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हर साल सावन में लाखों श्रद्धालु क्यों निकालते हैं कांवड़ यात्रा? कैसे सदियों से चली आ रही ये परंपरा आज भी है इतनी खास

Published: Wed, 05 Aug 2026 02:30 PM (IST)

सावन में लाखों श्रद्धालु कांवड़ यात्रा क्यों करते हैं, यह जानने के लिए इस परंपरा की शुरुआत और पौराणिक कथाओं ...और पढ़ें

सावन में कांवड़ यात्रा: जानें क्यों लाखों भक्त करते हैं यह पवित्र यात्रा और इसका महत्व (Picture Credit: AI Generated)

सावन में कांवड़ यात्रा: जानें क्यों लाखों भक्त करते हैं यह पवित्र यात्रा और इसका महत्व (Picture Credit: AI Generated)

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धर्म डेस्क, नई दिल्ली। सावन के पूरे महीने में 'बोल बम' के नारों के साथ लाखों कांवड़िए शिव भक्ति में सराबोर होकर यात्रा में शामिल होते हैं। जैसे ही महीना शुरू होता है, देश की सड़कें केसरिया कपड़े पहने भक्तों के सैलाब से भर जाती हैं।

ये श्रद्धालु नंगे पैर मीलों तक चलते हैं और बांस की बनी 'कांवड़' में गंगाजल भरकर ले जाते हैं। यह यात्रा सिर्फ एक तीर्थयात्रा नहीं होती है, बल्कि भगवान शिव के प्रति गहरी श्रद्धा का भी प्रतीक भी मानी जाती है।

राह चलते इन शिव भक्तों को देखकर मन में एक सवाल जरूर आता है कि आखिर 'कांवड़िया' कहलाने वाले ये भक्त कांवड़ यात्रा क्यों करते हैं? आखिर कब इस यात्रा की शुरुआत हुई होगी? आखिर क्यों लाखों श्रद्धालु शिव भक्ति में डूबकर ये यात्रा हर साल सावन में निकालते हैं? एक और सबसे अहम सवाल यह कि सदियों से चली आ रही ये परंपरा आज भी क्यों है इतनी महत्वपूर्ण? आइए यहां आपको इन सवालों के जवाब बताते हैं। 

कांवड़ यात्रा से जुड़ी पौराणिक कथा क्या है?

कांवड़ यात्रा हिंदू पंचांग के पांचवें महीने सावन में हर साल निकाली जाती है और लाखों की संख्या में श्रद्धालु इस यात्रा में शामिल होते हैं। इस यात्रा का अपना एक इतिहास और कहानी है। इसकी शुरुआत का सीधा संबंध समुद्र मंथन से है। जब देवताओं और असुरों ने समुद्र मंथन किया, तो उसमें से कई अनमोल वस्तुएं निकलीं तब उसमें से एक था 'हलाहल' विष।

यह इतना खतरनाक था कि पूरी सृष्टि का विनाश कर सकता था। उस समय भगवान शिव ने उस विष को अपने कंठ में समाहित कर लिया और 'नीलकंठ' नाम से प्रसिद्द हुए।

उनके गले को ठंडक पहुंचाने के लिए माता पार्वती और अन्य देवी-देवताओं ने गंगाजल अर्पित किया जिससे उन्हें शीतलता मिली। इसी पौराणिक कथा का अनुसरण आज भी करते हुए लोग सावन में शिवलिंग पर गंगाजल चढ़ाते हैं।

kanwar yatra in 2026

Picture Credit: AI Generated

सदियों से चली आ रही परंपरा आज भी क्यों है खास

जब बात कांवड़ यात्रा की आती है तो सबसे पहला कांवड़ परशुराम को माना जाता है क्योंकि उन्होंने ही सबसे पहले गढ़मुक्तेश्वर से गंगाजल लाकर महादेव को अर्पित किया था।

उसके अलावा प्रभु श्री राम ने भी वैद्यनाथ धाम में शिवलिंग का जलाभिषेक किया और वो भी कांवड़ कहलाए। कांवड़ यात्रा को लेकर कई प्रचलित पात्र जैसे ऋषि परशुराम, भगवान राम और लंका के राजा रावण द्वारा भगवान शिव को गंगाजल अर्पित करने की कथाएं प्रचलित हैं और उन्हें कांवड़ के रूप में ही देखा जाता है।

सदियों से इन्हीं परंपराओं को आगे बढ़ाते हुए जैसे-जैसे समय बदलता गया भक्तों से कांवड़ यात्रा को और बड़े स्वरूप में दिखाया।

आज लाखों श्रद्धालु कांवड़ यात्रा में शामिल होते हैं और कावड़ यात्रा के लिए पवित्र जल मुख्य रूप से यात्री हरिद्वार से भरते हैं। इसके अलावा गंगोत्री, गौमुख, सुल्तानगंज और अन्य स्थानीय पवित्र नदियों या गंगा के प्रमुख घाटों से भी भक्त कांवड़ में गंगाजल भरकर लाते हैं और सावन की शिवरात्रि के दिन शिवलिंग पर अर्पित करते हैं।

समय के साथ कैसे बदला कांवड़ यात्रा का स्वरूप

सदियों से सावन के महीने में कांवड़ यात्रा का प्रचलन है, लेकिन समय के साथ इसका स्वरूप बदलता जा रहा है। पहले के समय में कांवड़ यात्रा पूरी तरह तपस्या और साधना का प्रतीक थी। श्रद्धालु पैदल चलकर पवित्र नदियों से जल लाते थे और भगवान शिव के मंदिरों में जलाभिषेक करते थे। श्रद्धालु कई नियमों का पालन भी करते थे और शिव जी को प्रसन्न करने के लिए अपनी इच्छाओं पर संयम रखते थे।

समय के साथ भगवान शिव के प्रति आस्था बढ़ी और धीरे-धीरे कांवड़ यात्रियों की संख्या भी बढ़ने लगी। पहले जो यात्रा कुछ स्थानों तक ही सीमित थी वो आज देश के अलग-अलग हिस्सों में फैल गई।

आज के समय में लाखों की संख्या में कांवड़िए इस यात्रा में शामिल होते हैं और शिव भक्ति में लीन रहते हैं। हरिद्वार से गंगाजल लाने की परंपरा आज के दौर में विशेष रूप से प्रचलित है और कांवड़ यात्रा एक बड़े धार्मिक आयोजन का रूप ले चुकी है। जहां पहले भक्त साधारण कांवड़ लेकर अकेले पैदल चलते थे, वहीं आज के समय में यात्री बड़े समूह के रूप में यात्रा शामिल होते हैं।

भले ही कांवड़ यात्रा का स्वरूप क्यों न बदल गया हो, लेकिन सावन में निकलने वाली इस यात्रा में लाखों श्रद्धालुओं का शामिल होना आज भी इस परंपरा को खास बनाता है।

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