विज्ञापन हटाएंसिर्फ खबर पढ़ें

धृतराष्ट्र के 100 पुत्रों के बीच एक ऐसा बेटा भी था जिसने कौरवों का साथ नहीं दिया!

Published: Thu, 29 Oct 2026 06:30 PM (IST)

महाभारत में धृतराष्ट्र के पुत्र युयुत्सु की कहानी बताई गई है, जो कौरव होते हुए भी धर्म और सत्य के ...और पढ़ें

महाभारत का वो कौरव जो पांडवों के साथ लड़ा

महाभारत का वो कौरव जो पांडवों के साथ लड़ा

HighLights

  1. युयुत्सु धृतराष्ट्र और वैश्य दासी सुगधा के पुत्र थे।

  2. द्रौपदी चीरहरण के समय अधर्म के खिलाफ आवाज उठाई।

  3. महाभारत युद्ध में पांडवों का साथ दिया, हस्तिनापुर के राजा बने।

धर्म डेस्क, नई दिल्ली। हिंदू धर्म का सबसे विशाल और पवित्र महाकाव्य 'महाभारत' में हमें अक्सर दो पक्षों पांडव और कौरव के बारे में बताया जाता है। एक ओर धर्म और कर्तव्य के मार्ग पर चलने वाले पांचों भाई यानी पांडव जबकि दूसरी ओर सौ भाई जिन्हें हठ, अधर्म और अन्याय का प्रतीक माना जाता है। लेकिन आपको जानकार हैरानी होगी कि 100 कौरवों के समूह में एक भाई ऐसा भी था जिसके मन ने कभी भी अधर्म के मार्ग पर चलने की गवाही नहीं दी।

यह राजकुमार कोई और नहीं बल्कि धृतराष्ट्र के पुत्रों में से एक पुत्र 'युयुत्सु' की है। इस अकेले योद्धा ने इस बात को साबित कर दिया कि धर्म परिवार से हमेशा ऊपर रहा है। आइए जानते हैं महाभारत के इस अनसुने पात्र के बारे में जिसे सच्चाई और अच्छाई से आज भी दुनिया बेखबर है।

yuyutsu mahabharata the only kaurava brother who fought for pandavas and dharma

युयुत्सु कौन था?

धृतराष्ट्र का पुत्र युयुत्सु जिसके परम त्याग और धर्म के रास्ते को अपनाने के बाद भी वो जगह नहीं मिली जो उसे मिलनी चाहिए थी। राजा धृतराष्ट्र और रानी गांधारी के सौ पुत्र थे जिन्हें कौरव के नाम से जाना जाता है, लेकिन गांधारी ने युयुत्सु को जन्म नहीं दिया। दरअसल उनका जन्म धृतराष्ट्र और एक वैश्य दासी से हुआ था, जिनका नाम सुगधा था। इसी वजह से युयुत्सु राजकुमार होने के बाद भी उन्हें हमेशा दुर्योधन और उनके भाइयों से कम ही समझा जाता है।

जहां एक ओर दुर्योधन और बाकी भाई सत्ता के मद में डूबे हुए थे, वहीं युयुत्सु चुपचाप सबकुछ देखते और समझते थे। युयुत्सु नाम का असल मतलब 'युद्ध की इच्छा रखने वाला', लेकिन फिर उन्होंने कभी किसी राज्य या संपत्ति के लिए लड़ाई नहीं की बल्कि सत्य और न्याय के लिए कौरवों का साथ नहीं दिया।

अधर्म के खिलाफ उठाईं पहली आवाज

युयुत्यु के सच्चे चरित्र से पर्दा पहली बार तब उठा जब पांडव जुए में अपना सर्वस्व हार चुके थे और भरी सभा में द्रौपदी का अपमान किया जा रहा था। जब दुर्योधन के कहने पर दुशासन द्रौपदी को निर्वस्त्र करने की कोशिश करता है, तब भीष्म, द्रोण और कृपाचार्य जैसे बड़े-बड़े ज्ञान और योद्धा सिर झुकाए बैठे थे। उस समय भर सभा में सिर्फ दो लोगों ने इस घोर अधर्म के खिलाफ अपनी आवाज उठाईं। जिसमें एक धृतराष्ट्र के भाई विदुर और दूसरे उनके ही अपने पुत्र युयुत्सु थे।

