[निशा झा]। अरे ओ पंडितजी, ज़रा सुनिए तो सही! मैंने जोर से गुहार लगाई पर पंडितजी तो मानो किसी घोड़े पर सवार थे। ऐसा लग रहा था जैसे उन्होंने कोई भूत देख लिया हो। मेरी आवाज सुनकर एक पल वो ठिठके। चंदन का टीका माथे पर पड़े शिकन को छुपाने का भरसक प्रयास कर रहा था परंतु दुबले-पतले बीच की उम्र के पंडितजी रुकने वाले नहीं थे। जल्दी-जल्दी अपनी धोती और थैला समेटते हुए वहां से खिसक लिए। जाने से पहले उन्होंने हमारे गाइड को इशारे से कुछ समझाया भी था, जो हमें तो बिल्कुल समझ नहीं आया। हम असमंजस में रहे कि पंडितजी मंदिर छोड़कर क्यों भाग खड़े हुए। यह बात है लोणार झील में स्थित मंदिर की। वक्त था दिन के 1 बजे का। अब आप कहेंगे झील के अंदर मंदिर? अरे! झील के बीच नहीं, यह मंदिर तो झील के भीतरी किनारे पर स्थित है। कहा जाता है ऐसे बारह मंदिर इस झील के चारों ओर फैले हैं, जिनमें से अधिकतर अब खंडहर बन चुके हैं। यहां कुछ दरगाह भी हैं जिनकी हालत भी वैसी ही है।

उम्र 50 हजार साल चलिए पहले आपका परिचय लोणार झील से करा दें। इस झील को देखने की इच्छा कई सालों से मेरे दिल में पनप रही थी। इंटरनेट पर सिवाय सुंदर चित्रों के इसके बारे में कुछ खास जानकारी नहीं मिली। दुनिया की तीसरी बड़ी झील और जानकारी नदारद? इससे बड़े दु:ख की और क्या बात हो सकती थी। सोचा जरा घूम आया जाए। लोणार झील की उम्र करीब पचास हजार साल है। इस झील का पानी खारा है और मेरे गाइड ने बताया कि इसमें गंधक व फॉस्फोरस काफी मात्रा में मौजूद है। झील की परिधि लगभग 6-7 किलोमीटर है। झील के ऊपरी किनारे से पानी के स्तर तक पहुंचने के लिए 140 मीटर की गहराई तय करनी पड़ती है। कुछ गिने-चुने पर्यटकों के अलावा यहां शोधकर्ता, भूवैज्ञानिक, वैज्ञानिक और प्रकृति प्रेमी आते हैं। झील पर साधारण पत्थर के साथ बेसाल्ट पत्थर भी भारी मात्रा में देखने को मिलता है। इस पत्थर में कई छेद होते हैं और यह बहुत हल्का होता है।

मनोरम दृश्य अगस्त का महीना था और बारिश का मौसम। इस मौसम में इस विशाल गोलाकार झील की दीवारें, आसपास की जमीन और पेड़-पौधे हरे रंग में रंग जाते हैं। हरी झील का पानी मुझे बरबस आकर्षित कर रहा था। मैं झील के ऊपरी किनारे पर खड़ी उस मनोरम दृश्य का आनंद लेते हुए मंत्रमुग्ध हुई जा रही थी। मैंने इससे पहले इतना मनोरम दृश्य कभी नहीं देखा था। तभी गाइड ने सपने से जगाते हुए कहा- मैडम जी, अब चलें? कहीं बारिश आ गयी तो नीचे उतरना संभव न हो पाएगा।

