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शरद पूर्णिमा की रात क्यों खास है? श्रीकृष्ण के महारास से कोजागरी तक जानिए इसका रहस्य

Published: Mon, 19 Oct 2026 12:26 PM (IST)

शरद पूर्णिमा प्रकृति, अध्यात्म और चेतना के त्रिवेणी-संगम का महोत्सव है। अध्यात्म की दृष्टि से यह वही अनिर्वचनीय रजनी है, ...और पढ़ें

शरद पूर्णिमा का रहस्य: श्रीकृष्ण के महारास से आत्मज्ञान तक का आध्यात्मिक सफर

शरद पूर्णिमा का रहस्य: श्रीकृष्ण के महारास से आत्मज्ञान तक का आध्यात्मिक सफर

HighLights

  1. शरद पूर्णिमा की रात का आध्यात्मिक और आयुर्वेदिक महत्व

  2. श्रीकृष्ण के महारास और अद्वैत दर्शन से जुड़ाव

  3. 'कोजागरी पूर्णिमा' का अर्थ और आत्म-जागरण का संदेश

स्वामी अवधेशानन्द गिरि, जूनापीठाधीश्वर आचार्यमहामंडलेश्वर। शरद पूर्णिमा वह परम पुनीत रात्रि है, जब षोडश कौमुदीय कला संपन्न चंद्र देवता अपनी अमिय-सुधा से संपूर्ण चराचर जगत को अभिषिक्त करते हैं। आकाश से झरती धवल, शीतल रश्मियां धरा पर अमृत निष्पत्ति कर वनस्पतियों और औषधियों में प्राणतत्व का संचार करती हैं। आयुर्वेद में भी इस रात्रि को अत्यंत सिद्धिप्रदा माना गया है, जहां चंद्रमा की शुभ्र ज्योत्स्ना मानव के बाह्याभ्यंतर में शुचिता, आयुष्य और आरोग्यता का बीजारोपण करती है। यह वही अनिर्वचनीय रजनी है, जिसे श्रीमद्भागवत में महारास की संज्ञा दी गई -

"भगवानपि ता रात्रीः शरदोत्फुल्लमल्लिकाः।
वीक्ष्यरन्तुं मनश्चक्रे योगमायामुपाश्रितः।।"

यह रात्रि स्वयं "योगमाया" की है, जहां शीतल कौमुदी-प्रभा भगवान श्रीकृष्ण के ब्रह्मरस-माधुर्य में लीन हो जाती है। यहां प्रेम ही परम तत्व का रूप धारण करता है और पूर्ण समर्पण मोक्ष का सेतु बन जाता है। रासमंडल में एक ही श्रीकृष्ण का प्रत्येक दो गोपियों के मध्य प्रकट होना यही परम दिव्यता है कि अनेक में भासित तत्व वस्तुतः एक है। इस निशा में प्रवाहित होने वाला ब्रह्मरस अंतःकरण के समस्त आवरणों को तिरोहित कर आत्म-साक्षात्कार की परम जिज्ञासा, उत्सुकता और सत्यानुभूति की तत्परता को जाग्रत करता है। सुधा-पूर्ण शरदचंद्र की किरणें चेतना को विकारों से मुक्त कर विवेक, वैराग्य और ब्रह्मानुभूति की उच्चतम भूमिकाओं पर आरूढ़ करती हैं।

भगवत्पाद भाष्यकार भगवान आद्य शंकराचार्य के अद्वैत-आलोक में यह पूर्णिमा आत्मा की नित्य पूर्णता के बोध का पर्व है। चंद्रमा की कलाएं घटती-बढ़ती प्रतीत होती हैं, किंतु चंद्रबिंब स्वयं कभी क्षीण नहीं होता; क्षय-वृद्धि तो सूर्य, चंद्र और पृथ्वी की सापेक्ष स्थिति से उपजा आभास मात्र है। इसी भांति जन्म, जरा, सुख और दुख उपाधियों पर आरोपित अध्यास (भ्रम) हैं; आत्मा तो सदा पूर्ण है - "पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते।" प्रश्नोपनिषद् के अनुसार जब षोडश कलाएं पुरुष में विलीन होकर अपने नाम-रूप त्याग देती हैं, तब वह अकल और अमृत हो जाता है -"स एषोऽकलोऽमृतो भवति।"

श्रीमद्भागवत का शरद-वर्णन भी इसी तत्व का उद्घाटन करता है -

"शरदर्कांशुजांस्तापान् भूतानामुडुपोऽहरत्।
देहाभिमानजं बोधो मुकुन्दो व्रजयोषिताम्।।"

जैसे शरदचंद्र सूर्य-किरणों से उपजा ताप हर लेता है, वैसे ही आत्मबोध देहाभिमान-जनित संताप का शमन कर देता है। वर्षा के मेघ छंटते ही जैसे शरद का आकाश निर्मल हो उठता है, वैसे ही अज्ञान का आवरण हटते ही आत्मा स्वतः प्रकाशित हो उठता है। आदि शंकराचार्य "आत्मबोध" में कहते हैं -

"परिच्छिन्न इवाज्ञानात्तन्नाशे सति केवलः।
स्वयं प्रकाशते ह्यात्मा मेघापायेंऽशुमानिव।।"

सहस्र जलाशयों में प्रतिबिंबित होकर भी चंद्रमा एक ही रहता है। यही अद्वैत का परम रहस्य है और यही महारास का भी। जहां ज्ञान और प्रेम एक हो जाते हैं, वहीं शरद पूर्णिमा अपनी पूर्ण कला में उदित होती है। पौराणिक वचन है कि इस रात्रि वरदायिनी महालक्ष्मी स्वयं विचरण करती हैं -

"निशीथे वरदा लक्ष्मीः को जागर्तीति भाषिणी।
जगति भ्रमते तस्यां लोकचेष्टावलोकिनी।।"

"को जागर्ति" की इसी पुकार से यह "कोजागरी पूर्णिमा" कहलाती है, किंतु परम जागरण वही है, जिसमें साधक मोह-निशा से जागकर अपने ब्रह्मस्वरूप में प्रतिष्ठित हो जाए -“या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी"। शरद पूर्णिमा की धवल अमृतमयी शुभ्रता, आचार्य शंकर का अद्वैत-आलोक और महर्षि वाल्मीकि की कालजयी प्रज्ञा का यह त्रिवेणी संगम हमारे अंतस में भक्ति का माधुर्य, ज्ञान का गांभीर्य और कर्म की परम पवित्रता प्रतिष्ठित करे। समस्त चराचर का कल्याण हो। शुभम् भवतु !!