'यदा यदा हि धर्मस्य...' का असली अर्थ: भगवान के आने का इंतजार नहीं, खुद को बदलने की जरूरत है
श्रीमद्भगवद्गीता का श्लोक "यदा यदा हि धर्मस्य" केवल भगवान के अवतरण के बारे में नहीं, बल्कि आंतरिक जागरण और व्यक्तिगत जिम्मेदारी का प्रतीक है।
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यदा यदा ही धर्मस्य श्लोक का असल मतलब (Picture Credits- AI Images)

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धर्म डेस्क, नई दिल्ली। हिंदू धर्म का अत्यंत पवित्र और महत्वपूर्ण ग्रंथ श्रीमद्भगवद्गीता जो महाभारत के भीष्म पर्व का एक भाग है। कई लोग श्रीमद्भगवद्गीता को एक धार्मिक किताब ही मानते हैं, जबकि काफी कम लोगों को ही पता है कि यह एक ऐसा ग्रंथ है जो मनुष्यों को धर्म (सत्कर्म, सदाचार और सद्भाव) का स्पष्ट ज्ञान प्रदान करती हैं।
श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 4 का सातवां श्लोक-
"यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर् भवति भारत
अभ्युत्थानं अधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्"
अधिकतर लोग इस श्लोक को बिना समझे दोहराते हैं। वे सोचते हैं कि भगवान कृष्ण चमत्कारिक रूप से अवतरित होंगे। इसका असल अर्थ इससे कहीं ज्यादा शक्तिशाली है। यह श्लोक हमारे आंतरिक जागरण के बारे में है।
जब समाज में धर्म कमजोर होता है, तो सबसे पहले वह मनुष्य के मन को कमजोर करता है। हमारे सोचने-समझने और फैसले लेने की शक्ति को कमजोर कर देता है। यह श्लोक इस बात का प्रतीक है कि आलस्य और बहाने बाजी को त्याग कर आपको खुद अपनी समस्या का हाल करना है, बिना ये सोचे कि भगवान आपकी परिस्थिति को बदल देंगे।
धर्म का पतन कब होता है?
असल मायनों में धर्म का पतन तब होता है, जब व्यक्ति सच्चाई और जिम्मेदारी का रास्ता छोड़ देता है। अधर्म तब बढ़ता है जब हम मूल्यों से समझौता कर बैठते हैं। भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि, ब्रह्मांडीय संतुलन के नियम को मानवीय हस्तक्षेप की जरूरत होती है।

यदा यदा हि धर्मस्य का असल मतलब
"यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर् भवति भारत
अभ्युत्थानं अधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्"
इस श्लोक के माध्यम से भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि, हे भारत, जब भी धर्म कमजोर होता है और अधर्म मजबूत होता है। उस समय मैं खुद प्रकट होता हूं।
ज्यादातर पाठक इसे शाब्दिक रूप से समझते हैं। वे सोचते हैं कि भगवान कृष्ण स्वर्ग से अवतरित होंगे। वे दिव्य अवतारों के चमत्कारिक रूप से प्रकट होने की कल्पना करते हैं। वे संसार की समस्याओं को हल करने के लिए उद्धार कर्ता का इंतजार करते हैं। यह व्याख्या गहरे ज्ञान को समझने में असफल रहती है। यह धर्म की पुनर्स्थापना को सिर्फ ईश्वर का काम मानती है।
जबकि इसका अर्थ काफी गहरा और व्यक्तिगत है। धर्म सबसे पहले मानव चेतना में खत्म होता है। यह तब कमजोर होता है जब हम साहस के बजाय आराम को चुनते हैं। यह तब गायब हो जाता है जब हम विवेक के बजाय सुविधा को प्राथमिकता देते हैं। अधर्म हमारे दैनिक समझौतों, हमारे द्वारा बोले गए सफेद झूठ, हमारी काम को टालने की आदत और हमारे द्वारा किए गए अन्याय से पनपता है।
कृष्ण का प्रकट होना ऊपर से अवतरित होने वाले दिव्य प्राणियों के बारे में नहीं है, बल्कि यह अपने अंदर से जागृत मनुष्यों के उत्थान के बारे में है। 'मैं खुद क प्रकट करता हूं' में 'मैं' उस दिव्य चेतना को जाहिर करता है जो हर व्यक्ति के अंदर मौजूद है। जब हम इसे आंतरिक ऊर्जा से जोड़ते हैं तो हम वही साकार रूप पाते हैं जिसका भगवान श्रीकृष्ण ने वादा किया था।
धर्म और अधर्म का प्रतीक
ऑफिस में भ्रष्टाचार अधर्म का प्रतीक है। परिवार की उपेक्षा धर्म के पतन को दर्शाती है। सोशल मीडिया पर गलत या झूठी खबरें फैलाना अधर्म है। ईमानदार व्यापारिक तौर-तरीके अपना धर्म का प्रतिनिधित्व है।
लोगों की मदद करना धर्म का प्रतीक है। डर के बावजूद सच का मार्ग चुनना धर्म है। आसान मार्ग के बजाय ही मार्ग चुनना ही धर्म है।
गीता से क्या सीख सकते हैं?
अपने दिन की शुरुआत हमेशा सच्चाई और दृढ़ संकल्प के साथ करना चाहिए। हर परिस्थिति में ईमानदार रहें। अपने कर्तव्यों का पालन करें। रोजाना लोगों की मदद करें।
अभ्यास द्वारा अपने गुस्सों को कंट्रोल करना सीखें। रोजाना गीता के श्लोक पढ़ें। रात को अपने कार्यों की समीक्षा करें। अपने चरित्र में हमेशा अच्छे सुधार लाए।
यह प्राचीन श्लोक बताता है कि, ईश्वरीय हस्तक्षेप की प्रतीक्षा न करें। रोजाना अभ्यास के जरिए से खुद में बदलाव लाएं। आपका बदला हुआ जीवन ही ब्रह्मांडीय संतुलन का प्रतीक बनता है।
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