युयुत्यु ने इस घटना को लेकर भरी सभा में अपने भाइयों को चेताया और इसे राक्षसी कार्य करार देते हुए कहा कि, इस पाप का फल पूरे कुरु वंश को भुगतना पड़ेगा। जब सभा में मौजूद सभी सम्मानित व्यक्ति भी इस घटनाक्रम पर चुप्पी साधे हुए थे, तब युयुत्सु ने साहस दिखाते हुए अपने ही भाइयों का विरोध किया था। यहीं से युयुत्सु ने खुद को कौरवों से अलग कर लिया।

yuyutsu mahabharata the only kaurava brother who fought for pandavas and dharma (1)

युयुत्सु को धर्मयुद्ध ने पुकारा

कुरुक्षेत्र युद्ध के समय जब पांडव और कौरव की सेना आमने-सामने थी, तब दुर्योधन ने अनोखी घोषणा करते हुए कहा कि, 'हमारी लड़ाई सिर्फ अधर्म से है किसी व्यक्ति से नहीं' अगर जिसे मेरी बात सही लगती है उसका कौरवों की सेना में स्वागत और जिसे लगता है कि इस युद्ध में हम गलत हैं, वो पांडवों की सेना में जा सकता है।

इस घोषणा के बाद कौरवों की सेना में एकदम से सन्नाटा छा गया। उसी सन्नाटे में से एक रथ कौरवों की सेना से निकलकर पांडवों के खेमे की ओर चलने लगा। उस रथ पर कोई और नहीं बल्कि खुद युयुत्सु सवार थे। उन्होंने पांडवों में सबसे श्रेष्ठ युधिष्ठिर के सामने हाथ जोड़ते हुए अपने भाइयों और अधर्म के खिलाफ लड़ने की इच्छा जताई।

महाभारत खत्म होने के बाद कौरव वंश का नाश हो गया। धृतराष्ट्र के 100 पुत्रों में से सिर्फ एक ही जिंदा बचा जिसका नाम युयुत्सु था। युद्ध के बाद युधिष्ठिर हस्तिनापुर के राजा बनें और युयुत्सु को मंत्री पद की जिम्मेदारी दी गई। युधिष्ठिर के 36 साल शासन करने के बाद जब पांडव स्वर्ग की यात्रा पर निकले तब उन्होंने हस्तिनापुर का राजा युयुत्सु को बनाया क्योंकि उस समय राज्य का उत्तराधिकारी अर्जुन का पोता परीक्षित काफी छोटा था।

युयुत्सु जिसे जीवन भर अपने ही भाइयों ने नहीं अपनाया, उसी ने आखिर में कुरु वंश की बागडोर संभाली और उसके भविष्य की रक्षा की।

यह भी पढ़ें- सोए व्यक्ति को लांघने से पहले पढ़ें महाभारत की यह कथा, हनुमान जी ने तोड़ा था भीम का अहंकार

यह भी पढ़ें- 'चीरहरण' से लेकर 'शकुनि का छल'... कैसे महाभारत के ये किस्से आज बन गए हमारी रोजमर्रा की बोलचाल का हिस्सा

अस्वीकरण: इस लेख में बताए गए उपाय/लाभ/सलाह और कथन केवल सामान्य सूचना के लिए हैं। दैनिक जागरण यहां इस लेख फीचर में लिखी गई बातों का समर्थन नहीं करता है। इस लेख में निहित जानकारी विभिन्न माध्यमों/ज्योतिषियों/पंचांग/प्रवचनों/मान्यताओं/धर्मग्रंथों/दंतकथाओं से संग्रहित की गई हैं। पाठकों से अनुरोध है कि लेख को अंतिम सत्य अथवा दावा न मानें एवं अपने विवेक का उपयोग करें।