यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Jun 03, 2022 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।
स्वीकारोक्ति: गलतियों को खुले मन से स्वीकार करें...
अपने अवगुण या खोट को स्वीकार करना श्रेष्ठ मानवीय गुण है। औसत सोच के व्यक्ति को अपनी गलती स्वीकारने में ...और पढ़ें

नई दिल्ली, हरीश बड़थ्वाल। कार्य संपन्न होने की प्रक्रिया में कदाचित त्रुटियां रह सकती हैं, भले ही कार्य निष्ठा से किया जाए। अगर कोई आपके किए-कराए में चूक निकाले, उस पर टिप्पणी करे तो नाराज होने के बजाय उसे खुलेमन से स्वीकार करें। वैसे आप गलतियां करने से तभी बच पाएंगे, जब कुछ नहीं करेंगे।
अपने अवगुण या खोट को स्वीकार करना श्रेष्ठ मानवीय गुण है। औसत सोच का व्यक्ति ऐसा करने में असमर्थ होता है। अवांछनीय या अनुचित कार्य की अनदेखी का अर्थ है संशोधन के द्वार बंद कर देना। सर्वगुणसंपन्न व्यक्ति तो साक्षात देवता है। भूल-चूक की स्वीकारोक्ति प्रगति की राह में पहला चरण है। इस प्रक्रिया में आप अनेक व्यक्तियों का विश्वास जीतते हैं। जिस सत्य का सामना करने के लिए तैयार नहीं, उसे बदलेंगे कैसे?
जिसे अपनी अपूर्णताओं का आभास नहीं वह मूर्ख नहीं, बल्कि दयनीय है, क्योंकि ऐसा व्यक्ति अपने अवगुणों को दूर नहीं कर सकेगा। जिस सीमा तक हम अपनी अपूर्णताओं और अवांछनीय व्यवहार के प्रति सजग रहेंगे और समाधान की ओर अग्रसर रहेंगे, उसी अनुपात में हम नैतिक रूप से समृद्ध होंगे। व्यावहारिक जीवन में संयमी, संयत व्यक्ति से भी भूल-चूक हो जाती है।
उन्नत सोच का व्यक्ति अपनी भूल को तुरंत स्वीकार कर लेगा। मध्यम सोच वाले को गलती का अहसास तो होगा, वह मन में कुढ़ेगा भी, किंतु लज्जित होने की आशंका से वह गलती को खुलेआम नहीं मानेगा। अपनी छवि के प्रति अत्यंत चौकस अधिसंख्य व्यक्ति अपने गलत कार्य या कथन की वैसी संरक्षा करेंगे जैसे सद्गुण या शील दांव पर हो।
एक खरे न्यायाधीश ने आदेश सुनाया, ‘हम भलीभांति समझ रहे हैं कि अमुक व्यक्ति ने अपराध किया है, किंतु साक्ष्य के अभाव में उसे रिहा किया जाता है।’ इस कथन में स्वीकारोक्ति है कि न्यायिक व्यवस्था में गंभीर त्रुटियां हैं। वास्तव में भूल सुधारने वाला कालांतर में सुदीर्घ प्रतिष्ठा अर्जित करता है।
