विज्ञापन हटाएंसिर्फ खबर पढ़ें

नवरात्र में सिर्फ पूजा-पाठ नहीं, इन 3 बातों को जीवन में उतारना भी है मां की सच्ची आराधना

Published: Mon, 12 Oct 2026 02:45 PM (IST)

जीवन में सत्य, प्रेम और करुणा को अंगीकार करना देवी पूजा ही है। कम से कम नवरात्र के इन नौ ...और पढ़ें

नवरात्रि में मोरारी बापू के विशेष संदेश

नवरात्रि में मोरारी बापू के विशेष संदेश

मोरारी बापू, (कथावाचक)। मेरे लिए पूरा जगत जगदंबामय में है। अगर बात नौ दुर्गा की करनी है तो मैं व्यक्तिगत रूप में यह भी कह सकता हूं कि 'या देवी सर्वभूतेषु राम रूपेण संस्थिता।' मां के कितने ही रूप बताए गए हैं- क्षमा रूपेण, बुद्धि रूपेण, करुणा रूपेण, लेकिन राम कथा के नाते मैं कहूं तो मेरे लिए यह भी एक रूप है- राम रूपेण संस्थिता। तुलसीदास कहते हैं-

गिरा अरथ जल बीचि सम कहिअत भिन्न न भिन्न।
बंदउं सीता राम पद जिन्हहि परम प्रिय खिन्न।।

जिस प्रकार वाणी और उसका अर्थ, तथा जल और जल की लहर कहने में अलग-अलग प्रतीत होते हैं, पर वास्तव में वे एक ही (अभिन्न) हैं, वैसे ही मैं श्री सीतारामजी के चरणों की वंदना करता हूं, जिन्हें दीन-दुखी और पीड़ित लोग अत्यंत प्रिय हैं। दूसरी दुर्गा, 'या देवी सर्वभूतेषु कृष्ण रूपेण संस्थिता। पारांबा हैं कृष्णा। तत्वतः मूल में कोई अंतर नहीं है। राधा कौन है? आह्लादिनी शक्ति। राधा और कृष्ण तत्वतः एक हैं। व्यक्तिगत रूप से मैं कहूं तो तीसरी दुर्गा है 'या देवी सर्वभूतेषु शिव रूपेण संस्थिता।' शिव शिवा। कालिदास ने रघुवंशम् में कहा है- वागर्थाविव संपृक्तौ वागर्थप्रतिपत्तये। जगतः पितरौ वंदे पार्वतीपरमेश्वरौ॥ जिस प्रकार शब्द और उसका अर्थ एक-दूसरे से अलग नहीं हो सकते, उसी प्रकार माता पार्वती और भगवान शिव भी अविभाज्य हैं। दुर्गा का चौथा रूप है - 'या देवी सर्वभूतेषु सत्य रूपेण संस्थिता।'  

पांचवां है - 'या देवी सर्वभूतेषु प्रेम रूपेण संस्थिता।' छठा है - 'या देवी सर्वभूतेषु करुणा रूपेण संस्थिता।' मेरी दृष्टि में जीवन में सत्य, प्रेम, करुणा को अंगीकार करना देवी पूजा ही है। कम से कम इन नौ दिनों में हमको सत्य, प्रेम और करुणा के मार्ग पर चलना चाहिए। हम देखेंगे धीरे-धीरे पूरे वर्ष हम इसी मार्ग पर चलने लगेंगे। सातवीं देवी हैं - 'या देवी सर्वभूतेषु गंगा रूपेण संस्थिता।' आठवां  रूप है - 'या देवी सर्वभूतेषु कथा रूपेण संस्थिता।' देवी का नौवां रूप है- 'या देवी सर्वभूतेषु मातृरूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः। प्रत्येक व्यक्ति की अपनी मां भी नवदुर्गा है। तत्वतः सब एक हैं ।

तुलसीदास कहते हैं राम कथा दुर्गा है। राम कथा कालिका। कथा महाकाली, महासरस्वती और महालक्ष्मी तीनों का विश्व में विस्तार है। कथा दुर्गा है तो ये दुर्गा करती क्या हैं? कथा दुख भगाती है। दब गए सुख को प्रगट करती है। सुख हैं मगर दब गए हैं। सापेक्ष हैं सुख-दुख। कथा दुर्गा मोह भंग करती हैं। कथा दुर्गा संशयों को जलाकर भस्म करती है। कथा विश्राम देते-देते "पायो परम विश्राम" तक लिए चलती है। जीवन में कुछ हो जाए, उसके लिए कथा मत सुनो। जीवन में जो हो रहा है, उसको समझने के लिए कथा सुनो। कथा अतिशय ममता को संतुलित करती है। अति ममता अधर्म के रास्ते पर ले जा सकती है। कथा दुर्गा ऐसा होने से रोकती है।

