जागरण संवाददाता, आगरा : सहनशीलता व्यक्तित्व का सबसे उत्कृष्ट गुण है। जिस व्यक्ति में सहनशीलता नहीं वह विपरीत परिस्थितियों में टूट जाता है। जबकि प्रतिकूल परिस्थितियों सहनशील व्यक्ति को और मजबूत बनाती है। शिक्षा हो या अन्य कोई क्षेत्र सहनशील व्यक्ति को सभी पसंद करते हैं। चंदन वृक्ष की उदारता तथा सहनशीलता का अनुपम उदाहरण है। क्योंकि चंदन का वृक्ष कुल्हाड़ी से काटे जाने के बाद भी कुल्हाड़ी के साथ वातावरण को सुगंधित किए बिना नहीं रहता।

कई लोग सहिष्णुता का अर्थ कमजोरी समझ लेते हैं, यह उनकी गलत सोच है। कई लोग ईट का जवाब पत्थर से देने को आतुर रहते हैं। इससे बात खत्म होने के बजाए बढ़ती जाती है। आरोप-प्रत्यारोप का दौर शुरू होता है। जिससे तनाव होता है। सहिष्णुता के जरिए ही वातावरण को तनाव मुक्त कर सामान्य बनाया जा सकता है। हमें अपने रूख में लचीलापन रखना चाहिए न कि हठीलापन। आपने देखा होगा कि जब आंधी आती है तो देवदार के वृक्ष अकड़कर खड़े रहते हैं और ऐसे वृक्षों के टूटकर गिरने की आशंका रहती है। इसके विपरीत घास आधी चलने की दिशा की ओर झुक जाती है। इससे वह सही सलामत बची रहती है। सहिष्णुता का गुण हम प्रकृति से सीख सकते हैं। अगर हम युवा वर्ग को चरित्रवान व सहिष्णु बनाना चाहते हैं तो उन्हें भी यह सिखाना होगा कि सहिष्णुता कमजोरी नहीं, ताकत है। इससे उनके मन में दया व सहिष्णुता भाव का संचार होने लगता है। आज युवा वर्ग को संस्कार दिए जाए तो वे देश के श्रेष्ठ नागरिक बन सकते हैं। प्रथम गुरु माता होती है। मां के व्यक्तित्व का सकारात्मक व नकारात्मक दोनों ही प्रभाव बच्चों पर पड़ता है। मां अगर बच्चों को सहिष्णुता और सद्चरित्र का पाठ पढ़ाने में सफल रहे तो ऐसे बच्चे समाज के सामने श्रेष्ठ उदाहरण पेश कर सकते हैं। आज के युवावर्ग मामूली बात पर उग्र हो जाते हैं। उनकी अधिकांश समस्याएं इसी कारण हैं। लिहाजा शैक्षिक, मानसिक व व्यावहारिक चुनौतियों के लिए वह गलत रास्ते को आत्मसात कर लेते हैं। आवश्यकता है, महात्मा बुद्ध व राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के संस्कारों को जीवन में उतारने की। बच्चों में सहनशीलता का बीज बोने की तथा उनके मार्ग में आने वाली समस्याओं के लिए उन्हें तैयार करने की।

उत्तम चरित्र के निर्माण में सहनशीलता एक आधार स्तंभ है। समाज में हो रही ¨हसक घटनाएं सहनशीलता के अभाव में जन्म लेती हैं। सामाजिक व पारिवारिक मूल्यों का अभाव इसका प्रमुख कारण है। किशोर युवा सहिष्णुता के अभाव में गलत मार्ग पर भटक सकते हैं। जो भविष्य में समाज के लिए घातक सिद्ध होगी। परिवार, स्कूल तथा आज के समाज का दायित्व है कि वे बच्चों में नैतिक मूल्यों को जागृत कर उनमें मानवीय गुणों का समुचित विकास करें। मैं गांधी जी का उदाहरण देना चाहूंगा जिनकी सहनशीलता ने ब्रिटिश सरकार को नतमस्तक कर दिया। उन्होंने संपूर्ण विश्व को सहनशीलता के बल का अतुलनीय संदेश दिया। हमें सिखाया जाता रहा है कि संवदेनशीलता और सहनशीलता सफल जीवन का मूलमंत्र है। हमारे सभी प्राचीन ग्रंथ और धर्म सहनशीलता व सहिष्णुता का महत्व बताते रहे हैं, लेकिन वर्तमान में अधिकांश लोग व्यक्तिगत, सामाजिक और धार्मिक जीवन में असंवेदनशील व असहिष्णु होते जा रहे हैं। सहनशीलता मन का सबसे बड़ा उपहार है। गुरुकुल संस्कृति में विश्वास रखने वाले, हमारे भारत देश की यह विशेषता ही रही है। बालकों में बाल्यकाल से ही सहिष्णुता का विकास करना चाहिए, जिससे वे किशोरावस्था व युवावस्था में आत्म संयम न खोकर समस्याओं का आसानी से सामना कर सकें। असहिष्णु व्यक्ति कभी बलवान नहीं होता, बलवान वह है जो सहनशीलता का वस्त्र ओढ़े है। क्योंकि यही गुण हमें पशुओं से अलग करता है। यदि हम एक आदर्श समाज की परिकल्पना करते हैं तो सबसे पहले हमें सहिष्णुता को आत्मसात करना होगा। इसी की मदद से एक श्रेष्ठ राष्ट्र का निर्माण हो सकता है। तो देरी किस बात की है। कीजिए आज ही शुरुआत अपने मन व अपने घर से।

प्रस्तुति : संजय तोमर, प्रबंधक होली पब्लिक स्कूल