जानिए क्यों अहंकार को छोड़कर ईश्वर की शरणागति ही है सनातन का मूल आधार?
सभी क्षुद्र अंक (मनुष्य) शून्य (ईश्वर) की अवहेलना करके अपने-अपने अहंकार की स्थापना करना चाह रहे हैं। तत शून्य है ...और पढ़ें

शून्य रूपी परमात्मा और अंक रूपी मानवीय अहंकार।
स्वामी मैथिलीशरण (संस्थापक अध्यक्ष, श्रीरामकिंकर विचार मिशन, ऋषिकेश)। आंधी, बाढ़, भूकंप से व्यक्ति प्रभावित न हो, यह संभव नहीं है, किंतु उस स्थिति में कुछ लोगों की मति बिल्कुल केंद्र में स्थित रहे और वह 360 डिग्री में चारों ओर देखने में सक्षम हो, यह असंभव नहीं है। इसके लिए व्यक्ति को अतींद्रिय स्थिति में स्थित होना होता है, क्योंकि सब कुछ इंद्रियों से ही नहीं जाना जा सकता है। मन की भी सीमा है। इसके लिए हमें धर्म, वेद, स्वधर्म, देश और जीवन ऐक्य और उसकी व्यापक सत्ता को समझना होगा।
सत्य का पालन भी धर्म होता है। अहिंसा भी धर्म ही है। जप, तप, ध्यान, समाधि, मानव सेवा आदि सब धर्म ही हैं। मनुष्य को धर्म की हर शाखा का प्रयोग अपने व्यक्तिगत स्वार्थ से ऊपर उठकर सम्यक रूप से करना होगा। हमें यह भी समझना होगा कि आत्मीय स्वस्थता के अभाव में हमारी व्यापकता की परिभाषा कहीं हमारे अस्तित्व को ही न समाप्त कर दे। इसके लिए जो मूल सूत्र-शस्त्र है वह है विवेक। विवेक बुद्धि की वह परिष्कृत स्थिति है, जो व्यक्तिगत स्वार्थ से ऊपर है और सबके सुख और कल्याण की कामना से ओतप्रोत है। वह हमारे परम पवित्र सनातन का सार्वभौम आधार भी है। सनातन परंपरा ईश्वर को स्थापित नहीं करती है, अपितु वह शाश्वत स्थापित ईश्वर की समर्पित होकर पूजा करती है। ईश्वर को स्थापित और विस्थापित दोनों नहीं किया जा सकता है। संपूर्ण जगत में वही स्थापित है। वह आत्मा, उस शून्य की तरह है, जो अंक रूपी अहंकार का अबलंबन लेकर चलने वालों का मूल्य दस गुना बढ़ाकर स्वयं शून्य ही रहता है। वहीं, मान्यताओं को धर्म बताने वाले लोगों का अहंकार उस शून्य के आधार पर दस गुना होकर मूल शून्य को ही शून्य कर देना चाहता है।
ईश्वर और ईश्वर के अनुयायी जोर-जोर से चिल्लाते हैं, पर हिंसा नहीं करते हैं। कदाचित सभी मान्यताओं ने अपने स्थायित्व को खड़ा रखने के लिए सबसे श्रेष्ठ प्लेटफार्म धर्म को ही मान लिया है। विवेकहीन अनुयायियों के स्वार्थ ने अपने स्वार्थ की पूर्ति का मार्ग बना लिया है। अधिकांश मान्यताएं अपने मूल को समझ ही नहीं पा रही हैं। जल का मूल ईश्वर, पृथ्वी का मूल ईश्वर, वायु, अग्नि, आकाश सब कुछ तो वही है। हम ईश्वर और ईश्वर की वस्तुओं को प्राप्त करके उस पर अपना स्वामित्व बताकर वस्तु, पदार्थ, रसायन, धान्य को मुद्दा बनाकर घोर अहिंसा को धर्म का जामा पहना रहे हैं। सभी क्षुद्र अंक शून्य (ईश्वर) की अवहेलना करके अपने-अपने अहंकार की स्थापना करना चाह रहे हैं। ईश्वर हृदय में ही नहीं, सारी प्रकृति में परिव्याप्त सत्ता है। निर्गुण और सगुण पिता-पुत्र की तरह हैं। निर्गुण पिता के बिना सगुण पुत्र संभव नहीं है। आत्मा ही सबका परमपिता है।
