कहा जाता है कि धरती पर स्वर्ग अगर कहीं है तो वह कश्मीर में ही है। कश्मीर को यह उपमा दी तो गई है उसके प्राकृतिक सौंदर्य से अभिभूत होकर, लेकिन इतिहास, संस्कृति और सभ्यता की दृष्टि से भी यह कुछ कम समृद्ध नहीं है। शंकराचार्य मंदिर और हजरतबल की पवित्रता, नागिन झील व डल झील का झिलमिलाता सौंदर्य, मुगल उद्यानों का शाही अंदाज, हिमशिखरों का धवल सौंदर्य और सुकून देती आबोहवा, ये सब ऐसा सघन आमंत्रण देते हैं, जिससे इनकार कर पाना किसी के लिए संभव नहीं है। सचमुच कश्मीर घाटी इतनी सुरम्य है जो सबके मन को बांध लेने में सक्षम है। कश्मीरी भाषा में इसे ‘ऋषिवार’ कहा जाता है, जिसका अर्थ है देव भूमि। कश्मीर के उदय की कथा से भी ऐसा ही प्रतीत होता है।

एक शहर सपने सा

बचपन से सुनते आए हैं कि कश्मीर जन्नत है! यहां शालीमार का रास्ता डल झील के किनारे से गुजरता है। पहली नजर में डल झील के शिकारे और हाउसबोट के पीछे दूर नीली सिलेटी धुंध से झांकती पहाडि़यों ने ऐसा समा बांधा है, मन लाल रंग के फूलों से आकर्षित हो जाता। ऊंची दीवारों से लटकती हरी बेलें और लाल रंग के फूलों को देखकर लगेगा कि बनाने वाले ने जन्नत की खूबसूरती में चार चांद लगाने की कोशिश की होगी। शालीमार बाग खास मुगल शैली में सीढ़ीदार चरणों में बना है। इसके पीछे पहाड़ होने के कारण इसकी खूबसूरती काफी बढ़ जाती है। श्रीनगर आइए, डल के आसपास घूमिए और हाउसबोट में न रहिए ऐसा नहीं हो सकता। पानी पर संपन्न घर के ठाठ की कल्पना कभी आपने की हो तो यहां आइएगा। लंदन व एम्सटरडम में भी लोग नाव पर रहते हैं लेकिन हाउसबोट की बात ही कुछ और है।

गुलमर्ग, सोनमर्ग व पहलगाम

श्रीनगर से कुल 55 किमी दूर गुलमर्ग है। अगर गिनीज बुक ऑफ व‌र्ल्ड रिकार्ड में सबसे ज्यादा फिल्म शूटिंग वाले स्थान का मुकाबला हो तो गुलमर्ग शर्तिया सबको हरा देगा। गुलमर्ग का गोल्फ कोर्स और उसके बीचोबीच बना गिरजाघर ही यहां के मुख्य आकर्षण हैं। श्रीनगर से करीब 90 किमी दूर लेह के रास्ते में है सोनमर्ग। बड़े फैले हुए पहाड़ी ढलान और यहां से पांच किमी दूर थजवास ग्लेशियर सोनमर्ग के मुख्य आकर्षण हैं। अनंतनाग से एक या डेढ़ घंटे की दूरी पर है पहलगाम। इसके आसपास कई पिकनिक स्पॉट हैं, पर सबसे जानी-पहचानी जगह चंदनबाड़ी है। जहां से अमरनाथ की गुफा के लिए ट्रैक शुरू होता है।

नियमित हवाई उडानें

श्रीनगर पहुंचना कोई मुश्किल नहीं है। दिल्ली व चंडीगढ़ के अलावा कई शहरों से यहां के लिए सीधी उड़ाने हैं। सड़क से भी यह देश के प्रमुख महानगरों से जुड़ा हुआ है। रेलमार्ग से जम्मू तक पहुंचा जा सकता है। आगे की दूरी सड़कमार्ग से ही तय करनी होगी। ठहरने के लिए यहां सभी तरह के होटल हैं।

