विज्ञापन हटाएंसिर्फ खबर पढ़ें

जीभ के दो काम और दोनों में संयम जरूरी, भागवत बताती है स्वाद और वाणी का महत्व

Published: Mon, 12 Oct 2026 02:58 PM (GMT+05:30)

श्रीमद्भागवत महापुराण में भगवान दत्तात्रेय ने अपने 24 प्राकृतिक गुरुओं से प्राप्त शिक्षा का राजा यदु के समक्ष वर्णन किया ...और पढ़ें

श्रीमद्भागवत से सीख: जिह्वा संयम, स्वाद और वाणी पर नियंत्रण का महत्व

श्रीमद्भागवत से सीख: जिह्वा संयम, स्वाद और वाणी पर नियंत्रण का महत्व

आचार्य नारायण दास (महंत, श्रीभरत मिलाप आश्रम, ऋषिकेश)। श्रीमद्भागवत महापुराण के एकादश स्कंध में भगवान दत्तात्रेय अपने 16वें गुरु मत्स्य को गुरु के रूप में स्वीकार कर रसनेंद्रिय की विघातक शक्ति तथा उसके नियंत्रण के शाश्वत विधान को महाराज यदु को उपदेशित करते हैं - हे राजन्! इस संसार में जीव को भव-बंधन में आबद्ध करने वाली समस्त ज्ञानेंद्रियों में रसना (जिह्वा) का आकर्षण सर्वाधिक दुर्जय तथा आलोडनकारी है। मनुष्य विविध बाह्य विषयों एवं इंद्रियों पर विजय प्राप्त कर सकता है, किंतु यदि वह रस-लोलुपता का दास बना रहता है, तो उसका सत्-असत् का विवेक और आत्म-संयम दोनों ही काल-कवलित होने के संकट से घिर जाते हैं।

जिह्वायातिप्रमाथिन्या जनो रसविमोहितः।
मृत्युमृच्छत्यसद्बुद्धिर्मीनस्तु बडिशैर्यथा॥

हे राजन्! जिस प्रकार विवेक-शून्य मीन (मछली) स्वादानुरागी होकर बडिश (कांटे) में आवेष्टित मांस-पिंड को निगल लेती है और कालांतर में स्वयं ही अपनी मृत्यु का वरण कर लेती है, ठीक उसी प्रकार यह अतिशय प्रमथनकारी चंचल जिह्वा के स्वादों से सम्मोहित विवेक-भ्रष्ट जीव अपने विनाश का मार्ग स्वयं प्रशस्त कर लेता है। अतः मुमुक्षु साधक को यह बोध होना अनिवार्य है कि इंद्रियों का सूक्ष्मतिसूक्ष्म आकर्षण भी विवेक के अभाव में घोर बंधन और आत्यंतिक विनाश का कारण बन जाता है।

अगाध जल-राशि में स्वच्छंद विचरण करने वाली मछली को बंदी बनाने हेतु किसी विशाल जाल की आवश्यकता नहीं होती; धीवर केवल बडिश (कांटे) में मांस का एक लेश मात्र संलग्न कर देता है। स्वाद के मदांध लोभ में मीन उस ग्रास को कवलित करती है और उसी क्षण बडिश में बिंध जाती है। जिस आस्वादन को वह सुख का साधन समझती है, वही उसके महाविनाश का हेतु बन जाता है। हे राजन्! मानव को इस रसनेंद्रिय के प्रति सर्वदा असंदिग्ध रूप से सजग रहना चाहिए। स्वाद अतीव क्षणभंगुर है, किंतु इसके पृष्ठभाग में निर्मित होने वाला आसक्ति-बंधन अतीव सुदूरवर्ती एवं दुस्तर होता है।

मत्स्य का यह प्राणांतक प्रसंग केवल एक प्राणी की कथा नहीं, अपितु मानव-मन की आंतरिक विषयासक्ति का यथार्थ दर्पण है। मीन कांटे के भयानक परिणाम को नहीं देखती, वह केवल मांस-खंड के तात्कालिक स्वाद से सम्मोहित होती है। इसी प्रकार विवेकहीन मनुष्य भी विषय-भोग के प्रच्छन्न कुपरिणामों की उपेक्षा कर तात्कालिक ऐंद्रिय सुख की ओर द्रुत गति से धावित होता है। जहां जिह्वा का प्रभुत्व स्थापित होता है, वहां संयम का क्षय अनिवार्य है। साधना का वास्तविक मर्म केवल बाह्य विषयों का परित्याग नहीं, अपितु विषय-सुख के उपस्थित होने पर अंत:करण में प्रस्फुटित होने वाली तृष्णा पर पूर्ण विजय प्राप्त करना है।

हे राजन्! जब तक साधक रसनेंद्रिय पर आत्यंतिक विजय प्राप्त नहीं कर लेता, तब तक अन्य इंद्रियों पर अर्जित संयम भी चंचल, अपूर्ण एवं अस्थिर ही रहता है। इसी कारण इंद्रिय-निग्रह के कल्प में रसना-संयम को सर्वाधिक दुष्कर तथा अनिवार्य स्वीकार किया गया है। रसनेंद्रिय-जय का तात्पर्य जीवन को नीरस अथवा रसहीन बनाना कदापि नहीं है, अपितु इसका तात्पर्य है-अन्न-जलादिग्रहण शरीर-पोषण की सात्विक आवश्यकता हेतु हो, न कि भोग लिप्सा हेतु। प्रसाद-बुद्धि से अनुप्राणित हो, न कि काम-बुद्धि से चालित।

जब साधक इस तत्व को हृदयंगम कर लेता है कि मैं स्वाद का भोक्ता नहीं, अपितु इस देह-रूपी देवालय का संरक्षक हूं, तब रसना पर उसका स्वाभाविक अधिकार सिद्ध होने लगता है। जिह्वा पर प्राप्त यह विजय केवल आहार तक सीमित नहीं रहती, अपितु वाणी में भी अभिव्यक्त होती है। जो रसना स्वाद के पीछे उन्मत्त रहती है, वही कटु-भाषण, असत्य-वादन तथा अनर्गल प्रलाप की ओर भी प्रवृत्त होती है। अतः जिह्वा-संयम के दो मुख्य स्तंभ हैं-रसना-संयम एवं वाणी-संयम। जिसने रसना को वशीभूत कर लिया, उसने अध्यात्म-सोपान की एक अत्यंत दुष्कर श्रेणी को उत्तीर्ण कर लिया।

हे राजन्! मेरे मत्स्य-गुरु से प्राप्त यह शिक्षा प्रत्येक आध्यात्मिक साधक के लिए के वरदान है। क्षणिक ऐन्द्रिय तृप्ति के लिए अपनी शाश्वत आत्म-शान्ति को विनष्ट नहीं करना चाहिए। जिह्वा को अपना स्वामी न बनने दो, अपितु उसे अपना आज्ञाकारी सेवक बनाओ। स्वाद पर विजय ही वास्तव में मन पर पूर्ण विजय है। मैंने अपने मत्स्य-गुरु से यही परम शिक्षा ग्रहण की है कि केवल देह-यात्रा के निर्वाह हेतु अन्न-जल ग्रहण करना चाहिए, न कि जिह्वा की लोलुपता के वशीभूत होकर।