जगत को मिथ्‍या मानते थे

आचार्य विनोबा भावे बताते हैं कि शंकाराचार्य ने छह पदों का प्रार्थना का स्तोत्र रचा है। उसमें एक श्लोक है- अविनयमपनय विष्णो, दमय मन: शमय विषयमृगतृष्णाम् भूतदयां विस्तारय तारय संसारसागरत:।। 

अर्थात हे ईश्वर, आप मेरी भूतदया का विस्तार करें। शंकराचार्य अद्वैत के महान द्रष्टा थे। अद्वैत अनुभव में किस तरह आएगा? तुम और मैं एक हैं। जीवमात्र और परमेश्वर एक हैं-यह तो एकता की सीमा हो गई। यदि हम ईश्वर के साथ अपनी एकता का दावा करते हैं, तो भूतदया यानी प्राणियों के प्रति दया भाव का विस्तार ही साधना बन जाती है। यदि मानव मात्र से प्रेम हो यानी प्रेम का विस्तार होता जाए, तो वहां अद्वैत की अनुभूति होती है। शंकराचार्य इस जगत को मिथ्या, तुच्छ समझते थे। दुनिया में किसी भी प्रकार का रस नहीं। 

जीवन के प्रति दृष्‍टिकोण

वे ऐसे मायावादी अद्वैती थे। फिर भी उनकी लिखी प्रश्नोत्तरावली में एक प्रश्न है-क: फली? अर्थात फलवाला कौन? किसका जीवन सफल गिना जाता है? उत्तर में लिखा है-कृषिकार का, जो खेती करता है। वह फलवान, उसका जीवन सफल मानना चाहिए। जगत को मिथ्या मानने वाले शंकराचार्य ऐसा लिख रहे हैं। वे फिर आगे लिखते हैं- कुत्र विधेयो यत्न:? किस विषय में मनुष्य को यत्न करना चाहिए? उत्तर देते हैं- विद्याभ्यासे सदौषधे दाने। तीन विषयों में मनुष्य को यत्न करना चाहिए। विद्याभ्यास, उत्तम औषधि योजना अर्थात स्वास्थ्य योजना, दान की प्रक्रिया सर्वत्र जोरदार चलानी चाहिए। अज्ञान दूर करने के लिए विद्याभ्यास, रोग निकालने के लिए अच्छी औषधि की योजना और गरीबी दूर करने के लिए दान करना पड़ता है। शंकराचार्य कहते हैं-दानं संविभाग:। अपना काट कर दूसरों को देना। यह बहुत बारीक विचार है। जो आपके अपने लिए है, उसमें कटौती करके दान देना चाहिए।

 

By Molly Seth