इतनी दूर आने के बाद मैं बिना नीचे उतरे या झील का चक्कर काटे वापस नहीं जाना चाहती थी। लेकिन आप यह कोशिश तभी करें यदि आप शारीरिक रूप से स्वस्थ हों क्योंकि मत भूलिए कि नीचे गए तो ऊपर भी तो आना है! नीचे जाने के दो रास्ते हैं- एक पत्थरों से बना ढलानी रास्ता। दूसरा जहों से छोटा सा झरना बहता है। हालांकि झरने वाला रास्ता आसान है, फिर भी गाइड अहमद हमें ढलान के रास्ते से ले गया। हम भी उसे गुरु मानते हुए बिना कुछ पूछे पीछे हो लिए। अहमद ने उसका कारण भी बताया। झरने वाले रास्ते पर कुछ एक जगहें ऐसी हैं जहाँ खड़ी चढ़ाई है और बड़े-बड़े ढीले कंकड़ हैं जिनपर अगर पैर पड़ा तो ख़ुदा ना खास्ता नीचे एक ही सांस में पहुंच जाएंगे। नीचे पहुंचने के बाद रास्ता सरल है और अधिकतर पेड़ों की छाया से ढका है। रास्ते की चौड़ाई एक फुट से 10 फुट के बीच कुछ भी हो सकती है। कांटेदार झाडि़यों व कीचड़ से गुजरना पड़ सकता है। बारिश का मौसम न हो तो शायद यह सब न झेलना पड़े लेकिन फिर आपको वो हरा-भरा मनमोहक दृश्य भी तो नहीं मिलेगा!

0 खंड-खंड इतिहास रास्ते भर 19 वर्षीय अहमद विभिन्न प्रकार की जड़ी-बूटियों के बारे में बताता रहा जिनके बारे में उसने अपने स्वर्गीय दादाजी से सीखा था। नीचे उतरने के बाद आपको कई टूटे-फूटे मंदिर मिलेंगे जिनमे से ज्यादातर खंडहर बन चुके हैं। बस एक-दो मंदिर हैं जहां रोज पूजा होती है। कुछ ऐसे हैं जहां केवल सालाना अखंड पाठ और रात्रि जागरण होता है, बाकी समय वे वीरान रहते हैं।

एक बात जो दिल को छू गई, वह थी मुसलमानों और हिंदुओं के बीच प्रेम भाव। अहमद हमें एक ऐसे ही मंदिर में ले गया जहां वह और उसके साथी हर साल देवी के जागरण का आयोजन करते हैं जो एक हफ्ते तक चलता है। इस जागरण में सारा गाँव आमंत्रित होता है और दूर-दूर से भी लोग आते हैं। सब मिलकर काम करते हैं, भजन गाते हैं व प्रसाद का आनंद उठाते हैं। अगर आप चलते-चलते थक जाएं तो विश्राम के लिए यह बढि़या जगह है। झील का पानी हरे रंग का था पर काफी मात्रा में रसायन होने की वजह से कोई बतख या मछली नहीं दिखाई दी। झील की दीवार और किनारे अच्छे खासे जंगल से कम नहीं थे। वे जैव विविधता में समृद्ध हैं। जैसे-जैसे आप झील का चक्कर लगाते आगे बढ़ते हैं, तो आपको कई प्रकार के पशु-पक्षी देखने-सुनने को मिल सकते हैं। इनमें खरगोश, हिरन, बंदर, सांप, जंगली छिपकलियां, भेडि़ये, मोर, कोयल, मटरमुर्गी इत्यादि प्रमुख हैं। हमने तो विश्राम करते समय उन खंडहर मंदिरों में सांप की कई केंचुलियां भी देखीं और उछलकर उठ खड़े हुए। लेकिन आप डरें नहीं, वे भी तो इस खूबसूरत प्रकृति का ही हिस्सा हैं।

जंगल से साक्षात्कार आसमान में काले बादल थे। हल्की हल्की बारिश हो रही थी। हम धीरे-धीरे बरसाती के अंदर से हाथ निकाल फोटो खींचते, अहमद की कहानियों का आनंद उठाते चल रहे थे। हम अपने साथ कुछ फल और चिप्स इत्यादि लाए थे। तीन पीढि़यों से अहमद का परिवार लोणार झील की सेवा कर रहा है। यहां पाई जाने वाली जड़ी बूटियों का खासा ज्ञान है उसे। चलते-चलते काफी देर हो चुकी थी। अब तक हमें किसी और व्यक्ति के दर्शन नहीं हुए थे। अहमद ने बताया कि यहां सैलानी कम ही आते हैं। पास के गांव से लोग लकड़ी चुनने आते हैं पर बारिश के मौसम में वह भी संभव नहीं होता।