होटलो के अलावा यहां आने पर लोग हाउसबोट में रहना ज्यादा पसंद करते हैं। कश्मीरी भोजन में अकसर इलायची, दलाचीनी, लौंग व केसर की प्रधानता होती है। खाने के शौकीनों ने कश्मीर भले न देखा हो, पर उन्हें 36 व्यंजन वाले वाजवान के बारे में जरूर पता है। कश्मीरी आमतौर पर चावल ही खाते हैं। मटन, चिकन और मछली की भी प्रधानता देखी जाती है। चिकन-पालक और मछली-कमलककड़ी की सब्जी आम तौर पर यहां बहुत लोकप्रिय हैं। वाजवान अकसर शादियों में या बड़े समारोहों में ही परोसा जाता है। इसके अलावा अच्छी तरह बारीक गुंथा हुआ मटन रिस्ता नाम के पकवान के रूप में मिलता है और मटर के ये गोले ग्रेबी में डालकर दिए जाते हैं। परंपरागत वाजवान में आखिरी व्यंजन गुश्ताबा होता है और यह भी रिस्ते की तरह की मटन बॉल होती है। शाकाहारियों के लिए यहां दम आलू और चमन नाम की दो सब्जियां मिल सकती हैं। रोटी पसंद करने वाले शीरमाल का मजा ले सकते हैं। बकरखानी भी एक किस्म की पेस्ट्रीनुमा कश्मीरी ब्रेड होती है, जो अकसर सुबह के नाश्ते में ही खाई जाती है। पेयों में दो खास कश्मीरी पेय-कहवा और नूनचाय हैं। नूनचाय असल में गुलाबी रंग की नमकीन चाय होती है और जिन्हें इसका स्वाद नहीं है, उनके लिए इसे पीना थोड़ा मुश्किल हो सकता है। वे लोग मीठे कहवा से काम चला सकते हैं। श्रीनगर में रेजिडेंसी रोड पर मुगल दरबार, अहदूस और ग्रैंड रेस्तरां में आपको इच्छा वाजवान मिल सकता है। सस्ते रेस्तरां और बेकरीज के लिए आप डल गेट या शेरवानी रोड का रुख कर सकते हैं।

कश्यप मार से कश्मीर

स्थानीय लोगों का विश्वास है कि यहॉ विस्तृत घाटी के स्थान पर कभी मनोरम झील थी जिसके तट पर देवताओं का वास था। कश्मीर के प्राचीन इतिहास और यहां के सौंदर्य का वर्णन कल्हण रचित ‘राज तरंगिनी’ में बहुत सुंदर ढंग से किया गया है। वैसे इतिहास के लंबे कालखंड में यहां मौर्य, कुषाण, हूण, करकोटा, लोहरा, मुगल, अफगान, सिख और डोगरा राजाओं का राज रहा है। कश्मीर सदियों तक एशिया में संस्कृति एवं दर्शन शास्त्र का एक महत्वपूर्ण केंद्र रहा और सूफी संतों का दर्शन यहां की सांस्कृतिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है।

हर मौसम की छटा अनूठी धरती का स्वर्ग कहा जाने वाला कश्मीर ग्रेट हिमालयन रेंज और पीर पंजाल पर्वत श्रृंखला के मध्य स्थित है। यहां की नैसर्गिक छटा हर मौसम में एक अलग रूप लिए ऩजर आती है। गर्मी में यहां हरियाली का आंचल फैला दिखता है, तो सेबों का मौसम आते ही लाल सेब बागान में झूलते नजर आने लगते हैं। सर्दियों में हर तरफ बर्फकी चादर फैलने लगती है और पतझड़ शुरू होते ही जर्द चिनार का सुनहरा सौंदर्य मन मोहने लगता है। पर्यटकों को सम्मोहित करने के लिए यहां बहुत कुछ है। शायद इसी कारण देश-विदेश के पर्यटक यहां खिंचे चले आते हैं। वैसे प्रसिद्ध लेखक थॉमस मूर की पुस्तक ‘लैला रूख’ ने कश्मीर की ऐसी ही खूबियों का परिचय पूरे विश्व से कराया था।

