गुरु समर्थ रामदास जयंती पर विशेष सदैव राम नाम का जाप करते रहते थे गुरु समर्थ रामदास। वे बहुत कम बोलते थे, लेकिन संगीत के उत्तम जानकार थे। उन्होंने अनेक रागों में गाई जानेवाली रचनाएं की हैं। उन्होंने बहुत सारे ग्रंथ लिखे, जिनमें मराठी भाषा में दासबोध प्रमुख है। उन्होंने 'मनाचे श्लोक' में मात्र छह श्लोक के माध्यम से मन को वश में रखने के उपाय बताए हैं।

उनका व्यक्तित्व भक्ति, ज्ञान और वैराग्य से ओतप्रोत था। 'हिंदू पद पादशाही' के संस्थापक शिवाजी के गुरु रामदासजी का नाम संपूर्ण भारत में सुविख्यात है। महाराष्ट्र तथा दक्षिण भारत में तो प्रत्यक्ष हनुमान का अवतार मानकर उनकी पूजा की जाती है।समर्थ रामदास का जन्म महाराष्ट्र के औरंगाबाद जि़ले के जांब नामक स्थान पर 1608 में हुआ था। मान्यता है कि 12 वर्ष की आयु में विवाह के समय 'शुभमंगल सावधान' में 'सावधान' शब्द सुनकर रामदास विवाह के मंडप से निकल गए और टाकली नामक स्थान पर श्रीराम की उपासना में संलग्न हो गए। उपासना में वे 12 वर्ष तक लीन रहे। यहीं उनका नाम रामदास पड़ा। इसके बाद वे 12 वर्ष तक भारतवर्ष भ्रमण करते रहे। इस प्रवास में उन्होंने जनता की जो दुर्दशा देखी, उससे उनका हृदय संतप्त हो उठा।

उन्होंने मोक्ष साधना के स्थान पर अपने जीवन का लक्ष्य स्वराच्य की स्थापना द्वारा शासकों के अत्याचारों से जनता को मुक्ति दिलाना बनाया। शासन के विरुद्ध जनता को संघटित होने का उपदेश देते हुए वे घूमने लगे। कश्मीर से कन्याकुमारी तक उन्होंने 1100 मठ तथा अखाड़े स्थापित कर स्वराज्य स्थापना के लिए जनता को तैयार करने का प्रयत्‌न किया। इसी प्रयत्‌न में उन्हें छत्रपति शिवाजी महाराज जैसे योग्य शिष्य मिले, जिन्होंने उनके स्वप्न को साकार करने में अहम भूमिका निभाई।

Posted By: Preeti jha

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