हरिद्वार। श्रद्धापूर्वक जो कार्य किया जाता है वह श्राद्ध है। पितरों के निमित श्राद्धभाव व्यक्त कर कृतज्ञता ज्ञापित करने का यह पुनीत मौका होता है। पितृपक्ष के इन 16 दिनों में पितरों के निमित तर्पण और पिंडदान किया जाता है। इस पखवाड़े में कुछ खास दिन श्राद्ध के लिए महत्वपूर्ण होते हैं।

आश्रि्वन मास का कृष्ण पक्ष पितृपक्ष के नाम होता है। इसमें भाद्रपद मास की पूर्णिमा तिथि भी शामिल होती है। वैसे पितृपक्ष के सभी 16 दिनों में पितरों का श्राद्ध किया जाता है। शास्त्रज्ञा के तहत जिस तिथि को पूर्वज की मृत्यु होती है उसी तिथि को श्राद्ध किया जाता है। पितृपक्ष की सबसे खास तिथि नवमी होती है। कहते हैं कि नवमी को श्राद्ध करने से मातृ ऋण कम होता है। हालांकि शास्त्र यह भी बताते हैं कि जीवन में सभी ऋणों से मुक्ति मिल जाए, लेकिन मातृ ऋण से मुक्ति नहीं मिल पाती है। इसी प्रकार से चतुर्दशी की तिथि भी खास ही होती है।

शास्त्रीय मान्यता है कि अकाल मौत के शिकार हुए व्यक्तियों के निमित चतुर्दशी का श्राद्ध किया जाना चाहिए। इसके अलावा अमावस्या तिथि को ज्ञात-अज्ञात पितरों के निमित श्राद्ध किए जाने का शास्त्रीय विधान है। अमावस्या की तिथि के साथ ही पितृपक्ष संपन्न भी हो जाते हैं और पितर धरती से पितृलोक वापसी करते हैं। धर्माचार्य डॉ. शक्तिधर शर्मा शास्त्री बताते हैं कि यदि किसी पितर की श्राद्ध तिथि ज्ञात नहीं हो तो अमावस्या को श्राद्ध करना चाहिए। उन्होंने कहा कि पितृपक्ष में पितरों के निमित श्राद्ध करने से पितर तृप्त होकर आशीष प्रदान करते हैं।

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