क्या आपका मन भी हमेशा अशांत रहता है, तो ब्रह्मा कुमारी शिवानी से सीखें कैसे पाएं शांति?
मन की शांति आत्मा का निजी स्वभाव है, जो हमें परमात्मा देते हैं। भीतर की नकारात्मकता को हटाकर हम उस शांति रूपी प्रकाश को खोज सकते हैं।

ब्रह्मा कुमारी शिवानी (प्रेरक वक्ता)। आज संसार में स्थूल साधन-संसाधन व सुख-सुविधाओं की कमी नहीं है, पर शांति और सच्ची खुशी नहीं है। इनके अभाव में मानव जीवन नीरस है। मन की शांति कोई वस्तु नहीं है, यह तो हर आत्मा का निजी गुण व स्वभाव है। इसे हम आत्मज्ञान व परमात्म योग व ध्यान के अभ्यास से प्राप्त कर सकते हैं। क्योंकि हमारा अंतरात्मा शांति का स्वरूप है, तो सर्व आत्माओं के परमपिता परमात्मा शांति के सागर हैं। अत: मन की शांति हमारे ईश्वर प्रदत्त जन्मसिद्ध अधिकार है। उसे हमेशा साथ रखने से जीवन के हर स्तर पर हमें सफलता मिलती है।
मन की सच्ची शांति बाहरी परिस्थिति या परिवेश पर निर्भर नहीं होती। उसे अनुभव करने के लिए हमें अपने संकल्प, वाणी, कर्म व दृष्टिकोण को शुभ, आशावादी एवं सकारात्मक बनाना होता है। क्योंकि, हमारे अंदर जब अनावश्यक, व्यर्थ व नकारात्मक सोच-विचारों का प्रवाह अधिक होता है, तब हम दुख, अशांति व तनाव का अनुभव करते हैं। वहीं, जितना अधिक हम समर्थ व सकारात्मक चिंतन व भावनाओं में रहते हैं, उतना अधिक हमारे मन में शांति, प्रसन्नता, उमंग व उल्लास की आंतरिक स्थिरता बनी रहती है।
ऐसी अवस्था को प्राप्त करने के लिए हमें अपनी विचारों पर नियंत्रण पाना आवश्यक है। देखा जाए तो, मन में अनवरत अनेक प्रकार के संकल्प-विकल्प चलते हैं। मुख्य रूप से चार प्रकार के विचार चलते हैं: सकारात्मक, नाकारात्मक, जरूरी और व्यर्थ। इन सभी संकल्प-विकल्पों को लेकर हमारे मन बहुत अधिक सोचता है। इसलिए हमें सुबह के समय से लेकर पूरे दिन में अधिक सकारात्मक, शांत और शक्तिशाली विचारों का चिंतन करना है, ताकि मन में व्यर्थ संकल्पों को आने का अवसर न मिले। हमें अपने अंदर दो विशेष शक्तियों को विकसित करना है- परखने और निर्णय लेने की शक्ति।
इन दोनों शक्तियों के साथ छह अन्य सहयोगी शक्तियां भी हमारे अंदर विद्यमान है, जैसे कि समेटने की, समाने की, सहन करने की, सामना करने की, सहयोग करने की अथवा विस्तार को सार में परिवर्तन करने की शक्ति आदि। इन कुल अष्ट शक्तियों को हम परमात्म ज्ञान व सहज राजयोग ध्यान के नियमित अभ्यास से अपने अंदर जगा सकते हैं और सही समय पर उनका उपयोग कर सकते हैं।
मानसिक शांति, प्रसन्नता एवं सबके सहयोग से किया गया कोई भी कार्य सदा सफल होता है, जबकि प्रभु स्मृति व सर्व की सहमति के बिना अशांति, अनिच्छा से किया गया कर्म कुछ न कुछ फल तो देता है, लेकिन उससे पूर्ण सफलता वा संपूर्ण संतुष्टता का बोध नहीं होता है। वास्तव में, अंतरात्मा व परमात्मा की स्नेहसिक्त स्मृति में रहकर जब हम प्राणी, प्रकृति व मानवता की सेवा संवेदनशीलता, निस्वार्थ भाव, शुभ भावना वा शुभ कामनाओं के साथ करते हैं और अपना तन, मन, धन, समय, संकल्प, संबंध, संपत्ति व संसाधन को ईश्वर की देन समझ कर कार्य में लगाते हैं। तब हम उन साधनों को सही अर्थ में सफल करते हैं और संपूर्ण सफलता पाते हैं। ऐसे शांतिपूर्ण एवं सुखद व सफल जीवन के लिए हमें स्वस्थ और सकारात्मक जीवनशैली को अपनाना होगा। जैसे कि :
-सुबह का समय शांत होता है। इस समय हमें सकारात्मक चिंतन करना चाहिए, आध्यात्मिक पुस्तकों का पाठ व श्रवण करें।
-स्वीकार करें कि हमारे जीवन की सुख-शांति हमारे ही पूर्व कर्मों का फल है, जिससे अनावश्यक शिकायतें कम होंगी। हमें अपना वर्तमान और भविष्य के कर्मों को सुधारने को प्रेरणा मिलेगी।
-हम यथासंभव कम बोलें, धीरे बोलें, मीठा बोलें और तोल के बोलें, ताकि हमारी ऊर्जा बची रहें। अनावश्यक व व्यर्थ के बोल से वातावरण की शांति न बिगड़े।
-परिस्थितियों को देखने की नजरिया बदल सकते हैं। कठिन समय में विचलित न होकर सही प्रतिक्रिया करें और मानसिक शांति, शक्ति और स्थिरता को बनाए रखें।
-सुबह उठकर कम से कम 15 से 20 मिनट एकांत में बिताएं। ध्यान करें, शांतचित्त होकर भगवान को याद करें। उनसे शांति, शक्ति व नई प्रेरणा लेकर उमंग के साथ दिन का आरंभ करें।
-स्वयं को 'परमात्मा की संतान व शांत स्वरूप आत्मा' के रूप में महसूस करें। यह अभ्यास हमारी आंतरिक शक्तियों को उजागर कर चिंता व तनाव को दूर करेगा।
-रात को सोने से पहले भी पांच-दस मिनट आत्मावलोकन करें। जो गलती हो गई हो, उसे प्रभु को अर्पण कर उनकी पुनरावृत्ति न करने का संकल्प लें। पूरा दिन जैसे भी बीता हो, उसके लिए ईश्वर का धन्यवाद दें।
