कर्मफल दाता का कष्‍ट
शनिदेव को कर्मफल दाता यानि कर्मों का फल देने वाला ग्रह माना गया है। उनकी पूजा में तेल चढ़ाने की अत्‍यंत मान्‍यता है। चलिए जानें की आखिर क्‍यों शनिदेव को तेल चढ़ाया जाता है? पौराणिक कथाओं में वर्णन किया गया है कि जब अहंकार में चूर रावण ने अपने बल से सभी ग्रहों को बंदी बना लिया था,तब शनिदेव को भी उसने बंदीग्रह में उल्टा कर लटका दिया था। जब हनुमानजी, प्रभु राम के दूत बनकर लंका पहुंचे, तो रावण ने उनकी पूंछ में भी आग लगवा दी। रावण की इस हरकत से क्रोधित होकर हनुमानजी ने पूरी लंका जला दी और सारे ग्रह आजाद हो गए, लेकिन उल्‍टा लटका होने के कारण शनि के शरीर में भयंकर पीड़ा हो रही थी और वह दर्द से कराह रहे थे। तब शनि के दर्द को शांत करने के लिए हुनमानजी ने उनके शरीर पर तेल से मालिश की थी। उसी समय शनि ने कहा कि जो भी व्‍यक्ति श्रद्धा भक्ति से उन पर तेल चढ़ाएगा उसे सारी समस्‍याओं से मुक्ति मिलेगी। और तभी से शनिदेव पर तेल चढ़ाने की परंपरा शुरू हो गई थी।

शनि को हुआ अहंकार
इस विषय में पुराणों में एक दूसरी कथा भी प्रचलित है जिसका संबंध रामायण काल से है। इसके अनुसार, रामायण काल में एक समय शनि देव को अपने बल और पराक्रम पर घमंड हो गया था। तभी हनुमान जी के बल और पराक्रम की कीर्ति सुन कर वे उनसे युद्ध करने के लिए निकल पड़े। कहते हैं कि जब शनिदेव, बजरंगबल के पास पहुंचे तो वे एक शांत स्थान पर अपने स्वामी श्रीराम की भक्ति में लीन बैठे थे। उन्होंने हनुमान जी को युद्ध के लिए ललकारा, लेकिन शनिदेव के क्रोध का कारण हनुमान जी समझ चुके थे, इसलिए उन्होंने युद्ध को स्वीकारने के बजाय शनिदेव को समझाने का प्रयास किया। इसके बावजूद शनिदेव मानने को तैयार नहीं थे। अंत में हनुमान युद्ध के लिए तैयार हो गए और दोनों के बीच घमासान युद्ध हुआ। युद्ध मे शनि देव की हार हुई, और शरीर पर हुनमान के प्रहारों से शरीर पर गहरे घाव भी बन गए। वह चोट की पीड़ा सहन नहीं कर पा रहे थे, तब हनुमान जी ने उनको तेल लगाने के लिए दिया, जिससे उनका दर्द गायब हो गया। इसी कारण शनिदेव ने कहा कि जो मनुष्य उन्‍हें सच्चे मन से तेल चढ़ाएगा वे उसकी सभी पीड़ा हर लेंगे और मनोकामनाएं पूर्ण करेंगे। 

 

By Molly Seth