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वैशाख अमावस्या व्रत कथा: इस कहानी में छिपा है पितरों को खुश करने का रहस्य

Published: Fri, 17 Apr 2026 06:45 AM (IST)Updated: Fri, 17 Apr 2026 08:03 AM (IST)

वैशाख अमावस्या 2026 पर पितरों की शांति के लिए धर्मवर्ण की व्रत कथा का श्रवण करना अत्यंत फलदायी माना गया ...और पढ़ें

वैशाख अमावस्या 2026 की पौराणिक कथा (Image Source: AI-Generated)

वैशाख अमावस्या 2026 की पौराणिक कथा (Image Source: AI-Generated)

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धर्म डेस्क, नई दिल्ली। हिंदू धर्म में वैशाख अमावस्या (Vaishakh Amavasya 2026) का विशेष महत्व है। यह दिन पितरों के आशीर्वाद और मानसिक शांति पाने के लिए सर्वश्रेष्ठ माना गया है। शास्त्रों के अनुसार, इस पावन तिथि पर पवित्र नदियों में स्नान और तर्पण करने से न केवल पितृ प्रसन्न होते हैं, बल्कि परिवार में सुख-समृद्धि और वंश की उन्नति भी होती है।

स्कंद पुराण में वर्णित इसकी कथा हमें बताती है कि क्यों एक संन्यासी को भी अपने पितरों के लिए वापस गृहस्थ जीवन में लौटना पड़ा। यहां पढ़िए वो कथा।

संन्यास की राह पर धर्मवर्ण

प्राचीन काल में धर्मवर्ण नाम के एक ब्राह्मण थे। वे स्वभाव से बहुत धार्मिक थे और अपना समय प्रभु के भजन और सत्संग में बिताते थे। एक बार उन्होंने एक सिद्ध पुरुष से सुना कि "कलयुग में भगवान विष्णु के नाम सुमिरन मात्र से वो फल मिलता है, जो पिछले युगों में कठिन तपस्या से मिलता था।" यह सुनकर धर्मवर्ण के मन में वैराग्य जाग गया। उन्होंने मोह-माया त्याग दी और संन्यासी बनकर हरि-भजन में लीन हो गए।

पितृ लोक की वो भयानक सच्चाई

एक दिन अपनी योग साधना के दौरान धर्मवर्ण सूक्ष्म शरीर धारण कर पितृ लोक पहुंचे। वहां का नजारा देखकर वे दंग रह गए। उन्होंने देखा कि उनके पूर्वज (पितर) बहुत कष्ट में हैं और कराह रहे हैं। धर्मवर्ण ने दुखी होकर उनसे पूछा, "आप सब इतने महान पुण्य आत्मा होने के बाद भी इस पीड़ा में क्यों हैं?"

पितरों का संदेश: वंश परंपरा का महत्व

पितरों ने रोते हुए कहा, "हे धर्मवर्ण! तुम्हारे संन्यास लेने के कारण हमारी यह दुर्दशा हुई है। तुम्हारे बाद अब हमारा पिंडदान करने वाला कोई नहीं बचा है। जब तक कुल में वंश आगे बढ़ता है और पिंडदान होता रहता है, पितर तृप्त रहते हैं। तुम्हारे संन्यास से हमारे तर्पण का मार्ग बंद हो गया है।"

अमावस्या का चमत्कार और मुक्ति

पितरों ने धर्मवर्ण को सुझाव दिया कि अगर वे वापस गृहस्थ जीवन में लौटें, विवाह करें और संतान उत्पन्न करें, तभी उनकी आत्मा को शांति मिलेगी। साथ ही, उन्होंने बताया कि वैशाख अमावस्या के दिन विधि-विधान से पिंडदान करने का विशेष महत्व है।

पितरों की पीड़ा देख धर्मवर्ण ने तुरंत वापस लौटने का निर्णय लिया। उन्होंने विवाह कर अपना गृहस्थ धर्म निभाया और वैशाख अमावस्या पर पूरे नियम के साथ पितरों का तर्पण और पिंडदान किया। इस पुण्य कार्य के प्रभाव से उनके सभी पूर्वजों को कष्टों से मुक्ति मिली और उन्हें मोक्ष की प्राप्ति हुई।

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अस्वीकरण: इस लेख में बताए गए उपाय/लाभ/सलाह और कथन केवल सामान्य सूचना के लिए हैं। दैनिक जागरण यहां इस लेख फीचर में लिखी गई बातों का समर्थन नहीं करता है। इस लेख में निहित जानकारी विभिन्न माध्यमों/ज्योतिषियों/पंचांग/प्रवचनों/मान्यताओं/धर्मग्रंथों/दंतकथाओं से संग्रहित की गई हैं। पाठकों से अनुरोध है कि लेख को अंतिम सत्य अथवा दावा न मानें एवं अपने विवेक का उपयोग करें।