पूनम नेगी। भारतीय संस्कृति में विश्वास का बंधन अमूल्य माना गया है। रक्षाबंधन का पावन पर्व इसी विश्वास का प्रतीक है। हिंदू संस्कृति में 'सूत्रÓ अविच्छिन्नता का प्रतीक माना गया है। ऋषि मनीषा कहती है कि जिस तरह सूत्र (धागा) बिखरे हुए मोतियों को अपने में पिरोकर एक माला के रूप में एकाकार बनता है, ठीक उसी तरह रक्षासूत्र में निहित विश्वास व्यक्ति को मानवीय कर्तव्यों से जुड़े रहने की प्रेरणा देता है। पवित्र स्नेह का बंधन और रक्षा का संकल्प। यही है श्रावणी पर्व रक्षाबंधन का मूल तत्व दर्शन। मानवीय रिश्तों में नवीन ऊर्जा का संचार करने वाले इस पावन पर्व से जुड़े पौराणिक उद्धरण न सिर्फ इस पुरातन पर्व की महत्ता को उजागर करते हैं, अपितु मूल्यहीनता के वर्तमान दौर में भी इस सूत्र को धारण करने वाले व्यक्ति के भीतर कर्तव्यबोध भी जाग्रत करते हैं।

सर्वप्रथम मां लक्ष्मी ने दानवराज बलि को रक्षासूत्र बांधा था। यह प्रसंग भगवान विष्णु के वामन अवतार से जुड़ा है। कथा है कि भगवान विष्णु के परम भक्त दानवराज बलि के तप बल से जब देवराज इंद्र का सिंहासन डोलने लगा तो वे देवताओं के साथ भगवान विष्णु के पास गये और उनसे रक्षा की गुहार लगायी। श्रीहरि ने वामन बटुक का वेष धारण कर राजा बलि से भिक्षा में तीन पग भूमि के बदले तीनों लोक मांग लिये। एक पग में स्वर्ग और दूसरे पग में पृथ्वी को नापने के बाद अब तीसरा पग वे कहां रखें; प्रभु की लीला को समझ चुके बलि ने तत्क्षण अपना शीश उनके चरणों में प्रस्तुत कर दिया। भक्तवत्सल प्रभु ने बलि की इस सदाशयता पर रीझ कर उनके निवेदन पर पाताललोक में उनके साथ रहना स्वीकार लिया। जब माता लक्ष्मी को इस बात की जानकारी हुई तो उन्होंने बलि को रक्षासूत्र बांध उन्हें अपना भाई बनाकर उपहार में अपने पति विष्णु को वापस मांग लिया।

बलि को सूत्र बंधन की वह तिथि श्रावण मास की पूर्णिमा थी। भविष्य पुराण में वर्णित पर्व से जुड़े एक अन्य लोकप्रिय कथानक के अनुसार एक बार देवताओं और दैत्यों में 12 वर्षों तक घनघोर युद्ध चला परंतु कोई भी पक्ष विजयी नहीं हुआ। तब देवगुरु बृहस्पति के सुझाव पर इंद्र की पत्नी महारानी शची ने श्रावण शुक्ल पूर्णिमा के दिन अनुष्ठान पूर्वक रक्षासूत्र तैयार कर स्वास्ति वाचन के साथ इंद्र की कलाई में बांधा। उस रक्षासूत्र ने इंद्र को विजयश्री दिलायी। वही रक्षासूत्र आज भी बोला जाता है- येन बद्धोबली राजा दानवेन्द्रो महाबल:। दानवेन्द्रो मा चल मा चल।। अर्थात दानवों के महाबली राजा बलि जिस सूत्र से बंधे थे, उसी से तुम्हें बांधती हूं। हे रक्षासूत्र! तुम चलायमान न हो, चलायमान न हो। महाभारत युग की श्रीकृष्ण व दौपदी के जीवन से जुड़ी एक घटना भी इस पर्व से जुड़ी है। सुदर्शन चक्र से शिशुपाल के वध के बाद जब श्रीकृष्ण की तर्जनी में चोट आ गयी तो द्रौपदी ने अपनी साड़ी का आंचल फाड़कर उनकी अंगुली पर पट्टी बांधी थी। वह तिथि भी श्रावणी पूर्णिमा थी। द्रौपदी के चीर-हरण के समय उनकी लाज बचाकर श्रीकृष्ण ने इसी सूत्र बंधन का धर्म निभाया था।

Edited By: Sanjay Pokhriyal