धर्मग्रंथों में लिखा हुआ है कि अक्षय तृतीया के दिन जो व्यक्ति जल, सत्तू, अन्य खाने-पीने की वस्तुएं, पंखे, छाते और जूते-चप्पल आदि गरीबों और वंचितों को देकर उनकी मदद करता है, वह अक्षय पुण्य का भागीदार बनता है। धर्मग्रंथों का आशय स्पष्ट है कि सेवाभाव द्वारा अपने अंतस [हृदय] को विशाल और अक्षय बनाया जा सकता है। अक्षय तृतीया मुख्यत: देने का दिन है। जरूरतमंदों की किसी भी तरह से मदद करना दान कहलाता है। इस दिन गरीबों को दान के लिए जिन वस्तुओं को देने का विधान है, वे गर्मी के दिनों को मद्देनजर रखते हुए उनके लिए उपयोगी होती हैं। इस दिन प्यासों को पानी पिलाना, हवा करने के लिए पंखे देना, धूप से बचानेके लिए छाते देना, सत्तू पिलाकर ठंडक पहुंचाना तथा जल रहे पैरों को बचाने के लिए जूते-चप्पल पहनाना निश्चित रूप से पुण्य के काम ही हैं। साम‌र्थ्यवान इन सबके अतिरिक्त और जो कुछ भी संभव हो, उसका दान जरूरतमंदों को कर सकते हैं। दान की यह व्यवस्था हमारे ऋषियों ने समाज-सेवा के लिए ही बनाई है। निर्धनों को दान करके हम कोई अहसान नहीं करते, क्योंकि दान के बदले मिलने वाला आत्मसंतोष उस धनराशि से कहीं अधिक बड़ा है, जिसका वे व्यय करते हैं। आजकल अक्षय तृतीया को सोने की खरीद से जोड़कर इस पर्व के आध्यात्मिक स्वरूप को भौतिकता में रंग दिया गया है। लोग जरूरतमंदों की मदद को भूलकर संग्रह कर रहे हैं। जबकि धर्मग्रंथों में संग्रह (परिग्रह) को अनुचित बताया गया है। हालांकि मान्यता के अनुसार, क्रय की गईं स्वर्णादि वस्तुएं श्रीवर्धक होती हैं, लेकिन यह इस महापर्व का मुख्य कृत्य नहीं है।

आसमान छू रहा सोने का भाव आम आदमी की पहुंच से बाहर है। ऐसे में साधारण व्यक्ति के मन में यह कुंठा उत्पन्न नहीं होनी चाहिए कि सोना न खरीद पाने पर वह इस पर्व का लाभ उठाने से वंचित हो रहा है। क्योंकि धर्मग्रंथों में अक्षय तृतीया में संग्रह के बजाय दान को अधिक महत्व दिया गया है। भविष्यपुराण में कहा गया है- यत्किंचिद्दीयते दानं स्वल्पं वा यदि वा बहु। तत् सर्वमक्षयं यस्मात् तेनेयमक्षया स्मृता।। अर्थात अक्षयतृतीया के दिन कम या ज्यादा, जो कुछ भी दान दिया जाता है, वह अक्षयपुण्यदायी हो जाता है। शास्त्रों के अनुसार, वैशाख मास के शुक्लपक्ष की तृतीया के दिन त्रेतायुग आरंभ हुआ था, अत: युगादि तिथि होने के कारण इस दिन किए गए अच्छे कार्र्यो से अक्षय पुण्य प्राप्त होता है।

वैशाख शुक्ल तृतीया (अक्षय तृतीया) को ही प्रदोषकाल में परशुराम का जन्म हुआ था। नर-नारायण की जयंती-तिथि होने के कारण इस दिन बद्रिकाश्रम में भगवान बद्रीनाथ के दर्शन होते हैं। मान्यता है कि भगवान विष्णु का हयग्रीव-अवतार भी इसी दिन हुआ था। वैष्णव इस दिन ठाकुरजी के श्रीविग्रह (मूर्ति) पर चंदन का लेप करते हैं। वृंदावन के प्रमुख मंदिरों में चंदन-श्रृंगार देखने के लिए श्रद्धालुओं का तांता लगा रहता है।

गौड़ीय वैष्णव अक्षय तृतीया के दिन चंदन-यात्रा आयोजित करते हैं। श्रीजगन्नाथपुरी (उड़ीसा) में अक्षय तृतीया से ज्येष्ठ कृष्ण अष्टमी तक नरेंद्र-पुष्करिणी में चंदनयात्रा होती है। आषाढ़ शुक्ल द्वितीया के दिन होने वाली पुरी की रथयात्रा में प्रयुक्त होने वाले रथों का निर्माण अक्षय तृतीया के दिन से ही शुरू हो जाता है। ग्रामीण अंचलों में आखा तीज के नाम से विख्यात यह तिथि अनबूझा मुहू‌र्त्त कही जाती है। इस दिन लोग विवाह, गृहप्रवेश, शिलान्यास, दुकान अथवा फैक्ट्री की शुरुआत करते हैं।

इस प्रकार, इस महत्वपूर्ण तिथि अक्षय तृतीया पर साम‌र्थ्य के अनुसार स्वर्णादि वस्तुओं का क्रय तो करें, लेकिन गरीबों और वंचितों को उनकी जरूरत की चीजें दान कर उनकी मदद अवश्य करें। तभी हम सब अपने अंतस को अक्षय बना सकेंगे।

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