विवेक एक विश्वविद्यालय है, जो ईश्वर, सत-असत, कर्म-अकर्म आदि अनेकानेक विषयों की सारी कक्षाएं चलाता है और इसकी परीक्षा इंद्रियां और मन देते ही रहते हैं। ईश्वर की शरणागति ही इसका अंतिम प्रमाण पत्र होता है। शरणागति का तात्पर्य प्रमादी और आलसी हो जाना कदापि नहीं है, अपितु अपने संपूर्ण पुरुषार्थ में ईश्वर की कृपा का दर्शन करना, सुखी, शांत और आनंदित होना ही इसका स्वरूप है। अहंकार कभी किसी धर्म, ईश्वर, जीवन एवं आदर्श की स्थापना या उसे चरितार्थ नहीं कर सकता है, क्योंकि अहंकार अतिरेकवादी है। उसे संतुलन पसंद ही नहीं है। यह बिडंबना सतयुग से लेकर आज तक चलती ही आ रही है।
संसार की आलोचना के स्थान पर भगवान का चिंतन करना भक्तों के लिए बहुत श्रेयस्कर है। युग प्रभाव से जब देश, काल, व्यक्ति सब आक्रांत है तो काल के विरुद्ध अपने विचारों का अनावश्यक प्रदर्शन करना उचित नहीं है। श्रीमद्भागवत में नारद जी ने भक्ति रूपा एक युवती को धैर्य का मंत्र दिया। हमारे गुरुदेव पूज्य श्रीरामकिंकर जी महाराज इसे इस तरह से कहा करते थे कि भक्त को जीवन में प्रत्येक परिस्थिति की सुसमीक्षा करनी चाहिए।
यह तत्वत: सत्य है कि भगवान ने वर्तमान में हमारे लिए जिस परिस्थिति, मन:स्थिति और भावस्थिति का निर्माण किया है, उसमें यदि हम भगवान की कृपा मानकर उसे स्वीकार करें और नाम जप को अपने पुरुषार्थ रूप में परिस्थितियों से मुक्ति का साधन बना लें तो यह त्रिकाल सत्य है कि हम स्वस्वरूप को आनंदमय करके वायु की तरह अपने आत्मीय आनंद का ही संचार सारे विश्व में करेंगे।
सारे संसार को न तो बदल बदल सकते हैं न ही वह बदलता है, मौसम की सहज प्रक्रिया जो उतार-चढ़ाव की होती है, यदि उसी को हम अपना पुरुषार्थ मानकर मिथ्या अहं की तुष्टि कर सकते हैं तो बात अलग है। श्रीराम और श्रीकृष्ण शरीर रूप धारण करके मनुष्य और प्राणीमात्र का हित करने और उसको समझाने के लिए अवतरित हुए।
सगुण साकार की आराधना इसलिए परम श्रेष्ठ और श्रेयस्कर है, क्योंकि निर्गुण निराकार ईश्वर सगुण साकार होकर हमें हर परिस्थिति पर बोलना, चलना, व्यवहार, अधिकार और वाणी का उपयोग करके जीवनदान देता है। सगुण उपासक के समक्ष आदर्श प्रत्यक्ष होता है, वह उस प्रत्यक्ष शब्द विग्रह या लीला को देखकर सीख भी सकता है और सावधान भी रह सकता है। निर्गुण निराकार साधना में व्यक्ति के समक्ष कोई आदर्श और संबल प्रत्यक्ष नहीं होता है। इस कारण से बहुत संभावना इसकी बनी रहती है कि व्यक्ति अपनी ही मान्यताओं, स्वार्थ और अहंकार को धर्म का जामा पहनाकर कुछ भी करे और कुछ भी मानकर लोगों को बतलाने लग जाता है।
मनुष्य की यह प्रवृत्ति प्रत्येक युग में देखी गई है, जिसे देवता और दानव कहकर विभाजित भी किया गया है। देवता और दानवों के बीच में एक समुदाय होता है, जो मनुष्य रूप में सगुण ईश्वर के चरित्र, करुणा की आराधना पर आश्रित रहकर जीवन व्यतीत करना चाहता है, जिससे वह न तो स्वयं कष्ट भोगे और न ही किसी को कष्ट दे। तब उस प्रकार के लोगों के लिए धर्म, ग्रंथ, अवतार, संत और सत्संग मार्ग बताते हैं। निर्गुण निराकार आत्मा जब अवतार लेकर मनुष्य रूप में लीला करता है, तब वह अपने जीवन दर्शन, करुणा और कृपा के द्वारा जिस मंगलाचरण को करता है, वही है भागवत और वही है रामायण। इसको मानने और जानने वाले जिस मार्ग को स्वीकार करते हैं, उसी को कहते हैं सनातन। भगवान ने जो-जो किया, वह सब सनातन है। श्रीमद्भागवत में माहात्म्य सत्र में नारद जी ने कलियुग का वर्णन करके पृथ्वी और काल की दशा का वृहद वर्णन किया है।
