क्रोध और ग्‍लानि 

क्रोध शांत होने पर मैं आत्मग्लानि महसूस करता हूं। समझ में नहीं आता कि मैं इस पर कैसे नियंत्रण करूं। यह जरूरी नहीं कि क्रोध किसी व्यक्ति पर ही आए, कभी-कभी देश और समाज के हालात पर भी मन अधीर होने लगता है। उद्विग्न मन कुछ भी नकारात्मक प्रतिक्रिया करने के लिए तैयार हो जाता है। ऐसी स्थिति 

में ज्यादातर लोग दो उपायों को अपनाते हैं। या तो वे अपने से कमजोर व्यक्ति पर अपना क्रोध तेज आवाज में बोलकर या हिंसा कर उतारते हैं या फिर सामान उठाकर इधर-उधर फेंक कर अपने दिल की भड़ास निकालते हैं। दूसरे उपाय के तहत वे अपने क्रोध को दबा देते हैं। हम अपनी हताशा और बेचैनी को दिल और दिमाग की कई परतों में छुपा देते हैं और इसे ‘मौनं सर्वार्थ साधनं’ की संज्ञा दे देते हैं। वास्तव में यह मौन नहीं, कुंठा है। हम जबरन गंभीरता व तटस्थता का आवरण ओढ़ लेते हैं, पर वक्त-बेवक्त दबा हुआ क्रोध मन के घाव के रूप में रिसता रहता है। ऐसे में कुंठित मन दिशाहीन हो जाता है। यदि उत्तर दिशा की ओर जाना है, तो हम अकारण ही दक्षिण दिशा की ओर चलने लगते हैं।

 

प्रकृति से लें सीख

वातावरण में जब बहुत शांति दिखती है, तो हम आने वाले तूफान की आशंका जताते हैं। पृथ्वी के अंदर जब टेक्टोनिकल प्लेटों पर दबाव बढ़ता है, तभी भूकंप आता है। पृथ्वी की कमजोर सतह पाकर ज्वालामुखी फूट पड़ता है। तूफान या भूकंप का साम्य हमारे मन से है। क्रोध को दबाने में हम अस्थायी तौर पर भले ही सफल हो जाएं, लेकिन मन के ज्वालामुखी रूपी गुबार फूटने की आशंका बराबर बनी रहती है। महान मनोवैज्ञानिक कार्ल गुस्ताव जुंग कहते हैं कि अक्सर हम जो बुरा मानते हैं, उसे अचेतन में दबा देते हैं। यह दबा हुआ हिस्सा भीतर ही भीतर घुमड़ता रहता है। यदि उसे सही निकास नहीं मिलता है, तो वह एक विस्फोट की तरह फट पड़ता है। यदि समाज की हिंसा कम करनी है, तो दबे हुए क्रोध को सकारात्मक तरीके से बाहर निकालना बेहद जरूरी है। 

 

अन्याय का विरोध

जयशंकर प्रसाद कहते हैं कि अन्याय सहना अन्याय करने से अधिक गलत है। भारत को आजादी कदापि नहीं मिलती, यदि हम सब अंग्रेजों का अत्याचार सिर झुकाकर सहते जाते। यही बात रोजमर्रा के जीवन पर भी लागू होती है। हर छोटी बात पर क्रोधपूर्ण प्रतिक्रिया देना तो उचित नहीं है, लेकिन यदि किसी अन्याय के विरुद्ध आवाज उठाने या प्रतिकार करने से किसी का हित हो रहा हो या फिर समूह को फायदा पहुंच रहा हो, तो हमें ऐसा करने से हिचकना नहीं चाहिए। अंदर दबे क्रोध को बाहर निकालने के बाद ही चित्त शांत हो सकता है, बशर्ते यह ऊर्जा सकारात्मक रूप में सामने आए। सम्राट अशोक जब छोटी उम्र में अपने भाई और दोस्तों की ईष्र्यापूर्ण बातों से आहत होते, तो अत्यंत क्रोधित हो जाते। तब उनके गुरु उन्हें तत्क्षण प्रतिक्रिया देने की बजाय क्रोध की ऊर्जा को सकारात्मक मोड़ देने की सलाह देते।

 

ओशो का मार्ग 

शिक्षक बताते कि गुस्से की सही अभिव्यक्ति सुरक्षा भी देती है और अनावश्यक भावों से मुक्ति भी। गुस्से के क्षणों में लक्ष्य प्राप्ति की इच्छा प्रबल होती है। समाधान की दिशा में किया गया गुस्सा लक्ष्य की ओर ले जाता है। लक्ष्य पाने के लिए क्रोध की ऊर्जा को ध्यान और समाधि की तरफ मोड़ना होगा। ध्यान के अभ्यास से चेतन मन के अतिरिक्त अचेतन मन में छिपे तनाव को भी सतह पर लाकर दूर किया जा सकता है। इसलिए प्रतिदिन दस से पंद्रह मिनट तक किसी एक विषय पर आंखें बंद कर मन को एकाग्र करने का अभ्यास करें। विरोध हो जाएगा विलीन ओशो ने दबे क्रोध को बाहर निकालने के लिए रोचक, लेकिन महत्वपूर्ण उपाय बताया है। वे कहते हैं कि कमरा बंद कर अकेले बैठ जाएं। जितना क्रोध मन में आए, आने दें। यदि किसी को मारने-पीटने का भाव आ रहा है, तो किसी एक तकिये को मारें-पीटें। वह कभी मना नहीं करेगा। यह क्रिया बेतुकी लग सकती है, लेकिन यह कारगर है। क्रोध को होने दें और ऊर्जा की एक घटना के रूप में उसका आनंद लें। दरअसल, क्रोध ऊर्जा का नकारात्मक रूप है। रोज सुबह केवल बीस मिनट इस पर समय दें। इसे रोज का ध्यान बना लें। कुछ दिनों बाद आप शांत होने लगेंगे, क्योंकि जो ऊर्जा क्रोध बन रही थी, वह बाहर फेंक दी गई। किसी को पीड़ा देने का भाव धीरे-धीरे विलीन हो जाएगा और फिर किसी भी परिस्थिति में आपको क्रोध नहीं आएगा।

 

Posted By: Molly Seth