बुरे कार्य हैं दिमागी रोग

मान लीजिए कि कोई आदमी बीमार पड़ गया है। वह उस बीमारी को प्रकट करता है, क्योंकि प्रकट करने से रोग समझ में आ जाता है। फिर उसे कड़वी दवा पिलाई जाती है। आवश्यकता पड़ने पर कभी-कभी रोगी का ऑपरेशन भी किया जाता है। रोगी की बीमारी को ठीक करने के लिए जो उपाय किया जाता है, वह उपचार या सेवा कहलाता है। उससे उसे बीमारी से मुक्ति मिल जाती है। यदि कोई व्यक्ति गलत काम करता है, तो उसकी दुनिया में निंदा होती है। फिर वह अपनी गलतियों को छुपाने लगता है। इस तरह मानसिक बुराइयां छिपाते रहने से उनके निवारण का रास्ता नहीं मिलता। इस कार्य में दूसरों की मदद भी नहीं मिल पाती है। समाज में यह विचार पैठ जाना चाहिए कि सभी बुरे कार्य शरीर के स्थूल रोगों के समान ही मानसिक रोग हैं।

 

दंड देने से बढ़ती हैं दोषों को छुपाने की प्रवृत्‍ति

हम रोगी से घृणा नहीं करते, बल्कि उसकी ओर दया की दृष्टि से देखते हैं। उसके रोग को समाप्त करने की कोशिश करते हैं। यदि किसी व्यक्ति को कोई गंभीर रोग हो गया है, तो अस्पताल में सभी उसकी ओर घृणा नहीं, बल्कि दया की दृष्टि से देखते हैं। इसी तरह यदि मानसिक बुराइयों की ओर घृणा की दृष्टि की बजाय दया की दृष्टि से देखा जाए तो समाज जल्दी सुधरेगा। समाज में जब दोषों के प्रति घृणा नहीं होगी, तभी वे कम होंगे। कुछ लोगों को लगता है कि समाज से दंड देने वाली व्यवस्था मिट जाएगी तो मनुष्यों के दोष खुलेआम फैलेंगे, लेकिन यह विचार गलत है। आज दंड देकर सब दोषों को दबाने-छिपाने की प्रवृत्ति बढ़ी है। 

असत्‍य है सबसे बड़ा दुर्गुण

उससे अंत:शुद्धि नहीं होती, परिणामस्वरूप बुराइयां फैलती हैं। इसलिए मेरी मान्यता है कि सब लोगों को खासकर आध्यात्मिक साधना करनेवालों को सत्य को कभी छुपाना ही नहीं चाहिए। मेरी दृष्टि से तो सब सद्गुणों में सबसे श्रेष्ठ सद्गुण सत्य है। सब दुर्गुणों में असत्य सबसे अधिक खराब दुर्गुण है, ऐसा मैं मानता हूं। यही सर्वोत्तम साधना होगी, यदि जीवन से असत्य को समाप्त किया जाए। उपनिषद में कहा गया है-सत्य का मुख हिरण्यमय पात्र से ढंका हुआ है। मैं सत्य धर्मा हूं। इसलिए हे प्रभो, वह असत्य का पर्दा दूर कर दो। यही सर्वोत्तम साधना है।

 

By Molly Seth