मुझे कहने दो, हनुमान भी दुर्गा है, जगदंबा है। पाताल में अहिरावण के बंधन से भगवान राम को मुक्त करने के लिए जब हनुमान जी गए हैं तो वहां दुर्गा को भोग लगाना था। उसी समय श्रीहनुमान पुष्प के रूप में दुर्गा के सिर पर दबाव करके स्वयं दुर्गा रूप धारण करते हैं। तो हनुमंत तत्व भी दुर्गा तत्व है। सब आखिर में एक हैं। रामचरितमानस में जानकी जी मां दुर्गा की पूजा करती हुई कहती हैं- देबि पूजि पद कमल तुम्हारे। सुर नर मुनि सब होहिं सुखारे।। हे मां, तेरे चरण कमल की पूजा करने से तीन समाज सुखी हो जाते हैं। सुर-नर-मुनि, लेकिन साथ में सब की बात की है।

जो सबको सुख दे, वो ही दुर्गा हैं। मां किसी के साथ भेद नहीं करती। हमारी मांग क्या है? सर्वे भवंतु सुखिनः सर्वे संतु निरामया। हम भारतीय सर्वमंत्र लिए बैठे हैं। यहां जानकी परांबा हैं और उनके सामने जगदंबा बैठी हैं। मैं कहता रहता हूं कि कुंवारी कन्याओं को दुर्गास्तुति का एक बार पाठ जरूर करना चाहिए। परिणाम भी आते हैं। न आएं तो भी क्या? कम से कम पाठ तो कर रहे हैं। मैं प्रलोभन तो देता नहीं कि तुम यह करो तो यह फायदा होगा, यह करो तो यह होगा। तुम कर लो, यही परिणाम है।

नवरात्रि के ये नौ दिन शक्ति को गतिशील बनाने के दिन हैं। मां शक्तिरूपिणी हैं। हमारे भीतर की शक्ति को जाग्रत करती हैं। पूरे विश्व को, चाहे कोई आस्तिक हो या नास्तिक, सभी को शक्ति की आवश्यकता है। उसके रूप अलग-अलग होते हैं। हर एक को ज्ञान चाहिए। ज्ञान भी शक्ति है। ये शंकराचार्य का शब्द है- ज्ञानशक्ति। सभी को आनंद शक्ति चाहिए। उपनिषदीय सूत्र है-आनंद ब्रह्मोती व्यजानात।

गोस्वामी तुलसीदास कहते हैं- राम स्वयं दुर्गा हैं। राम अंबा हैं, अंबिका हैं। तुलसीदास कहते हैं- दुर्गा कोटी अमित अरिमर्दन। अमित दूषणों को नष्ट करने वाली अमित दुर्गा रूप, अनेक हाथों वाली दुर्गा राम हैं। राम तत्व दुर्गा है। हम अगर राम नाम का जप करते हैं तो हमें तीन बातों का ध्यान रखना चाहिए। एक, राम नाम जपने वाला किसी का शोषण न करे, बल्कि दूसरों का पोषण करे। भरत नाम इसलिए आया कि राम नाम जपने वाला सबको हरा-भरा कर दे। दूसरा, राम नाम जपने वाला वैरी के साथ भी वैर न रखे। शत्रुभाव न रखे। तीसरा, लक्ष्मण की तरह धरती को धारण करें अर्थात हम जितने को धारण कर पाएं, करें। कोई गरीब विद्यार्थी आर्थिक तंगी के कारण पढ़ाई से वंचित होने लगे तो उसकी फीस, पुस्तकों और हास्टल के पैसे भर दें। यह राम रूप दुर्गा की उपासना और राम नाम जपने की सबसे बड़ी सार्थकता होगी। हम पूरे साल ऐसा न भी कर पाएं तो कम से कम नवरात्र के नौ दिनों में तो ऐसा करने का प्रयास करना चाहिए। मुझे विश्वास है प्रत्येक दिशा से प्रकृति, मां शक्ति हमें आशीर्वाद देंगी।

एक बात और, जो बहुत महत्व की है। नवरात्र के दिनों मे हम अपनी परंपराओं के अनुसार, निष्ठा के अनुसार पूजा-पाठ करें, मगर सच्ची नवरात्र पूजा यह मनोकामना है कि पहली संतान पुत्री के रूप में जन्म ले। कन्या का जन्म हो तो उत्सव मनाओ। पर्वतराज हिमालय के घर पार्वती का जन्म हुआ तो उत्सव मनाया गया। हिमालय की समृद्धि में वृद्धि हुई। कन्या जगत जननी है। हम स्त्री-शक्ति का सम्मान करें।

देबि पूजि पद कमल तुम्हारे। सुर नर मुनि सब होहिं सुखारे।।