वाराणसी। काशी को यूं ही नहीं दुनिया का सबसे जीवंत शहर कहा जाता है। एक ओर यह धर्म और आस्था का केंद्र है वहीं दूसरी ओर कला व साहित्य का भी मरकज है। ऐसा ही एक हुनर बनारस का परचम इस कदर थामे हुए है कि इसे जानने वाले दांतों तले उंगलियां दबाने पर मजबूर हैं। यह कला है एनसिएंट रोमन टेक्निक हैंड एंब्रायडरी। सैकड़ों वर्ष पुरानी इस कला से बने गाउन का प्रयोग रोमन कैथोलिक चर्च के पादरी किया करते हैं।

4 सितंबर को वेटिकन सिटी में आयोजित आयोजन में मदर टेरेसा को संत की उपाधि प्रदान की । इसको लेकर एक ओर जहां पूरा भारत उत्साहित है, वहीं बनारस के लोगों में भी इसलिए खासा हर्ष है कि समारोह में विभिन्न चर्च के पादरी एनसिएंट रोमन टेक्निक हैंड एंब्रायडरी से सजा जो लबादा धारण करेंगे, वह यहीं तैयार किए गए है। हर प्रमुख चर्च के पादरी की अलग तरह की ड्रेस होती है। यह परंपरा सैकड़ों वर्षों से चली आ रही है, जिस कारण पादरी को यही गाउन, स्टॉल आदि पहनना पड़ता है। जर्जर होने की दशा में इस बेजोड़ आर्ट वर्क की प्रति काशी में ही बनने के लिए आती है। गोलगड्डा के एक्सपोर्टर ऐनुल हसन अंसारी के अनुसार यहां पुरानी हो चुकी ड्रेस की हूबहू नकल तैयार की जाती है। एक बार आर्डर मिलने पर इसका कपड़ा तैयार करने, डिजाइन विकसित करने, डिजाइन में उभार लाने के लिए लकड़ी की वसली तैयार करने व कारीगरों को जरदोजी का आर्ट वर्क पूरा करने में छह से दस माह तक लगता है। सारे आर्डर बाहर के चर्च से ही मिलते हैं, जो ईसाई धर्म के प्रमुख स्थानों में से हैं। चर्च की संख्या सीमित होने के कारण बाजार भी सीमित है। लल्लापुरा के माहिर कारीगर नन्हें खां बताते हैं कि शिवाला, लल्लापुरा, कोयला बाजार आदि क्षेत्रों में छोटे-छोटे कारखाने हैं, जहां आर्थोडॉक्स, कैथोलिक या अन्य किस्म के डिजाइन बनाए जाते हैं।

पवित्र काम, गोपनीयता खास : ये बहुत खास व पवित्र काम है। चर्च की ओर से गोपनीयता बनाए रखने का निर्देश होता है, जिसका हम पूरा सम्मान करते हैं। डिजाइन विकसित करने, डिजाइन में उभार लाने के लिए लकड़ी की वसली तैयार करने व कारीगरों द्वारा आर्ट वर्क पूरा करने के दौरान गोपनीयता का मसला अहम है।

- ऐनुल हसन अंसारी (एक्सपोर्टर)।

काशी में सन 1898 में शुरू हुआ था गणेशोत्सव

देवाधिदेव महादेव की नगरी काशी में उनके पुत्र विनायक की आराधना (गणेशोत्सव) की परंपरा युवाओं को जागृत करने के उद्देश्य से सन 1898 में शुरू हुई थी। लोकमान्य पं. बाल गंगाधर तिलक ने पहले सन 1893 में पुणे में गणेशोत्सव की शुरूआत की और संपूर्ण राष्ट्र से उन्होंने आह्वïान किया कि इसे सार्वजनिक मंच का रूप दें। राष्ट्रीय विचारधारा के कार्यक्रम आयोजित किए जाएं। 'स्वराज्य हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है' इसे लक्ष्य में रखते हुए भाद्रपद शुक्ल पक्ष की चतुर्थी से भद्र पद शुक्ल पक्ष की अनंत चतुर्दशी तक गणेशोत्सव मनाया जाने लगा। पं. बाल गंगाधर तिलक के आह्वान पर महाराष्ट्र के बाद काशी में इसका आगाज सन 1898 में हुआ। यहां पर एक सप्ताह पर्यंत विविध धार्मिक व सांस्कृतिक कार्यक्रम होते आ रहे हैं।

Posted By: Preeti jha

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