झील पर तैरता शहर

यहां आने वाला हर सैलानी सबसे पहले श्रीनगर पहुंचता है, जो कि यहां का प्रमुख शहर तथा राज्य की ग्रीष्मकालीन राजधानी है। श्रीनगर घाटी का मुख्य व्यावसायिक केंद्र भी है। अन्य पर्वतीय स्थलों की तुलना में यह शहर कुछ अलग लगता है। यहां के घर व बा़जार पहाड़ी ढलानों पर नहीं बसे। एक विस्तृत घाटी के मध्य स्थित होने के कारण यह मैदानी शहरों जैसा लगता है। किंतु पृष्ठभूमि में दिखाई पड़ते बर्फाच्छादित पर्वत शिखर यह एहसास कराते हैं कि सैलानी वास्तव में समुद्रतल से 1730 मीटर ऊंची सैरगाह में हैं।

श्रीनगर का सबसे बड़ा आकर्षण यहां की डल झील है। जहां सुबह से शाम तक रौनक ऩजर आती है। सैलानी घंटों इसके किनारे घूमते रहते हैं या शिकारे में बैठ नौका विहार का लुत्फउठाते हैं। दिन के हर प्रहर में इस झील की खूबसूरती का कोई अलग रंग दिखाई देता है। देखा जाए तो डल झील अपने आपमें एक तैरते नगर के समान है। तैरते आवास यानी हाउसबोट, तैरते बाजार और तैरते वेजीटेबल गार्डन इसकी खासियत हैं।

कई लोग तो डल झील के तैरते घरों यानी हाउसबोट में रहने का लुत्फलेने के लिए ही यहां आते हैं। हाउसबोट में रहने वालों को जब कहीं आना-जाना होता है तो पहले वे शिकारे से सड़क तक आते हैं। झील के सौंदर्य को निरखने के लिए शिकारे से जरूर घूमना चाहिए। इस तरह घूमते हुए शॉल, केसर, आभूषण, फूल आदि बेचने वाले अपने शिकारे में सजी दुकान के साथ आपके करीब आते रहेंगे। यही नहीं, आप पानी में तैरते फोटो स्टूडियो में कश्मीरी ड्रेस में अपनी तसवीर भी खिंचवा सकते हैं।

झील के मध्य एक छोटे से टापू पर नेहरू पार्क है। वहां से भी झील का रूप कुछ अलग नजर आता है। दूर सड़क के पास लगे सरपत के ऊंचे झाड़ों की कतार, उनके आगे चलता ऊंचा फव्वारा बड़ा मनोहारी मंजर प्रस्तुत करता है। झील के आसपास पैदल घूमना भी सुखद लगता है। शाम होने पर भी यह झील जीवंत ऩजर आती है। सूर्यास्त के समय आकाश का नारंगी रंग झील को अपने रंग में रंग लेता है, तो सूर्यास्त के बाद हाउसबोट की जगमगाती लाइटों का प्रतिबिंब झील के सौंदर्य को दुगना कर देता है। शाम के समय यहां खासी भीड़ नजर आती है। भीड़-भाड़ से परे शांत वातावरण में किसी हाउसबोट में रहने की इ’छा है तो पर्यटक नागिन लेक या झेलम नदी पर खड़े हाउसबोट में ठहर सकते हैं। नागिन झील भी कश्मीर की सुंदर और छोटी-सी झील है। यहां प्राय: विदेशी सैलानी ठहरना पसंद करते हैं। उधर झेलम नदी में छोटे हाउसबोट होते हैं।

