रंगों की भूमिका

भौतिक व आध्यात्मिक जीवन का सबसे सुंदर व आकर्षक पहलू रंग होते हैं। प्रकृति हमारे चहुंओर विभिन्न रंगों की नैसर्गिक छटा बिखेर रही है, लेकिन हम रंगों की तमाम बारीकियों से प्राय: अनभिज्ञ बने रहते हैं । आध्यात्मिक रूप से आभा और ऊर्जा के रूप में रंग अपनी उपस्थिति व अहमियत का एहसास कराते हैं। हम विभिन्न आध्यात्मिक प्रक्रियाओं के लिए भिन्न-भिन्न रंगों का प्रयोग करते हैं। इस तरह रंगों का जो कुछ भी प्रभाव होता है वह भले ही कुछ चीजों को ज्यादा प्रभावित करें, लेकिन ऐसा भी नहीं है कि रंग ही सब कुछ होते हैं। व्यक्ति लाल रंग पहनकर भी खराब मूड में हो सकता है और काला रंग पहनकर भी जोशीले मन का मालिक बन सकता है। आध्यात्मिक राह का पथिक हर विकल्प को आजमाने में माहिर होता है, क्योंकि इस पथ पर एक सही वातावरण बनाना होता है। इस मायने में रंगों की बड़ी भूमिका होती है।

ईश्वरीय रंग में रंगने का संदेश

श्रीकृष्ण योगेश्‍वर हैं और गीता भगवान के श्रीमुख से निकली वाणी है। श्रीकृष्ण अपने शिष्य अर्जुन को ग्यारहवें अध्याय में जब अपने ऐश्वर्य का दर्शन कराते हैं, तो ऐसा लगता है मानो जीवन अनेक रंगों से भरा हुआ है। सृष्टि में लाखों-करोड़ों रंग बिखरे पड़े हैं। हम रंग-बिरंगे फूलों पर मंडराती तितलियों को, नृत्य करते मयूर को देखते हैं तब हमारा मन प्रफुल्लित हो उठता है। सांसारिक व भौतिक जीवन में सुख-दुख, हर्ष-विषाद के क्षण भी आते रहते हैं। यह भी जीवन के अच्छे-बुरे रंग हैं। भगवान को रंग इतने प्रिय हैं कि वह राधा से, गोपियों से बरसाने जाकर होली खेलते हैं । सामाजिक जीवन में भी हम होली खेलते हैं, रंगों में नहाते हैं। यह एक प्रकार से रंगों की स्वीकारोक्ति है, जो हम अपने जीवन में करते हैं। मानव जीवन क्षण-भंगुर है। गीता कहती है आत्मा ही सत्य है। महापुरुष इसी सत्य से स्वयं को रंग कर भगवान की शरण प्राप्त करते हैं। आत्मा और परमात्मा दोनों सनातन हैं। हमारे यहां ईश्वरीय प्रेम के हजारों आख्यान हैं। प्रेम अर्थात अनुराग का रंग लाल माना गया है। गीता के उपदेश भी अर्जुन को ईश्वरीय रंग में रंगने की गाथा है। रंग हमारे जीवन में आनंद भरते हैं। बदरंग जीवन दुखों की खान है। इससे बचें। यथार्थ गीता में बिखरे रंगों को अपने मन में धारण करें और अपने जीवन को खुशरंग बनाएं। 

 

By Molly Seth