Mahabharata Mystery: युद्ध खत्म होते ही क्यों जलकर राख हो गया अर्जुन का रथ? जानें श्री कृष्ण का गुप्त रहस्य
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Mahabharata Story: पढ़ें क्यों जलकर राख हुआ अर्जुन का रथ? (Image Source: Freepik)

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धर्म डेस्क, नई दिल्ली। महाभारत का युद्ध केवल शक्ति का प्रदर्शन नहीं था, बल्कि यह रहस्यों और ईश्वरीय लीलाओं से भरा हुआ था। 18 दिनों तक चले इस भीषण संग्राम में कई ऐसी घटनाएं घटीं जो आज भी हमें अचंभित कर देती हैं। ऐसी ही एक सबसे चौंकाने वाली घटना युद्ध के अंतिम दिन घटी, जब अर्जुन का वह दिव्य रथ, जिसने पूरे युद्ध में पांडवों का साथ दिया था, अचानक धू-धू कर जल उठा और राख के ढेर में बदल गया।
श्री कृष्ण का आदेश
युद्ध समाप्त हो चुका था। पांडवों की विजय हुई थी। शाम के समय जब अर्जुन और भगवान श्री कृष्ण अपने रथ से वापस लौटे, तो एक अजीब बात हुई। आमतौर पर नियम यह था कि सारथी पहले उतरता है और योद्धा बाद में। लेकिन, उस दिन श्री कृष्ण ने अर्जुन से कहा, "पार्थ! पहले तुम रथ से उतरो।"
अर्जुन को थोड़ा आश्चर्य हुआ, लेकिन उन्होंने श्री कृष्ण की आज्ञा मानी और रथ से उतर गए। इसके बाद श्री कृष्ण ने रथ के ऊपर ध्वज पर विराजमान हनुमान जी से भी जाने का अनुरोध किया। जैसे ही बजरंगबली वहां से अंतर्ध्यान हुए, श्री कृष्ण भी रथ से उतर गए।
जब भस्म हुआ रथ
महाभारत के शांति पर्व और पौराणिक कथाओं में वर्णित प्रसंगों के अनुसार, जैसे ही श्री कृष्ण के पैर जमीन पर पड़े, पूरा रथ भीषण अग्नि की लपटों में घिर गया और देखते ही देखते राख बन गया। यह देखकर अर्जुन सन्न रह गए। उन्होंने हैरानी से पूछा, "हे केशव! यह क्या हुआ? यह दिव्य रथ ऐसे अचानक कैसे जल गया?"

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श्री कृष्ण ने खोला 'गुप्त रहस्य'
अर्जुन के चेहरे पर घबराहट देखकर श्री कृष्ण मुस्कुराए और बोले, "पार्थ! यह रथ तो बहुत पहले ही जल चुका था। भीष्म पितामह, द्रोणाचार्य और कर्ण के दिव्य अस्त्रों की शक्ति ने इसे काफी समय पहले ही भस्म कर दिया था। लेकिन, चूंकि मैं इस पर बैठा था और हनुमान जी ध्वज पर विराजमान थे, इसलिए यह रथ केवल मेरी संकल्प शक्ति और ईश्वरीय प्रभाव से टिका हुआ था।"
प्राचीन ग्रंथों के अनुसार, युद्ध के दौरान कर्ण के 'नागास्त्र' और भीष्म के 'दिव्यास्त्रों' ने रथ की आयु समाप्त कर दी थी। श्री कृष्ण जानते थे कि अगर वे अर्जुन से पहले रथ से उतर जाते, तो अर्जुन रथ के साथ ही जलकर भस्म हो जाते। अपनी प्रतिज्ञा और अर्जुन की रक्षा के लिए कृष्ण ने उस मृत रथ को अंत तक जीवित रखा।
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