बादशाहों का उद्यान प्रेम

मुगल बादशाहों को वादी-ए-कश्मीर ने सबसे अधिक प्रभावित किया था। यहां के मुगल गार्डन इस बात के प्रमाण हैं। ये उद्यान इतने बेहतरीन और नियोजित ढंग से बने हैं कि मुगलों का उद्यान-प्रेम इनकी खूबसूरती के रूप में यहां आज भी झलकता है। मुगल उद्यानों को देखे बिना श्रीनगर की यात्रा अधूरी-सी लगती है। अलग-अलग खासियत लिए ये उद्यान किसी शाही प्रणय स्थल जैसे नजर आते हैं। शाहजहां द्वारा बनवाया गया चश्म-ए-शाही इनमें सबसे छोटा है। यहां एक चश्मे के आसपास हरा-भरा बगीचा है। इससे कुछ ही दूर दाराशिकोह द्वारा बनवाया गया परी महल भी दर्शनीय है। निशात बाग 1633 में नूरजहां के भाई द्वारा बनवाया गया था। ऊंचाई की ओर बढ़ते इस उद्यान में 12 सोपान हैं। शालीमार बाग जहांगीर ने अपनी बेगम के लिए बनवाया था। इस बाग में कुछ कक्ष बने हैं। अंतिम कक्ष शाही परिवार की स्ति्रयों के लिए था। इसके सामने दोनों ओर सुंदर झरने बने हैं। मुगल उद्यानों के पीछे की ओर जावरान पहाडि़यां हैं, तो सामने डल झील का विस्तार नजर आता है। इन उद्यानों में चिनार के पेड़ों के अलावा और भी छायादार वृक्ष हैं। रंग-बिरंगे फूलों की तो इनमें भरमार रहती है। इन उद्यानों के मध्य बनाए गए झरनों से बहता पानी भी सैलानियों को मुग्ध कर देता है। ये सभी बाग वास्तव में शाही आरामगाह के उत्कृष्ट नमूने हैं।

फूलों का मैदान

कश्मीर घाटी में श्रीनगर से दूर भी किसी दिशा में निकल जाएं तो प्रकृति के इतने रूप देखने को मिलते हैं कि लगता है जैसे उसने अपना खजाना यहीं समेट रखा है। राजमार्गो पर लगे दिशा-निर्देशों पर लिखे अनेक शहरों के नाम सैलानियों को आकर्षित करते हैं। लेकिन अधिकतर सैलानी, गुलमर्ग, सोनमर्ग और पहलगाम आदि घूमने जाते हैं। गुलमर्ग के रास्ते में कई छोटे सुंदर गांव और आसपास धान के खेत आंखों को सुहाते हैं। सीधी लंबी सड़क के दोनों और ऊंची दीवार के समान दिखाई पड़ती पेड़ों की कतार अत्यंत भव्य दिखाई देती है। पुरानी फिल्मों में इन रास्तों के बीच फिल्माए गीत पर्यटकों को याद आ जाते हैं। तंग मार्ग के बाद ऊंचाई बढ़ने के साथ ही घने पेड़ों का सिलसिला शुरू हो जाता है। कुछ देर बाद सैलानी गुलमर्ग पहुंचते हैं तो घास का विस्तृत तश्तरीनुमा मैदान देख कर मंत्रमुग्ध हो जाते हैं। जिस प्रकार उत्तराखंड में पहाड़ी ढलवां मैदानों को बुग्याल कहते हैं, कश्मीर में उन्हें ‘मर्ग’ कहते हैं। गुलमर्ग का अर्थ है ‘फूलों का मैदान’। समुद्र तल से 2680 मीटर की ऊंचाई पर स्थित गुलमर्ग सैलानियों के लिए वर्ष भर का रेसॉर्ट है। यहां से किराये पर घोड़े लेकर खिलनमर्ग, सेवन स्पि्रंग और अलपत्थर जैसे स्थानों की सैर भी कर सकते हैं।

विश्व का सबसे ऊंचा गोल्फकोर्स भी यहीं है। सर्दियों में जब यहां ब़र्फ की मोटी चादर बिछी होती है तब यह स्थान हिमक्रीड़ा और स्कीइंग के शौकीन लोगों के लिए तो जैसे स्वर्ग बन जाता है। यहां चलने वाली गंडोला केबल कार द्वारा ब़र्फीली ऊंचाइयों तक पहुंचना रोमांचक लगता है। ढलानों पर लगे चीड़ या देवदार के पेड़ों पर ब़र्फलदी दिखती है। तमाम पर्यटक बर्फ पर स्कीइंग का आनंद लेते हैं तो बहुत से स्लेजिंग करके ही संतुष्ट हो लेते हैं। यहां पर्यटक चाहें तो स्कीइंग कोर्स भी कर सकते हैं। हर वर्ष होने वाले ‘विंटर गेम्स’ के समय यहां विदेशी सैलानी भी बड़ी तादाद में आते हैं।

