देहरादून। अक्सर घरों की छत पर बैठकर कांव-कांव करने वाले कौए अब शहर में नजर नहीं आते। हालांकि, अक्सर लोग छत पर बैठे कौओं को उड़ा देते हैं, लेकिन पितृपक्ष में यही कौए श्रद्धा के पात्र बन जाते हैं। कौओं को पितरों का प्रतीक माना गया है और लोग इन्हें भोजन कराकर पितरों को तृप्त करते हैं। इसके अलावा श्वान (कुत्ता) और गाय को भी पितृपक्ष में ग्रास दिया जाता है।

धार्मिक मान्यता के अनुसार कौए को यमराज का भाई और संदेश वाहक माना जाता है। इसलिए जब कौआ घर की छत पर बैठकर कांव-कांव करता है तो लोग अप्रिय सूचना की आशंका में उसे उड़ा देते हैं। माना जाता है कि कौआ कोई न कोई सूचना लेकर ही आता है। लेकिन, यही कौआ पितृपक्ष में पितरों का प्रतिनिधि होने के नाते सम्मान का हकदार बन जाता है। आचार्य डॉ.संतोष खंडूड़ी कहते हैं कि श्राद्ध के दिनों में पितर कौए के रूप में आ सकते हैं, इसलिए उन्हें श्रद्धा के साथ भोजन कराने की परंपरा है। अगर कौए के रूप में पितर न भी आएं, तो भी माना जाता है कि कौआ भोजन पितरों तक पहुंचा देगा।

कौए के अलावा गाय और श्वान को भी ग्रास दिया जा सकता है। आचार्य संतोष खंडूड़ी बताते हैं कि श्वान (कुत्ता) धर्मराज युधिष्ठिर के साथ स्वर्ग तक गया था। इसलिए माना जाता है कि अब भी श्वान हर आत्मा के साथ स्वर्ग तक जाता है। वहीं, जब भी किसी इंसान की मृत्यु होती है तो उसे वैतरणी नदी पार करनी होती है। गाय ही उसे वैतरणी पार कराती है। गाय और श्वान दोनों को ही धर्म का प्रतीक माना गया है, जबकि कौआ यम के यहां से संदेश लाता है। इसलिए माना जाता है कि इन तीनों के माध्यम से मोक्ष प्राप्त होता है।

डाउनलोड करें जागरण एप और न्यूज़ जगत की सभी खबरों के साथ पायें जॉब अलर्ट, जोक्स, शायरी, रेडियो और अन्य सर्विस