क्‍या है कथा 

हाथी के सिर वाले गणेश की सवारी इतने छोटे से चूहे पर क्यों होती है? यहां भी एक प्रतीक है. चूहा उस मंत्र की भांति है जो धीरे-धीरे अज्ञान की एक-एक परत को काट कर भेद देता है, और उस परमज्ञान की ओर ले जाता है, जिसका प्रतिनिधित्व गणेश करते हैं। हम सब इस कहानी से परिचित हैं कि गणेश जी कैसे हाथी के सिर वाले भगवान बने। शिव और पार्वती उत्सव मना रहे थे, जिसमें पार्वती जी मैली हो गयीं। यह एहसास होने पर वे अपने शरीर पर लगी मिट्टी को हटाकर उससे एक लड़का बना देती हैं। वह स्नान करने जाती हैं और लड़के को पहरेदारी करने के लिए कहती हैं। जब शिव लौटते हैं, वह लड़का उन्हें पहचान नहीं पाता है और उनके रास्ते को रोक देता है. तब शिवजी लड़के के सिर को काट देते हैं और अंदर प्रवेश कर जाते हैं। पार्वती चौंक जाती हैं। वे समझाती हैं कि वह लड़का उनका बेटा था और शिव जी को हर हालत में उसे बचाने का निवेदन करती हैं। शिव जी अपने सहायकों को उत्तर दिशा की ओर इशारा करते हुए किसी सोते हुए का सिर लाने के लिए कहते हैं। तब सहायक हाथी का सिर लेकर आते हैं, जिसे शिवजी लड़के के धड़ से जोड़ देते हैं और इस तरह गणेश की उत्पत्ति होती है।

 

ये हैं इस कथा के प्रतीक

क्या यह सुनने में कुछ अजीब सा है? पार्वती के शरीर पर मैल क्यों आया? सब कुछ जानने वाले शिव अपने ही बेटे को क्यों नहीं पहचान सके? शिव जो शांति के प्रतीक हैं, उनमें क्या इतना गुस्सा था कि वे अपने ही बेटे का सिर काट दें? और गणेश का सिर हाथी का क्यों है? पार्वती उत्सव की ऊर्जा का प्रतीक हैं। उनका मैला होना इस बात का प्रतीक है कि उत्सव के दौरान हम आसानी से राजसिक हो सकते हैं या अपने अन्दर किसी चीज के प्रति ज्वार ला सकते हैं, जिससे हम अपने केन्द्र से विचलित हो जायें। मैल अज्ञानता का प्रतीक है और शिव भोलेभाव, परमशांति और ज्ञान के प्रतीक हैं। गणेश ने शिव के पथ को रोका, इसका अर्थ यह है कि अज्ञानता (जो इस सिर का गुण है) ज्ञान को पहचान नहीं पायी। फिर ज्ञान को अज्ञानता मिटानी पड़ी। इसका प्रतीक यही है कि शिव ने गणेश के सिर को काटा।

कहानी का अर्थ

और हाथी का सिर क्यों? ज्ञान शक्ति और कर्म शक्ति दोनों का प्रतिनिधित्व हाथी करता है। हाथी के गुण सिद्धांतत: बुद्धि और अप्रयत्नशीलता है। हाथी का बड़ा सिर बुद्धि और ज्ञान का प्रतीक है। हाथी न तो किसी अवरोध से बचने के लिए घूम कर निकलता है और न ही कोई बाधा उसे रोक पाती है। वह सभी बाधाओं को हटाते हुए सीधे चलता रहता है। यह अप्रयत्नशीलता का लक्षण है। तो जब हम भगवान गणेश की पूजा करते हैं तो हमारे भीतर भी यही हाथी वाले गुण आ जाते हैं। 

गणेश का बड़ा पेट उदारता और पूर्ण स्वीकृति का प्रतीक है। गणेश के अभय मुद्रा में उठे हुए हाथ, संरक्षण का प्रतीक है। गणेश जी का एक ही दंत है जो एकाग्रचित होने का प्रतीक है। हाथी के सिर वाले गणेश की सवारी इतने छोटे से चूहे पर क्यों होती है? यह बात असंगत-सी लगती है न? यहां भी एक प्रतीक है, जो बहुत गहरा है. जो बंधन बांध कर रखते हैं, उसे चूहा कुतर कुतर कर समाप्त कर देता है। चूहा उस मंत्र की भांति है जो धीरे-धीरे अज्ञान की एक-एक परत को काट कर भेद देता है, और उस परमज्ञान की ओर ले जाता है, जिसका प्रतिनिधित्व गणेश करते हैं।

 

गणेश हमारे भीतर हैं

हमारे प्राचीन ऋषि बहुत बुद्धिमान थे, उन्होंने दिव्यता को शब्दों के बजाय प्रतीकों द्वारा अभिव्यक्त किया, क्योंकि समय के साथ शब्द बदल जाते हैं परंतु प्रतीक समयातीत होते हैं। इन गहरे प्रतीकों को हम भी मन में रखें, जब हम सर्वव्यापी शक्ति को गजानन गणेश के रूप में अनुभव करें, और साथ ही इसके प्रति भी पूर्ण सजगता रखें कि गणेश हमारे भीतर ही हैं।

 

By molly.seth