रुदौली (फैजाबाद )। लगभग डेढ़ सौ वर्ष पुराना राजा महाराजाओं द्वारा निर्मित पटरंगा मंडी का विशाल पक्का तालाब व मंदिर आज बदहाली के भंवर में फंसा है। यह पौराणिक स्थल भारतीय संस्कृति व हिंदू समाज के लिए आस्था विश्वास के प्रतीक का द्योतक माना जाता रहा है। फिर भी पटरंगा मंडी का यही बदहाल पौराणिक स्थल संत महात्माओं, मुनि, ऋषियों व पर्यटकों को बरबस अपनी ओर खींचने में सक्षम है।

बताते हैं कि रानी कमियार द्वारा लगभग 150 सौ वर्ष पूर्व पटरंगा मंडी में पक्का तालाब तथा विशाल शिव मंदिर का निर्माण कराया गया था। यहां पर चौरासी कोसी परिक्रमा करने वाले संत-महात्माओं के ठहरने की व्यवस्था थी। इसी स्थान पर रानी का दरबार लगता था। फरियादियों की समस्याओं का निस्तारण करती थी। लखौरी ईंटो से बना तालाब,शिव मंदिर, गोघाट व स्नानागार का निर्माण भी कमियार की रानी ने ही करवाया था। इस पक्के तालाब के अंदर कई कुएं है, ऐसा माना जाता है। जिससे तालाब में सदैव पानी बने रहने का विशेष स्रोत है। काशी के महात्माओं द्वारा मंत्रोचार के बाद 27 तीर्थो से लाया गया पवित्र जल इसी तालाब में डाला गया था। जिसमें स्नान कर लोग अपने को धन्य मानते थे। उसी समय तालाब के केंद्र पर डाला गया विशालकाय साखू लकड़ी का स्तंभ आज भी विद्यमान है। जिस पर सदैव हनुमान जी की पताका लहराती रहती है।

यह पताका प्रति वर्ष शारदीय नवरात्रि के अंतिम दिन स्थानीय भक्त रामेश्वर उर्फ पहलवान स्तंभ पर चढ़कर बदलते थे। पवित्र धर्म स्थल होने के नाते नवरात्रि को मूर्तियां भी उक्त तालाब में विसर्जित होती थी। यहां पर विशाल मेले का आयोजन किया जाता था। जिसमें क्षेत्र के लाखों ग्रामीण बढ़चढ़कर हिस्सा लेते थे। लोगों ने बताया कि इस तालाब की प्रथम बार सफाई करपात्री जी महाराज द्वारा 1953 में करवाई गई थी। दूसरी बार गायत्री नगर निवासी शिक्षक आनंद प्रसाद त्रिपाठी व गंगाराम पांडेय ने सन 1982 में व तीसरी बार 1995 में पुन: त्रिपाठी व पांडेय सहित अन्य लोगों साफ-सफाई करवाई थी। लोगों का कहना है कि अगर पुरातत्व विभाग द्वारा इस तालाब व शिव मंदिर के पुर्ननिर्माण का जिम्मा लेकर इसकी मरम्मत आदि का कार्य करा दे तो यह पूरा स्थल एक बार पुन: लोगों के लिए आस्था व श्रद्धा का केंद्र बन जाएगा।

Posted By: Preeti jha