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मकर संक्रांति 2018: कराता है नवजीवन का बोध

Publish Date:Fri, 12 Jan 2018 12:24 PM (IST) | Updated Date:Sat, 13 Jan 2018 10:13 AM (IST)
मकर संक्रांति 2018: कराता है नवजीवन का बोधमकर संक्रांति 2018: कराता है नवजीवन का बोध
जड़ता व आलस्य जैसे दुर्गुणों को त्याग कर नवजीवन बोध तथा सकारात्मक सोच के साथ हम जीवन पथ पर अग्रसर हो जाएं, यही मकर संक्रांति पर्व का संदेश है।

 सूर्य स्तुति का पर्व

मकर संक्रांति सूर्योपासना का ऐसा ऋतु पर्व है, जो हमारे लौकिक जीवन को देव जीवन की ओर मोड़ता है। यह पर्व हमारे भीतर शुभत्व व नवजीवन का बोध भरकर हमें चैतन्य, जाग्रत, जीवंत व सक्रिय बनाता है। गौरतलब है कि एकमात्र सूर्य ही ऐसे प्रत्यक्ष देवता हैं, जो सतत क्रियाशील रहकर हम धरतीवासियों का भरण-पोषण करते हैं। इसीलिए हमारे ऋ षिगणों ने सूर्य को 'विराट पुरुष' की संज्ञा दी है। अल्लामा इकबाल ने 'आफताब (सूर्य)' की स्तुति के रूप में गायत्री मंत्र का बड़ा सुंदर अनुवाद उर्दू में किया है। 

 

मंगल कार्यों की शुरूआत

पुराणों में उल्लेख है कि जब दिवाकर मकरस्थ होते हैं, तब सभी समय, प्रत्येक दिन एवं सभी स्थान शुभ हो जाते हैं। खरमास (पौष माह) में रुके हुए मंगल कार्य पुन: शुरू हो जाते हैं। यह स्नान पर्व मूल रूप से ऋतु चक्र परिवर्तन और नई कृषि उपज से जुड़ा है। इस समय तक धान, उरद व तिल आदि की नई फसल तैयार हो चुकी होती है। वैदिक चिंतन कहता है कि इस अवसर पर जिस तरह सूर्यदेव की कृपा से हमारे अन्नदाता हमें नवान्न का उपहार देते हैं, उसी तरह यह आलोक पर्व हमें प्रबोधित करता है कि हम भी जड़ता व आलस्य त्याग कर नए सकारात्मक विचारों को ग्रहण करें। काम-क्रोध, मद-लोभ आदि दूषित विचारों से अपने अंतस को मुक्त कर नई जीवन ऊर्जा से कर्म पथ पर गतिमान हों।

 

विविध रूप

जानना दिलचस्प होगा कि देश के विभिन्न प्रांतों में जितने रूप इस त्योहार को मनाने के प्रचलित हैं, उतने किसी अन्य पर्व के नहीं। कहीं लोहड़ी, कहीं खिचड़ी, कहीं पोंगल, कहीं संक्रांति और कहीं उत्तरायणी। उत्तर प्रदेश, बिहार व मध्य प्रदेश में मकर संक्रांति का पर्व मुख्य रूप से खिचड़ी पर्व के रूप में मनाया जाता है। तीर्थराज प्रयाग में गंगा, यमुना व सरस्वती के संगम पर लगने वाले एक माह के माघ मेले की शुरुआत मकर संक्रांति से ही होती है। इस दिन से प्रयाग के त्रिवेणी संगम पर शुरू होने वाले कल्पवास का आध्यात्मिक समागम जन-मन के भीतर उमड़ने वाले सात्विक भावों को पोषित कर देश की सांस्कृतिक चेतना व सामाजिक संबद्धता को मजबूत करता है। जानकार कहते हैं कि इस पर्व पर विशिष्ट आकाशीय तरंगों का व्यक्ति के मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है। इसीलिए इस दिन तीर्थराज प्रयाग एवं गंगासागर में स्नान को महास्नान की संज्ञा दी गई है। 

 

ऐसे शुरू हुई खिचड़ी की परंपरा

कहते हैं कि मकर संक्रांति के दिन खिचड़ी बनाने की परंपरा बाबा गोरखनाथ ने उत्तर प्रदेश के गोरखनाथ मंदिर से शुरू की थी। मोहम्मद खिलजी के आक्रमण के समय नाथपंथियों को युद्ध के दौरान भोजन बनाने का समय न मिलने से अक्सर भूखे रहना पड़ता था। तब इस समस्या का हल निकालने के लिए एक दिन बाबा गोरखनाथ ने दाल, चावल और सब्जी को एक साथ पकाने की सलाह दी। झटपट बन जाने वाला यह व्यंजन काफी पौष्टिक और स्वादिष्ट था। तब से गोरखपुर स्थित बाबा गोरखनाथ धाम में मकर संक्रांति के दिन खिचड़ी भोज की परंपरा शुरू हो गई। 

 

क्रांति का प्रतीक

इस पर्व को उत्तराखंड में उत्तरायणी के नाम से मनाया जाता है। पर्वतीय अंचल में इस पर्व के प्रति गहरी जनआस्था जुड़ी हुई है। 14 जनवरी 1921 को उत्तरायणी के दिन कुमाऊंवासियों ने क्रूर गोरखा शासन और अंग्रेजी राज की दमनकारी कुली बेगार प्रथा के काले कानून के खिलाफ क्रांति का बिगुल बजाकर हमेशा के लिए दासत्व से मुक्ति पाई थी। इस मौके पर उत्तराखंड में लगने वाले दो मेले पूरे देश में विख्यात हैं। पहला एक बागेश्वर (कुमाऊं) का उत्तरायणी मेला और दूसरा उत्तरकाशी (गढ़वाल) का माघ मेला।

 

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Web Title:What is the message of Makar Sankranti(Hindi news from Dainik Jagran, newsnational Desk)

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