
- शनिदेव को कर्मफलदाता, शनैश्चर, सूर्यपुत्र, छायापुत्र और रविनंदन के नाम से भी जाना जाता है।
- धार्मिक मान्यता के अनुसार, शनिदेव सूर्य देव और माता छाया के पुत्र हैं। शनिदेव को न्याय का देवता माना जाता है, जो व्यक्ति को उसके कर्मों के अनुसार फल प्रदान करते हैं।
- शनिदेव की पूजा के लिए शनिवार का दिन विशेष माना जाता है। इस दिन भक्त शनिदेव को सरसों का तेल, काले तिल, उड़द दाल और काले वस्त्र अर्पित करते हैं।
- शनिदेव का वाहन कौआ माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं में उनका स्वरूप श्याम वर्ण का बताया गया है और वे हाथों में गदा, त्रिशूल और अन्य अस्त्र धारण करते हैं।
- शनिदेव से जुड़े प्रमुख पर्वों में शनि जयंती और शनि अमावस्या प्रमुख हैं। शनिवार को शनिदेव की पूजा और शनि चालीसा का पाठ करना भी विशेष फलदायी माना जाता है।
- ज्योतिष शास्त्र में शनिदेव को कर्म, न्याय, अनुशासन, धैर्य और दंड से संबंधित ग्रह माना जाता है। शनि की साढ़ेसाती और ढैय्या का भी ज्योतिष में विशेष महत्व बताया गया है।
- शनिदेव के प्रसिद्ध मंदिरों में शनि शिंगणापुर, शनिश्चरा मंदिर, तिरुनल्लार शनिस्वरन मंदिर और कोकिलावन धाम प्रमुख हैं।

श्री शनि चालीसा
।। दोहा ।।
जय गणेश गिरिजा सुवन, मंगल करण कृपाल ।
दीनन के दुःख दूर करि, कीजै नाथ निहाल ॥
अर्थ: हे माता पार्वती के सुपुत्र और शुभता के प्रतीक श्री गणेश जी! आपकी जय हो। आप अत्यंत दयालु हैं, कृपया असहायों और निर्धनों के कष्टों को मिटाकर उन्हें खुशहाली और आनंद प्रदान करें।
जय जय श्री शनिदेव प्रभु, सुनहु विनय महाराज ।
करहु कृपा हे रवि तनय, राखहु जन की लाज ॥
अर्थ: हे प्रभु शनिदेव! आपकी सदा जय हो। हे महाराज! हमारी प्रार्थना स्वीकार कीजिए। हे सूर्यपुत्र! हम पर अपनी अनुकंपा बनाए रखिए और अपने भक्तों की सम्मान की रक्षा कीजिए।
॥ चौपाई ॥
जयति जयति शनिदेव दयाला ।
करत सदा भक्तन प्रतिपाला ॥
अर्थ: हे कृपालु शनिदेव! आपकी सदा जय हो, आप अपने भक्तों का निरंतर पालन और संरक्षण करते हैं।
चारि भुजा, तनु श्याम विराजै ।
माथे रतन मुकुट छवि छाजै ॥
अर्थ: आपका वर्ण श्याम (सांवला) है और आपकी चार भुजाएं हैं। आपके मस्तक पर जड़ाऊ रत्नों का मुकुट सुशोभित है।
परम विशाल मनोहर भाला ।
टेढ़ी दृष्टि भृकुटि विकराला ॥
अर्थ: आपका विशाल मस्तक आकर्षक है। आपकी दृष्टि तिरछी (वक्र) और भृकुटी अत्यंत प्रभावशाली है।
कुण्डल श्रवन चमाचम चमके ।
हिये माल मुक्तन मणि दमकै ॥
अर्थ: आपके कानों में चमचमाते कुंडल हैं और छाती पर मोतियों व मणियों की माला जगमगा रही है।
कर में गदा त्रिशूल कुठारा ।
पल बिच करैं अरिहिं संहारा ॥
अर्थ: आपके हाथों में गदा, त्रिशूल और कुठार जैसे अस्त्र सुशोभित हैं और आप पल भर में शत्रुओं का संहार कर देते हैं।
पिंगल, कृष्णो, छाया, नन्दन ।
यम, कोणस्थ, रौद्र, दुःख भंजन ॥
अर्थ: पिंगल, कृष्ण, छायापुत्र, यम, कोणस्थ, रौद्र और दुखभंजन आपके प्रसिद्ध नाम हैं।
