प्रसून जोशी। जब हम आत्मनिर्भर देश की बात करते हैं तो कहीं स्वतः ही एक आंतरिक स्वीकृति सी मिलती दिखती है। ऐसा लगता है कि कुछ ऐसा कहा जा रहा है जिसके वर्षों से कहे जाने की प्रतीक्षा थी। लगता है किसी ने एक आह्वान को शब्द दे दिए हों। तर्क संतुष्ट हो जाते हैं,कर्म उद्यत हो जाता है,कल्पना को यथार्थ के पंख मिल जाते हैं और आत्मा को कहीं एक आध्यात्मिक बल सा मिलने लगता है। ऐसा क्या है आत्मनिर्भरता के विचार में? भारत आंतरिक जीवन प्रधान है उसकी अभिव्यक्ति उसके अंतर का ही प्रकटीकरण है,वह कर्म में प्राणों को ही परिलक्षित करना चाहता है,वह जीवन की क्षणभंगुरता जानते हुए भी स्वयं को शाश्वत का ही अंश मानता है। जैसा कि मैंने अपनी एक कविता में लिखा था

सर्प क्यों इतने चकित हो

दंश का अभ्यस्त हूँ

पी रहा हूँ विष युगों से

सत्य हूँ आश्वस्त हूँ

ये मेरी माटी लिए है

गंध मेरे रक्त की

जो कहानी कह रही है

मौन की अभिव्यक्त की

मैं अभय ले कर चलूँगा

ना व्यथित ना त्रस्त हूँ

वक्ष पर हर वार से

अंकुर मेरे उगते रहे

और थे वे मृत्यु भय से

जो सदा झुकते रहे

भस्म की सन्तान हूँ मैं

मैं कभी ना ध्वस्त हूँ

है मेरा उद्गम कहाँ पर

और कहाँ गंतव्य है

दिख रहा है सत्य मुझको

रूप जिसका भव्य है

मैं स्वयम् की खोज में

कितने युगों से व्यस्त हूँ

है मुझे संज्ञान इसका

बुलबुला हूँ सृष्टि में

एक लघु सी बूँद हूँ मैं

एक शाश्वत वृष्टि में

है नहीं सागर को पाना

मैं नदी संन्यस्त हूँ

तो कई अर्थों में भारत जब आत्मनिर्भरता की बात करता है तो वहाँ स्वतः ही अंतर से जुड़ाव का एक भाव आ जाता है,अहम् ब्रम्हास्मि का तत्व आ जाता है। कई लोग आपको तर्क देंगे कि अब भारत के सामने विचार की नहीं,दर्शन की नहीं,करने की चुनौती है। बड़ी बड़ी बातें, आदर्शवादी स्वप्न छोड़ कर कर्मभूमि में उतरने का समय है। वे आत्मनिर्भरता को बहुत ही संकरे अर्थों में परिभाषित करने का प्रयास भी करेंगे और ऐक्शन का हवाला देंगे। पर यह एक भूल होगी।

भारत एक आध्यात्मिक परम्परा है यहाँ बिना उच्च आदर्शों से जुड़े कर्म का कोई अस्तित्व नहीं। यहाँ कभी नहीं सिखाया गया कि ऊर्जाएँ तुम्हारी हैं या तुम ऊर्जाओं के जनक हो। यहाँ ऊर्जाओं का उत्स,शक्ति का स्रोत व्यक्ति से परे है, यहाँ तक की ऊर्जाओं पर मनुष्य के अधिकार पर ही प्रश्न लग जाता है। आभासी प्रक्षेपण पर बुनियादी विश्वास करना भारतीय संस्कृति के मूल में नहीं है। इस संस्कृति को मिथ्या,माया,स्वप्न इत्यादि की एक सहज समझ है। यह भी नहीं भूलना चाहिए कि भारतीय जनमानस बहुत ही जल्दी उद्देश्यहीन कर्म से ऊब जाता है। उसे यदि सतत परम लक्ष्य की अनुभूति न होती रहे तो उसके कृत्य कुंद होने लगते हैं,उसके अंतर्मन से उद्देश्य के छींटे उसकी जीवनचर्या पर पड़ते रहने से उसका कार्य उसका तप बन जाता है और तब उसके कर्म में दृढ़ता और संकल्प दिखाई देता है और यही भारतीयों की सतत प्रवाहित प्राणशक्ति का मूल है। इसीलिए भारतीय सभ्यता अन्य सभ्यताओं की तरह उबल कर शांत नहीं हो जाती, उसमें एक शाश्वत पुट सदा रहता है। जब हम आत्मनिर्भरता की बात करते हैं तब हम इसी महासागर में डुबकी लगते हैं हम अपने सच्चे अस्तित्व को पहचानने का प्रयास करते हैं,अपने विस्मृत स्वरूप के पुनर्जागरण का प्रयास करते हैं।यहाँ भौतिक जीवन के तिरस्कार का भाव नहीं है आत्मनिर्भरता की सच्ची भारतीय सोच को केन्द्र में रखने का आग्रह है।

(लेखक प्रसिद्ध गीतकार और कवि हैं)

Edited By: Sanjay Pokhriyal