किया जा रहा है।

मैनपुरी के 100 शैया अस्पताल के बाल एवं शिशु रोग विशेषज्ञ डा. डीके शाक्य का कहना है कि ज्यादातर मामलों में परिवार की महिलाओं द्वारा नवजात और शिशुओं की देखभाल की जाती है। आंखों में काजल लगाती हैं। बाजार से खरीदे गए काजल में 50 फीसद तक लेड का इस्तेमाल किया जाता है। लेड बेहद हानिकारक होता है जिसके दुष्परिणाम लंबे समय बाद दिखाई देते हैं। यह धीमा जहर होता है जो किडनी, मस्तिष्क और शरीर के बोन मैरो के अलावा अन्य अंगों को भी प्रभावित करता है। यदि इसका स्तर खून में मिल जाए तो अंगों में ऐंठन की शिकायत होने लगती है। घर में बने काजल को उंगली से लगाया जाता है। इससे भी बच्चों की आंखों में संक्रमण का खतरा बना रहता है।

100 शैया अस्पताल के चिकित्सक डा. अभिषेक दुबे का कहना है कि शिशुओं को चुप कराने के लिए कई परिवारों में शहद चटाया जाता है। असल में शहद में क्लास्ट्रीडियम नामक बैक्टीरिया होता है जो तेजी से बढ़ता है। यह एक खास तरह का टाक्सिक पदार्थ बनाता है जिसे बाट्यूलीनियम कहा जाता है। शिशुओं में रोग प्रतिरोधक क्षमता विकसित नहीं होती है। यही वजह है कि शहद चाटने वाले ज्यादातर शिशुओं को पाचन संबंधित समस्या होती है।

सिर्फ दें मां का दूध

सीएमएस डा. एके पचौरी का कहना है कि छह महीनों तक शिशुओं को सिर्फ मां का दूध ही देना चाहिए। मां के दूध में प्रोटीन होता है जो शिशु को सभी प्रकार की बीमारियों से प्रतिरोधक क्षमता प्रदान करता है।

अक्सर आते हैं ऐसे मामले

डा. डीके शाक्य का कहना है कि जिला अस्पताल में अक्सर ऐसे मामले आते हैं जिनमें बच्चों की आंखों में जलन, सूजन और पानी आने की शिकायत होती है। कई बच्चों के पेट में दर्द, पेट फूलना और असमय ही दस्त आना बड़ी समस्या है। इन मामलों में अभिभावकों को सलाह दी जाती है कि बच्चों को शहद या अन्य ऊपरी आहार न दें। काजल न लगाने की भी सलाह दी जाती है।

 

Edited By: Tanu Gupta