सौरी, मन्द शनी दश नामा ।
भानु पुत्र पूजहिं सब कामा ॥
अर्थ: सौरी, मंद और शनि सहित आपके दस प्रसिद्ध नाम हैं। हे सूर्यपुत्र! सभी मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए आपकी उपासना की जाती है।
जापर प्रभु प्रसन्न हवैं जाहीं ।
रंकहुं राव करैं क्षण माहीं ॥
अर्थ: आप जिस पर प्रसन्न हो जाते हैं, उसे पल भर में भिखारी से राजा बना देते हैं।
पर्वतहू तृण होइ निहारत ।
तृणहू को पर्वत करि डारत ॥
अर्थ: आपकी कृपा हो तो पहाड़ जैसी बड़ी मुसीबत भी तिनके जैसी हल्की लगती है, परंतु आपकी नाराजगी से तिनके जैसी छोटी समस्या भी पहाड़ का रूप ले लेती है।
राज मिलत वन रामहिं दीन्हयो ।
कैकेइहुँ की मति हरि लीन्हयो ॥
अर्थ: आपकी ही महादशा के प्रभाव से महारानी कैकेयी की बुद्धि भ्रष्ट हुई और राज्याभिषेक के स्थान पर श्रीराम को वनवास भोगना पड़ा।
वनहुं में मृग कपट दिखाई ।
मातु जानकी गई चुराई ॥
अर्थ: जंगल में कपटी हिरण के मायाजाल से माता सीता का हरण हुआ।
लषणहिं शक्ति विकल करिडारा ।
मचिगा दल में हाहाकारा ॥
अर्थ: आपकी ही दशा के समय लक्ष्मण जी को शक्तिबाण लगा, जिससे सेना में हाहाकार मच गया।
रावण की गति-मति बौराई ।
रामचन्द्र सों बैर बढ़ाई ॥
अर्थ: आपके प्रभाव से रावण की मति मारी गई और उसने श्रीराम से शत्रुता मोल ली।
दियो कीट करि कंचन लंका ।
बजि बजरंग बीर की डंका ॥
अर्थ: परिणामस्वरूप वीर हनुमान जी ने पूरी सोने की लंका को तहस-नहस कर दिया।
नृप विक्रम पर तुहि पगु धारा ।
चित्र मयूर निगलि गै हारा ॥
अर्थ: जब आपकी दृष्टि राजा विक्रमादित्य पर पड़ी, तो दीवार पर चित्रित मोर ने असली नौलखा हार निगल लिया।
हार नौलखा लाग्यो चोरी ।
हाथ पैर डरवायो तोरी ॥
अर्थ: राजा पर चोरी का झूठा आरोप लगा और उनके हाथ-पैर तुड़वा दिए गए।
भारी दशा निकृष्ट दिखायो ।
तेलहिं घर कोल्हू चलवायो ॥
अर्थ: उन्हें तेली के घर कोल्हू तक चलाना पड़ा।
विनय राग दीपक महँ कीन्हयों ।
तब प्रसन्न प्रभु ह्वै सुख दीन्हयों ॥
अर्थ: जब उन्होंने पूरे भाव से दीपक राग गाकर आपकी स्तुति की, तब आपने प्रसन्न होकर उनका खोया हुआ वैभव पुनः लौटा दिया।
हरिश्चन्द्र नृप नारि बिकानी ।
आपहुं भरे डोम घर पानी ॥
अर्थ: आपके प्रभाव से राजा हरिश्चंद्र को अपनी पत्नी तक को बेचना पड़ा और स्वयं डोम के यहाँ काम करना पड़ा।
तैसे नल पर दशा सिरानी ।
भूंजी-मीन कूद गई पानी ॥
अर्थ: राजा नल पर आपकी दशा आई तो पकी हुई मछली भी जीवित होकर पानी में कूद गई और उन्हें भुखमरी का सामना करना पड़ा।
श्री शंकरहिं गह्यो जब जाई ।
पारवती को सती कराई ॥
अर्थ: जब आपकी दृष्टि भगवान शिव पर पड़ी, तो माता सती को यज्ञकुंड में आत्मदाह करना पड़ा।
तनिक विकलोकत ही करि रीसा ।
नभ उड़ि गतो गौरिसुत सीसा ॥
अर्थ: आपकी एक तिरछी दृष्टि पड़ने से बाल गणेश का शीश धड़ से अलग होकर आकाश में उड़ गया।
पाण्डव पर भै दशा तुम्हारी ।
बची द्रोपदी होति उधारी ॥