थोड़ी देर बाद हम एक छोटे से मंदिर के पास पहुंचे। मंदिर के द्वार पर बड़ा सा घंटा और केसरिया झंडे को देखकर जान में जान आई। अगरबत्ती की सुगंध ने उस भीगे वातावरण में एक आश्वासन सा दिया था। मंदिर के अंदर एक शिवलिंग था और सामने एक पेड़ था जिसकी शाखाएं कटी हुई थीं, कुछ लोगों ने बचे-खुचे भाग पर मन्नत के डोरे और कपड़े बांधे हुए थे। हम अभी फोटो खींच ही रहे थे कि अचानक जोरों से बारिश शुरू हो गई। हमने भागकर मंदिर में शरण ली। अहमद पंडितजी के साथ दुआ सलाम में लग गया। पंडितजी ने उससे हमारे बारे में पूछा। अहमद ने बताया कि हम मुंबई से आए हैं। थोड़ी ही देर में और 2-3 व्यक्ति भीगते हुए आए। वे सब पास के गांव के रहने वाले थे और आपस में बतिया रहे थे। हम पहले से ही भीगे हुए थे और अब तो कैमरे को सूखा रखना ही हमारा परम धर्म बन गया था। हमें पता ही नहीं चला कि कब सिवाय पंडितजी और अहमद के बाकी सब लोग चले गए। शायद वो जल्दी में थे। देखते ही देखते पंडितजी ने भी मंदिर के अंदर वाले छोटे से दरवाजे को उढ़का दिया और अपनी चप्पलों की तरफ लपके। उन्हें जाते देखकर ही मैंने उनसे वह गुहार लगाई थी। अहमद ने धीरे से कहा कि अब हमें भी चलना चाहिए। च्अरे, बारिश तो रुकने दो। हमारी इच्छा तो झील का पूरा चक्कर लगाने की है!ज् च्नहीं मैडम जी, वह तो आज नहीं हो पाएगा। उसके लिए हमें सुबह ही होटल से निकलना चाहिए था। देखिए यहां और कोई नहीं है। सब जा चुके हैं।ज् कहते हुए उसके चेहरे पर चिंता की लकीरें साफ नजर आ रही थीं। आखिर हमें सुरक्षित वापस पहुंचाने की जिम्मेदारी थी उसकी। फिर अहमद ने हमें जो बताया उसे सुनकर हम भी बिना किसी बहस के उस तेज बारिश में वापस हो लिए। हमें समझ आ गया था कि पंडितजी क्यों चले गए। वहां बिजली तो है नहीं, और ज्यादा लोग भी आते-जाते नहीं। झील के किनारे घने जंगल में कई जानवर पाए जाते हैं। दोपहर बाद ये जानवर, खासकर भेडि़ये अपने भोजन का प्रबंध करने निकल पड़ते हैं। फिर किसी इंसान की क्या मजाल कि यहां टिकना पसंद करे। सबको अपनी जान प्यारी होती है। हमें भी थी।

आप कब जा रहे हैं लोणार झील देखने? आपकी यात्रा मंगलमय हो।

कैसे पहुंचें: लोणार झील महाराष्ट्र के बुलदाना जिले में स्थित है। सबसे नजदीकी एअरपोर्ट औरंगाबाद है और सबसे बड़ा नजदीकी रेलवे स्टेशन जालना है। जालना लोणार से 90 किमी की दूरी पर है और आप टैक्सी या बस लेकर यहां पहुंच सकते हैं। सड़क मार्ग से लोणार पहुंचने का सबसे सही रास्ता औरंगाबाद होकर है। अगर आप अजंता गुफाओं से आ रहे हैं तो चिखली होकर आना होगा पर यह रास्ता बारिश के दिनों में काफी खराब रहता है ।

कब जाएं: हालांकि लोणार कभी भी जा सकते हैं पर सबसे अच्छा समय है बारिश के एकदम बाद। सब तरफ हरियाली और मौसम अनुकूल होता है। नवरात्रि के दौरान गांव वाले नीचे झील पर आकर मंदिरों और दरगाह पर प्रार्थना करते हैं।

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