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दानव नहीं, भगवान विष्णु के प्रिय भक्त थे रावण-कुंभकर्ण, वैकुंठ से जुड़ा है रहस्य

Published: Tue, 07 Apr 2026 03:54 PM (GMT+05:30)

क्या रावण वास्तव में एक राक्षस था? जानिए भगवान विष्णु के द्वारपाल जय-विजय की कहानी, जिन्हें ऋषियों के श्राप के कारण रावण और कुंभकर्ण के रूप में जन्म लेना पड़ा।

भगवान विष्णु के द्वारपाल जय-विजय की कहानी (Image Source: AI-Generated)

भगवान विष्णु के द्वारपाल जय-विजय की कहानी (Image Source: AI-Generated)

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धर्म डेस्क, नई दिल्ली। अक्सर हम रामायण की कहानी को 'राम बनाम रावण' यानी अच्छाई की बुराई पर जीत के रूप में देखते हैं। लेकिन, क्या आपने कभी सोचा है कि शिव का इतना बड़ा भक्त और महापंडित रावण आखिर राक्षस बना ही क्यों? पौराणिक कथाओं की गहराई में उतरें तो पता चलता है कि रावण कोई साधारण दानव नहीं, बल्कि भगवान विष्णु के वैकुंठ धाम का एक द्वारपाल था, जो एक श्राप के कारण धरती पर दानव बनकर जन्मा।

कहानी शुरू होती है वैकुंठ धाम से, जहां भगवान विष्णु के दो द्वारपाल थे 'जय और विजय'। ये दोनों प्रभु के सबसे प्रिय और वफादार सेवक थे। एक बार ब्रह्मा जी के चार मानस पुत्र (सनक, सनन्दन, सनातन और सनत्कुमार) भगवान विष्णु से मिलने वैकुंठ पहुंचे। वे बालक के रूप में थे, इसलिए जय और विजय उन्हें पहचान नहीं पाए और द्वार पर ही रोक दिया।

ऋषि कुमारों ने दिया था रावण को श्राप

ऋषि कुमारों को लगा कि यह उनका अपमान है। उन्होंने क्रोधित होकर जय-विजय को श्राप दे दिया कि "दोनों द्वारपाल तीन जन्मों तक असुर योनि में जन्म लेंगे।" जय और विजय को अपनी गलती का अहसास हुआ और उन्होंने क्षमा याचना करने लगे। ऋषियों का श्राप वापस नहीं लिया जा सकता था, इसलिए उन्होंने कहा कि "तुम 3 जन्मों तक राक्षस योनि में जन्म लोगे लेकिन हर जन्म में तुम्हारी मृत्यु भगवान विष्णु के ही अवतार के हाथों होगी। तब जाकर तुम्हें इस श्राप से मुक्ति मिलेगी।"

कहा जाता है कि इसी श्राप की वजह से जय-विजय का तीन बार राक्षस योनी में जन्म हुआ। जिसमें से इन दोनों का एक जन्म रावण और कुंभकरण के रूप में था।

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(Image Source: AI-Generated)

श्राप के कारण इन दोनों द्वारपालों ने तीन अलग-अलग युगों में जन्म लिया:

पहला जन्म: सतयुग में हिरण्याक्ष और हिरण्यकशिपु के रूप में, जिनका वध भगवान ने वराह और नरसिंह अवतार लेकर किया।

दूसरा जन्म: त्रेतायुग में रावण और कुंभकर्ण के रूप में, जिनका उद्धार श्री राम के हाथों हुआ।

तीसरा जन्म: द्वापर युग में शिशुपाल और दंतवक्र के रूप में, जिनका वध भगवान विष्णु के आठवें अवतार श्री कृष्ण ने किया।

इस तरह, रावण का हर कृत्य असल में उसे अपनी मुक्ति की ओर ले जा रहा था। वह मन ही मन जानता था कि श्री राम के हाथों मृत्यु पाकर ही वह दोबारा अपने प्रभु के द्वार पर पहुंच पाएगा।

कहां मिलता है इसका वर्णन?

इस अद्भुत कथा का सबसे प्रमुख और विस्तृत वर्णन श्रीमद्भागवत पुराण के सातवें स्कंध में मिलता है। इसके अलावा वाराह पुराण और रामचरितमानस के बालकांड में भी 'जय-विजय' के श्राप की कहानी का उल्लेख है, जहां तुलसीदास जी लिखते हैं कि प्रभु अपने भक्तों के उद्धार के लिए ही अवतार लेते हैं।

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अस्वीकरण: इस लेख में बताए गए उपाय/लाभ/सलाह और कथन केवल सामान्य सूचना के लिए हैं। दैनिक जागरण यहां इस लेख फीचर में लिखी गई बातों का समर्थन नहीं करता है। इस लेख में निहित जानकारी विभिन्न माध्यमों/ज्योतिषियों/पंचांग/प्रवचनों/मान्यताओं/धर्मग्रंथों/दंतकथाओं से संग्रहित की गई हैं। पाठकों से अनुरोध है कि लेख को अंतिम सत्य अथवा दावा न मानें एवं अपने विवेक का उपयोग करें।