अर्थ: पांडवों पर आपकी दशा आई तो द्रौपदी का चीरहरण होते-होते बचा।
कौरव के भी गति मति मारयो ।
युद्ध महाभारत करि डारयो ॥
अर्थ: कौरवों की बुद्धि भ्रष्ट होने के कारण भयंकर महाभारत युद्ध हुआ।
रवि कहँ मुख महँ धरि तत्काला ।
लेकर कूदि परयो पाताला ॥
अर्थ: आपने अपने पिता सूर्यदेव को भी मुख में निगलकर पाताल लोक में छलांग लगा दी।
शेष देव-लखि विनती लाई ।
रवि को मुख ते दियो छुड़ाई ॥
अर्थ: समस्त देवताओं की प्रार्थना पर आपने सूर्यदेव को अपने मुख से मुक्त कर दिया।
वाहन प्रभु के सात सुजाना ।
जग दिग्गज गर्दभ मृग स्वाना ॥
अर्थ: ज्योतिष शास्त्र के अनुसार शनिदेव के सात प्रमुख वाहन हैं—हाथी, घोड़ा, गधा, हिरण, कुत्ता, सियार और शेर।
जम्बुक सिह आदि नख धारी ।
सो फल ज्योतिष कहत पुकारी ॥
अर्थ: इन विभिन्न वाहनों के आधार पर ज्योतिष शास्त्र में शनिदेव के आगमन के अलग-अलग फल बताए गए हैं।
गज वाहन लक्ष्मी गृह आवैं ।
हय ते सुख सम्पत्ति उपजावै ॥
अर्थ: अगर शनिदेव हाथी पर सवार होकर आएं तो घर में धन-लक्ष्मी का आगमन होता है; घोड़े की सवारी से सुख-समृद्धि मिलती है।
गर्दभ हानि करै बहु काजा ।
सिह सिद्ध्कर राज समाजा ॥
अर्थ: गधे की सवारी अनेक कार्यों में हानि का संकेत देती है, जबकि सिंह की सवारी राजकीय कार्यों में सफलता देने वाली मानी जाती है।
जम्बुक बुद्धि नष्ट कर डारै ।
मृग दे कष्ट प्राण संहारै ॥
अर्थ: सियार की सवारी बुद्धि नष्ट करने वाली और हिरण की सवारी कष्ट तथा प्राण-संकट देने वाली मानी जाती है।
जब आवहिं स्वान सवारी ।
चोरी आदि होय डर भारी ॥
अर्थ: जब शनिदेव कुत्ते की सवारी करके आते हैं, तब चोरी आदि होने का भारी भय रहता है।
तैसहि चारि चरण यह नामा ।
स्वर्ण लौह चाँदी अरु तामा ॥
अर्थ: इसी प्रकार शनिदेव के आगमन के चार पाये या चरण माने गए हैं—स्वर्ण, लौह, चाँदी और तांबा।
लौह चरण पर जब प्रभु आवैं ।
धन जन सम्पत्ति नष्ट करावैं ॥
अर्थ: लोहे के पाये पर आने पर धन, जन और संपत्ति की हानि होने का संकेत माना जाता है।
समता ताम्र रजत शुभकारी ।
स्वर्ण सर्वसुख मंगल भारी ॥
अर्थ: तांबे और चांदी के पाये सामान्यतः शुभ फल देने वाले माने जाते हैं, जबकि सोने के पाये पर आगमन सर्व सुख और अत्यंत मंगलकारी माना जाता है।
जो यह शनि चरित्र नित गावै ।
कबहुं न दशा निकृष्ट सतावै ॥
अर्थ: जो व्यक्ति नित्य शनिदेव के इस चरित्र का गान करता है, उसे शनि की अशुभ दशा का कष्ट नहीं सहना पड़ता।
अद्भुत नाथ दिखावैं लीला ।
करैं शत्रु के नशि बलि ढीला ॥
अर्थ: शनिदेव अपनी अद्भुत लीलाएं दिखाते हैं और अपनी कृपा से शत्रुओं के बल को क्षीण कर देते हैं।
जो पण्डित सुयोग्य बुलवाई ।
विधिवत शनि ग्रह शांति कराई ॥
अर्थ: जो श्रद्धालु योग्य विद्वान को बुलाकर विधिवत शनि ग्रह की शांति करवाता है, उसे शनिदेव की कृपा प्राप्त होती है।
पीपल जल शनि दिवस चढ़ावत ।
दीप दान दै बहु सुख पावत ॥
