गोस्वामी तुलसी दास जी बाल कांड में कहते हैं कि पराधीनता सुख में सबसे बड़ा बाधक है। 'पराधीन सपनेहु सुख नाहीं।' तो प्रश्न यह उठता है कि क्या स्वाधीनता ही सुख है? और यदि कोई व्यक्ति अथवा देश स्वाधीन होगा तो वह सुखी भी होगा? हम स्वाधीनता को सुख का पर्याय मानें, उससे पूर्व हम भारत के चिंतन में भिन्न-भिन्न शास्त्रों का आश्रय लेकर देखें अथवा विद्वानों के भिन्न-भिन्न मत परखें तो हम पाते हैं कि सुख के तीन स्तर हैं : देह का सुख, अंत:करण में मन-बुद्धि का सुख और आत्मा का सुख। देह और मन बुद्धि का सुख तो सर्व को आकर्षित करता है, लेकिन आत्म सुख के मार्ग पर तो कोई-कोई ही चल पाता है।

'आत्म अनुभव सुख सुप्रकासा' लिखकर गोस्वामी तुलसीदास कहते हैं कि आत्म अनुभव के बाद कुछ और नहीं करना पड़ता, अपने आप सुख का प्रकाश भी फैलता है और सारा भेद भ्रम भी मिट जाता है, लेकिन जब तक आत्म अनुभव न हो, तब तक आत्मा का सुख तो ज्ञानियों के लिए भी दुर्लभ है। लेकिन देह का सुख और मन-बुद्धि का सुख तो साधारण से साधारण आदमी को भी सहज ही प्रभावित करता है, इसलिए व्यवहार जगत में इनकी ही बात अधिक होती है।

आत्मा का सुख अध्यात्म से जोड़ता है और यह स्वाधीनता की चरम स्थिति होती है, लेकिन हम स्वाधीनता के इस चरम बिंदु से पूर्व देह के सुख और मन बुद्धि के सुख के बारे में भी कुछ विचार करते हैं तो पाते हैं कि स्वाधीनता के मार्ग के दो प्रमुख पड़ाव हैं : पहला स्वावलंबन और दूसरा स्वाभिमान।

देह के सुख में स्वावलंबन की महत्वपूर्ण भूमिका है तो अंत:करण के सुख में स्वाभिमान की। पहले देह सुख की बात करते हैं तो प्रश्न उठता है कि देह के सुख में सबसे बड़ी बाधा कौन उत्पन्न करता है? मानस के उत्तरकांड में गरुड़ जी ने काग भुशुंडि जी से जो सात प्रश्न पूछे, उनमें से एक महत्वपूर्ण प्रश्न यह भी था कि सबसे बड़ा दुख कौन सा है? काग भुशुंडि जी ने उत्तर देते हुए कहा :'नहिं दरिद्र सम दुख जग माही।' काग भुशुंडि जी ने दरिद्रता को सबसे बड़ा दुख माना और यदि हम इस सूत्र को सामने रखकर गांधी दर्शन की ओर देखें तो गांधी जी ने भी कमोबेश यही बात कही और इसके समाधान के लिए उन्होंने अपनी आत्मकथा सत्य के प्रयोग में खादी के जन्म के बारे में लिखा, 'चरखे के जरिए हिंदुस्तान की कंगाली मिट सकती है और यह तो सबके समझ सकने जैसी बात है कि जिस रास्ते भुखमरी मिटेगी उसी रास्ते स्वराज मिलेगा।'

गांधी जी की स्वराज की परिकल्पना में जन-जन का स्वावलंबन था, क्योंकि गांधीजी जानते थे कि सच्ची स्वाधीनता केवल कुछ लोगों से मुक्त होने अथवा कुछ लोगों के मुक्त होने में नहीं है, बल्कि जब देश के करोड़ों लोगों की दरिद्रता मिटेगी, तभी सच्चे अर्थों में स्वाधीनता आएगी।

दरिद्रता मिटाने के लिए गांधीजी ने चरखे का सहारा लिया और खादी के विचार को आजादी की लड़ाई में एक महत्वपूर्ण स्थान दिया तो उसके पीछे उनकी यही सोच थी कि स्वाधीन भारत का जन-जन सच्चे अर्थ में स्वाधीनता प्राप्त करे और यह तभी संभव होगा, जब स्वावलंबन का उजाला सबके जीवन में होगा। दूसरों पर आश्रित रहे तो आजादी अधूरी रहेगी, क्योंकि यह स्वाधीनता पराधीन होगी और पराधीन स्वतंत्रता किसी सुख का सृजन नहीं कर पाएगी।

