माघ पूर्णिमा को हुआ जन्म 

रैदास नाम से पहचाने जाने वाले संत रविदास का जन्म माघी पूर्णिमा के दिन काशी यानि वर्तमान बनारस या वाराणसी में हुआ था हालांकि उनके जन्म साल को लेकर कुछ विवाद होता रहा है। कुछ का मानन है कि उनका जन्म माघी पूर्णिमा 1388 को हुआ था जबकि कुछ विद्वान इसे दस साल बाद 1398 में हुआ बताते हैं। पर माघ माह की पूर्णिमा को हुआ था ये तो तय जो इस वर्ष मंगलवार 19 फरवरी को है।

कबीर के साथी आैर मीरा के गुरू

प्राचीन मान्यताआें के अनुसार संत रविदास को संत कबीर का समकालीन माना जाता है। साथ ही ये भी कहते हैं कि मीराबार्इ उन्हें अपना गुरू मानती थीं। कहते है कि रविदास जी की प्रतिभा से सिकंदर लोदी भी काफी प्रभावित हुआ था आैर उन्हें दिल्ली आने का अनुरोध किया था। कबीर दास ने एक बार उनको संतन में रविदास कह कर श्रेष्ठ कवियों अग्रणी भी बताया था। उनके द्वारा रचित चालीस पद सिखों के पवित्र ग्रंथ गुरुग्रंथ साहब में भी सम्मिलित किए गए हैं।

दिखावे आैर पाखंड के विरोधी

रविदास की रचनाआें को पढ़ कर यह स्पष्ट हो जाता है कि वो मूर्तिपूजा, तीर्थयात्रा जैसे दिखावों आैर पाखंडों में उनकी बिल्कुल भी आस्था नहीं थी। वे सहज व्यवहार आैर शुद्घ अंतकरण को ही सच्ची भक्ति मानते थे। इस बारे में एक किस्सा अक्सर कहा सुना जाता है। इसके अनुसार किसी पर्व पर कुछ लोग गंगा स्नान के लिए जा रहे थे, उन्होंने रविदास जी से भी चलने का आग्रह किया। इस पर उन्होंने कहा कि वे अवश्य जाते अगर उन्होंने समय पर एक व्यक्ति का काम करने का वचन ना दिया हो। पेशे से जूते गांठने वाले रविदास को उस दिन एक जूता तैयार करना था। उन्होंने कहा वचन भंग करने पर उन्हें गंगा स्नान का पुण्य कैसे मिलेगा। साथ ही उनका मन तो अपने काम में लगा होगा तो वो अपना मन भक्ति में नहीं लगा पायेंगे तो भी स्नान व्यर्थ हो जायेगा। इसलिए वो घर पर ही स्नान करके गंगा को प्रणाम करेंगे आैर उनकी पूजा पूर्ण हो जायेगी। कहते हैं तभी से ये कहावत प्रचलित हुर्इ कि "मन चंगा तो कठौती में गंगा"।

Posted By: Molly Seth

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