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जब रूठीं देवी लक्ष्मी और तोड़ दिया भगवान जगन्नाथ का रथ! पढ़िए इस अनोखी परंपरा की कहानी

Published: Sat, 30 May 2026 03:00 PM (GMT+05:30)

पुरी की जगन्नाथ रथ यात्रा से जुड़ी एक अनसुनी पौराणिक कथा है, जिसमें देवी लक्ष्मी भगवान जगन्नाथ से क्रोधित होकर उनके रथ को क्षतिग्रस्त कर देती हैं।

जगन्नाथ स्वामी को माफी क्यों मांगनी पड़ी? (AI-Generated Image)

जगन्नाथ स्वामी को माफी क्यों मांगनी पड़ी? (AI-Generated Image)

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धर्म डेस्क, नई दिल्ली। हर वर्ष लाखों की संख्या में श्रद्धालु पुरी में भगवान जगन्नाथ की भव्य रथ यात्रा में शामिल होने के लिए इक्ट्ठे होते हैं। विशाल रथ के साथ-साखथ मंत्रोच्चार और भक्तिमय से भरा वातावरण जो श्रद्धालुओं में खास जोश भर देता है।

लेकिन क्या आपको पता है कि, इस पवित्र रथ यात्रा के पीछे एक अनसुनी कहानी छिपी है, जिसके बारे में बहुत से लोगों को जानकारी नहीं है। आइए जानते हैं जगन्नाथ रथ यात्रा से जुड़ी इस कहानी के बारे में।

लक्ष्मी जी ने गुस्से में रथ को किया क्षतिग्रस्त

पौराणिक कथा के अनुसार, एक बार देवी लक्ष्मी भगवान जगन्नाथ से इतनी ज्यादा गुस्सा हो गई थी कि, उन्होंने रथ के एक हिस्से को क्षतिग्रस्त कर दिया था। जी हां, धन और ऐश्वर्य की देवी ने खुद इस दिव्य रथ यात्रा के दौरान सार्वजनिक रूप से अपना गुस्सा जाहिर किया था।

लेकिन यह सिर्फ क्रोध की बात नहीं थी। यह प्यार, विरह, भावनाओं और एक दिव्य संबंध की बात थी जो आज भी मंदिर की रस्मों के जरिए निभाई जा रही है।

हर साल रथ यात्रा के दौरान भगवान जगन्नाथ स्वामी अपने भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के साथ पुरी के मुख्य मंदिर से गुंडिचा मंदिर तक यात्रा करते हैं। भक्त इस यात्रा को अत्यंत श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाते हैं। हालांकि मंदिर से जुड़ी पौराणिक कथाओं के मुताबिक, देवी लक्ष्मी मंदिर में ही रहती है और इस भव्य रथ यात्रा में शामिल नहीं होतीं।

मान्यताओं के मुताबिक, इससे उन्हें गहरा अघात पहुंचा था। उनका दुख यात्रा को लेकर नहीं, बल्कि भगवान जगन्नाथ स्वामी से बिछड़ने को लेकर था। यह छोटा-सा दैवीय मतभेद बाद में रथ परंपराओं से जुड़ी सबसे अनोखी और दिलचस्प कहानियों में से एक बन गया था।

भगवान जगन्नाथ और मां लक्ष्मी से जुड़ी कथा

(AI-Generated Image)

इस घटना के पीछे का भाव क्या था?

मंदिर से जुड़ी प्रचलित कथाओं के मुताबिक, देवी लक्ष्मी को जब पता चला कि, भगवान जगन्नाथ उन्हें छोड़कर चले गए हैं, तो वे गुस्सा हो गईं। क्रोध से भरी होने के कारण वे रथ यात्रा की ओर बढ़ीं और स्थिति का सामना किया। मंदिर से जुड़ी परंपराओं के मुताबिक, उन्होंने गुस्से में प्रतीकात्मक रूप से भगवान जगन्नाथ के रथ का एक टुकड़ा तोड़ दिया या अलग कर दिया।

यह क्षण कई भक्तों को हैरान कर सकता है क्योंकि देवी लक्ष्मी को आमतौर पर शांति और समृद्धि से जोड़कर देखा जाता है। लेकिन यह कहानी दिव्य संबंधों के अधिक भावनात्मक और मानवीय पहलू को दर्शाती है। पौराणिक कथाओं में भी प्यार में कभी-कभी तड़प, आहत भावनाएं और वियोग से उत्पन्न हुई भावनात्मक प्रतिक्रियाएं भी शामिल होती हैं।

हेरा पंचमी के जरिए आज भी जीवित परंपरा

लक्ष्मी जी के क्रोध की कहानी आज भी लोगों को याद है। रथ यात्रा के दौरान होने वाला प्रसिद्ध हेरा पंचमी अनुष्ठान आज भी जगन्नाथ संस्कृति में इस परंपरा को जीवित रखता है। उत्सव के पांचवें दिन देवी लक्ष्मी को विधिपूर्वक भगवान जगन्नाथ की खोज में गुंडिचा मंदिर ले जाया जाता है। इस अनुष्ठान के दौरान प्रतीकात्मक कृत्यों द्वारा उनके गुस्से और भावनात्मक टकराव को दर्शाया जाता है।

भक्त इस घटना को काफी श्रद्धा से देखते हैं, क्योंकि यह न केवल दिव्य भावना का प्रतिनिधित्व करता है, बल्कि प्यार और मेल-मिलाप की सुंदरता को भी दर्शाने काम करता है। यह अनुष्ठान एक पौराणिक पल को एक जीवंत आध्यात्मिक परंपरा में बदल देता है, जो पीढ़ियों से चलती आ रही है।

जगन्नाथ स्वामी को माफी क्यों मांगनी पड़ी?

मंदिर की परंपराओं के मुताबिक, भगवान जगन्नाथ को आखिर में देवी लक्ष्मी के गुस्से को शांत करने के साथ उन्हें प्रसन्न करना पड़ा। अनुष्ठान प्रतीकात्मक रूप से दर्शाते हैं कि भगवान देवी लक्ष्मी की प्रसन्नता और स्नेह को फिर से हासिल करने की कोशिश कर रहे हैं।

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