निराली सैरगाह

सोनमर्ग भी कश्मीर की एक निराली सैरगाह है। समुद्र तल से लगभग 3000 मीटर की ऊंचाई पर स्थित यह एक रमणीक स्थल है। सिंध नदी के दोनों और फैले यहां के ‘मर्ग’ सोने से सुंदर दिखाई देते हैं। इसीलिए इसे सोनमर्ग अर्थात सोने का मैदान कहा गया होगा। सोनमर्ग से घुड़सवारी करके थाजिवास ग्लेशियर भी देखने जा सकते हैं। वहां ग्लेशियर पर घूमने का आनंद भी लिया जा सकता है। अनंत हिमनदों के सामने खड़े होकर प्रकृति की विशालता का एहसास मन में रोमांच उत्पन्न कर देता है। प्रतिवर्ष होने वाली अमरनाथ यात्रा का एक मार्ग सोनमर्ग से बालटाल होकर भी है।

यहां से लद्दाख के रास्ते में पड़ने वाला जोजीला दर्रा 30 किमी दूर है।

पहलगाम का रास्ता भी सैलानियों को बहुत प्रभावित करता है। मार्ग में पाम्पोर में केसर के खेत दिखाई देते हैं। जगह-जगह क्रिकेट के बैट रखे नजर आते हैं। यहां ‘विलो-ट्री’ की लकड़ी से ये बैट बनते हैं। इनके अलावा अवंतिपुर में 9 वीं शताब्दी में बने दो मंदिरों के भग्नावशेष तथा मार्तड का सूर्य मंदिर भी आकर्षक हैं। सागरतल से 2130 मीटर की ऊंचाई पर बसा पहलगाम कभी चरवाहों का छोटा सा गांव था। किंतु यहां बिखरी नैसर्गिक छटा ने इसे खुशनुमा सैरगाह बना दिया। लिद्दर नदी इसकी छटा को और बढ़ाती है। नदी पर कई जगह बने लकड़ी के पुल और दूर दिखते हिमशिखर तो पिक्चर पोस्टकार्ड से दृश्य प्रस्तुत करते हैं। देवदार के जंगल, झरने और फूलों के मैदान तो जगह-जगह ऩजर आएंगे। बैसरन के मर्ग, आडु, चंदनवाड़ी जैसे स्थान घोड़ों पर बैठकर घूमे जा सकते हैं। साहसी पर्यटक पहलगाम से तरसर, मरसर झीलें, दुधसर झील और कोलहाई ग्लेशियर जैसे ट्रेकिंग रूटों पर निकल सकते हैं।

सैलानियों को आकर्षित करने वाले अन्य स्थानों में कोंकरनाग 2012 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। यह स्थान औषधीय गुणों वाले प्राकृतिक चश्मों के लिए प्रसिद्ध है। कश्मीरी भाषा में ‘नाग’ का अर्थ ‘चश्मा’ भी होता है। ‘वेरीनाग’ में भी कुछ प्राकृतिक चश्में हैं। यहां बादशाह जहांगीर ने चश्मों का जल एक ताल में एकत्र कर उसके आसपास एक उद्यान बनवाया था। 80 मीटर के दायरे में फैले आठ कोणों वाले इस ताल एवं उद्यान में चिनार के वृक्षों की कतारें सैलानियों का मन मोह लेती है।

वास्तव में कश्मीर को प्रकृति ने इतने रंगों से संवारा है कि उसकी खूबसूरती शब्दों में बयान कर पाना मुश्किल है। संस्कृति और जीवन शैली के रंग भी सैलानी पर इतना प्रभाव छोड़ते हैं कि वह बार-बार यहां आना चाहता है।

Posted By: Preeti jha