अर्थ: जो व्यक्ति शनिवार को पीपल के वृक्ष में जल अर्पित करता है और दीपदान करता है, वह जीवन में असीम सुख प्राप्त करता है।
कहत राम सुन्दर प्रभु दासा ।
शनि सुमिरत सुख होत प्रकाशा ॥
अर्थ: भक्त रामसुंदर कहते हैं कि शनिदेव का स्मरण करने से जीवन में सुख और प्रकाश की प्राप्ति होती है।
॥ दोहा ॥
पाठ शनिश्चर देव को, की हों ‘भक्त’ तैयार ।
करत पाठ चालीस दिन, हो भवसागर पार ॥
अर्थ: शनिदेव के इस पावन पाठ को जो भी श्रद्धालु लगातार चालीस दिनों तक श्रद्धापूर्वक करता है, वह शनिदेव की अनुकंपा से जीवन की सभी कठिनाइयों को पार कर मोक्ष और परम सुख को प्राप्त करता है।
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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
- शनि चालीसा का पाठ करने से क्या लाभ होते हैं?शनि देव की कृपा पाने के लिए शनि चालीसा का पाठ महत्वपूर्ण माना जाता है। प्रतिदिन श्रद्धा के साथ इसका पाठ करने से धैर्य और संयम बढ़ने की मान्यता है। कहा जाता है कि पूरी श्रद्धा से पाठ करने पर शनिदेव की कृपा प्राप्त होती है और जीवन की बाधाओं का सामना करने में आत्मबल मिलता है।
- शनि चालीसा का पाठ कब और कितनी बार करना चाहिए?शनिवार का दिन शनि चालीसा के पाठ के लिए विशेष रूप से शुभ माना जाता है। शनिवार की सुबह या संध्या के समय इसका पाठ किया जा सकता है। सामान्य तौर पर एक बार पाठ करना पर्याप्त माना जाता है, लेकिन किसी विशेष संकल्प के लिए श्रद्धानुसार नियमित रूप से पाठ किया जा सकता है।
- शनि चालीसा किसने लिखी है?शनि चालीसा के रचयिता के बारे में किसी प्राचीन ग्रंथ या ऐतिहासिक पांडुलिपि में आधिकारिक जानकारी या निश्चित नाम नहीं मिलता है।
- शनिवार को शनि चालीसा पढ़ने का क्या महत्व है?शनिवार का दिन मुख्य रूप से शनिदेव को समर्पित माना जाता है। इसलिए इस दिन शनि चालीसा का पाठ शनिदेव की कृपा पाने के लिए विशेष माना जाता है। मान्यता है कि इसके पाठ से अहंकार दूर करने और ईमानदारी के मार्ग पर चलने की प्रेरणा मिलती है।
- शनि चालीसा और शनि मंत्र में क्या अंतर है?शनि चालीसा शनिदेव की स्तुति है, जिसमें उनके गुणों, स्वरूपों और लीलाओं का वर्णन मिलता है। वहीं शनि मंत्र छोटा और संक्षिप्त जाप होता है, जिसके माध्यम से ध्यान और एकाग्रता के साथ शनिदेव का स्मरण किया जाता है।
- शनि चालीसा का पाठ करने के क्या नियम हैं?शनि चालीसा के पाठ से पहले स्वच्छता का ध्यान रखना चाहिए। मन को शांत रखकर आसन पर बैठें और शनिदेव का ध्यान करें। सच्ची श्रद्धा और नियमितता के साथ पाठ करना शुभ माना जाता है।
- शनि चालीसा का पाठ कितने दिनों तक करना चाहिए?शनि चालीसा के पाठ के लिए कोई निश्चित अवधि अनिवार्य नहीं है। आमतौर पर शनिवार को इसका पाठ शुभ माना जाता है। हालांकि, किसी विशेष मनोकामना या संकल्प के लिए श्रद्धानुसार लगातार 40 दिनों तक नियमित पाठ किया जा सकता है।
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