स्वावलंबन देह को स्वाधीनता सौंपता है, लेकिन उसके साथ-साथ मन और बुद्धि को भी सुख चाहिए। गांधी जी ने सबसे बड़े दुख दरिद्रता को मिटाने का समाधान सौंपा तो उनसे पूर्व भारत की मनीषा के महान प्रतीक स्वामी विवेकानंद जी मन और बुद्धि को सही अर्थों में स्वाधीनता का सुख देने वाले सूत्र को हर एक हृदय में स्थापित कर चुके थे। उन्होंने ही ऋषि परंपरा के उस महान मंत्र को पूरे गौरव के साथ उद्घोषित करते हुए कहा था कि सुनो तुम अमृत पुत्र हो: 'श्रृृणवंतु विश्वे अमृतस्य पुत्रा।' गुलामी की जंजीरों में जकड़े हुए देश में यह मंत्र उस सुप्त पड़े स्वाभिमान को जाग्रत कर गया, जो मन-बुद्धि के सुख का सूत्रपात करता है।

वैसे तो श्रीमद्भगवद्गीता में 'सुख दुख समे कृत्वा' की बात की गई है, लेकिन तब भी श्रीमद्भगवद्गीता के छठें अध्याय में यह भी कहा गया है कि जिसका मन भली-भांति शांत हो गया है और जिसका रजोगुण भी शांत हो गया है, उसे ही उत्तम सुख प्राप्त होता है। भारतीय मनीषा ने सदैव स्थूल और सूक्ष्म के महत्व को स्वीकारा है तथा आत्म सुख को परम सुख मानते हुए भी देह और मन बुद्धि को तुष्ट होने से नहीं रोका है।

आत्मा के सुख की बात से पूर्व देह और मन बुद्धि के सुख की बात इसलिए भी आवश्यक है, क्योंकि स्वामी विवेकानंद जी ने भी कहा था कि, 'पहले जमीन तैयार करनी होगी। भोग की इच्छा कुछ तृप्त हो जाने पर ही लोग योग की बात सुनते या समझते हैं। अन्न के अभाव से क्षीण देह क्षीण मन और रोग शोक परिताप में भाषण देने से क्या होगा?' स्वामी विवेकानंद जी ने ही अरुंधति न्याय की बात भी की; जिसके अनुसार अरुंधति तारे को देखने की विधि की बात की जाती है। यह बहुत छोटा तारा होता है। उसे देखना हो तो दिखाने वाला पहले उसके समीप के किसी बड़े तारे को दिखाता है, फिर उससे छोटे तारे को और अंत में उनसे होकर दृष्टि अरुंधति तक पहुंच जाती है।

आत्मा का सुख विराट है, लेकिन आत्मदर्शन तो सूक्ष्म से भी अति सूक्ष्म है, इसलिए दृष्टि को स्थूल और सूक्ष्म से होते हुए अति सूक्ष्म तक जाना पड़ता है। आत्म सुख से पूर्व देह का सुख और मन-बुद्धि का सुख पा लेने पर ही जन-जन उस परमसुख की ओर आकर्षित होगा, जो जीवन का परम लक्ष्य है। जो परम स्वाधीनता है। देह की स्वाधीनता स्थूल की स्वाधीनता है, अंत: करण की स्वाधीनता सूक्ष्म की स्वाधीनता है और आत्म अनुभव परम स्वाधीनता है। स्वावलंबन देह को मुक्त करता है स्वाभिमान अंत: करण की बेडिय़ां काटता है और आत्म अनुभव स्वाधीनता के परम से साक्षात्कार करवाता है।

स्वाधीनता चाहे स्थूल की हो या सूक्ष्म की अथवा आत्मा की। ये सभी सुख का सर्जन करती हैं। क्षणभंगुर से लेकर कभी न खत्म होने वाले सुख का सर्जन। भारत आजादी के अमृत महोत्सव में सुख का अमृत जन-जन तक पहुंचाना चाहता है। स्वावलंबन और स्वाभिमान जन-जन तक परम स्वाधीनता को सच्चे अर्थ में ले जाएंगे और समृद्ध भारत स्वाभिमान का उन्नत भाल लिए पराधीनता की समस्त बेडिय़ों को काटकर परम स्वाधीनता का सुख सबके साथ साझा करेगा तो यह सुख वह समाधान रचेगा, जिसकी प्रतीक्षा समस्त संसार कर रहा है।

अशोक जमनानी, साहित्य व दर्शन के अध्येता

Edited By: Kartikey Tiwari