यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Nov 02, 2021 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।
जीवन का सौंदर्य: जिन गुणों से जीवन को सकारात्मक गति मिले, वही होते हैं जीवन सौंदर्य के कारक
सृष्टिकाल में सृजन के साथ ही सौंदर्य का भी प्राकट्य हुआ। जब सृष्टिकर्ता स्वयं सत्य शिव और सुंदर हो तो ...और पढ़ें

सृष्टिकाल में सृजन के साथ ही सौंदर्य का भी प्राकट्य हुआ। जब सृष्टिकर्ता स्वयं सत्य, शिव और सुंदर हो तो सृष्टि का इन गुणों से परिपूर्ण होना स्वाभाविक है, पर सौंदर्य को निहारने के लिए सुंदर दृष्टि आवश्यक है। इसके लिए जीवन सौंदर्य को निखारना जरूरी है। जिन गुणों से जीवन को सकारात्मक गति मिले, वही जीवन सौंदर्य के कारक होते हैं। इन्हें अन्यत्र खोजने की जरूरत नहीं है। ये प्रकृति जन्य होने से सभी को स्वत: प्राप्त हैं। आवश्यकता है इन्हें आचरण में लाने की।
बचपन जीवन सौंदर्य से लवरेज होता है, क्योंकि बच्चा इन्हीं गुणों में स्वभावत: जीता है। वाह्य दुनिया की नकारात्मकता से उसका रिश्ता नहीं होता। इसलिए उसके चेहरे पर स्वाभाविक मुस्कान होती है। किंतु जैसे-जैसे उसका वाह्य जगत से संपर्क बढ़ता है, स्वाभाविक मुस्कान गायब होती जाती है और वह जीवन के सौंदर्य से दूर होता जाता है।
वास्तव में जीवन सौंदर्य अर्जित नहीं, स्वत: स्फूर्त होता है। जिसमें केवल सद्गुणों से निखार आता है। वैसे यह सौंदर्य वाह्य भी होता है और आंतरिक भी, पर जीवन का सौंदर्य आंतरिक ही होता है। जिसका केवल वाह्य प्रकटीकरण होता है। चूंकि जीवन दाता स्वयं सत्-चित् और आनंद स्वरूप है। अत: जीवन सौंदर्य का भी सत्-चित्-आनंद स्वरूप होना स्वाभाविक है, क्योंकि अंश अपने अंशी से भिन्न नहीं हो सकता।
गांधी जी ने कहा था, ‘वास्तविक जीवन सौंदर्य हृदय की पवित्रता में है। जब तक हृदय में पवित्रता नहीं होगी, जीवन में पवित्रता नहीं आ सकती। फिर न तो जीवन में सौंदर्य होगा और न समाज में। जिस समय हृदय की पवित्रता से उत्पन्न आंतरिक आह्लाद मुस्कुराहट के रूप में होठों पर खिलता है। उस समय मनुष्य ईश्वर के सबसे निकट होता है। वही जीवन का वास्तविक सौंदर्य है। अत: स्वस्थ जीवन के लिए उसे हर परिस्थिति में बनाए रखना मानव का धर्म है। सामाजिक सौंदर्य का हेतु भी यही है।
डा. सत्य प्रकाश मिश्र
