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यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Sep 14, 2021 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।

Ram Katha: कौन हैं श्रीजाम्बवान? जानें रामभक्ति और आस्था के चरम पात्र जामवंत जी के बारे में

By Kartikey TiwariEdited By:
Published: Tue, 14 Sep 2021 10:44 AM (IST)

श्रीराम ज्ञानियों के लिए ज्ञेय हैं भक्तों के ध्येय हैं और कर्म-परायण लोगों के लिए अनुकरणीय हैं और जब किसी ...और पढ़ें

Ram Katha: कौन हैं श्रीजाम्बवान? जानें रामभक्ति और आस्था के चरम पात्र जामवंत जी के बारे में
Ram Katha: कौन हैं श्रीजाम्बवान? जानें रामभक्ति और आस्था के चरम पात्र जामवंत जी के बारे में

Ram Katha: अनुभव की परिपक्वता और उत्साह पूर्ण पुरुषार्थ ये दोनों श्रीराम के प्रति विनत हो जायें तो उसे अंगद और जाम्बवान जी का श्रीराम के साथ त्रिवेणी संगम कहेंगे। जाम्बवान जी श्रीरामचरितमानस के वे स्तंभ पात्र हैं, जिन्होंने श्रीराम की सारी सेना के मनोबल को और उनमें उपलब्ध शक्ति एवं उपलब्धि को श्रीराम की ओर लगाए रखा। किसी की योग्यता को पहचान कर उसका सही जगह पर उपयोग कर लेना बहुत बड़ी योग्यता होती है, जो केवल ईश्वर के प्रति संपूर्ण शरणागति के बगैर संभव नहीं है।

ज्ञान, भक्ति और शरणागति की वह त्रिवेणी जाम्बवान जी में है, जो श्रीराम के दिव्य चरित्र समुद्र में जाकर मिल जाती है और अपने साथ बंदरों के रूप में न जाने कितनी नदियों को भी उसी समुद्र में मिलाकर गुणों का वह सागर बना देती है, जहां से संत मेघ बनकर जल भरते हैं और उसे श्रीराम के गुणों का अमृत बनाकर सारे संसार में अपनी वाणी के द्वारा बांटते हैं।

हनुमान जी को जगाते हैं जामवंत

वस्तुत: गुणों के मोतियों को श्रीराम के चरित्र के धागे में पिरोकर मानस के हर मुक्तक पात्र को प्रबंध बनाने का कार्य जाम्बवान जी करते हैं। इस कार्य के लिए उन्होंने कई बार अपनी दिव्य वक्रोक्ति का आश्रय लिया। हनुमान जी जैसे दिव्य गुणनिधान को जगाते हुए कहते हैं कि हनुमान, तुम्हारे गुणों का सर्वश्रेष्ठ उपयोग तो तभी संभव है, जब तुम उनका उपयोग राम के लिए करो। उनको बल, बुद्धि, विवेक का आगार बताकर जगाते हैं, साथ ही समुद्र के किनारे सीता जी को न पा सकने की स्थिति में हताश बंदरों में भगवान की अनंत शक्ति और ऐश्वर्य को बताकर उनके अंदर पुन: प्राणों का संचार जाम्बवान जी ही करते हैं।

अंगद को किया उत्साहित

श्रीराम की सेना के सबसे युवा पात्र अंगद को यह कहकर उत्साहित करते हैं कि :

जामवंत कहं तुम सब लायक।

पठइअ किमि सबहीं कर नायक।।

अरे पुत्र! हमारी सेना में सबसे अधिक योग्य तो तुम्हीं हो, तभी तो हमारे श्रीराम ने तुम्हें नायक बनाकर भेजा है। इन्हीं जाम्बवान ने दूत बनाकर अंगद को लंका में भेजने का प्रस्ताव भी श्रीराम से किया था।

इतना ही नहीं, समुद्र के किनारे जब सेतुबंध की समस्या आई तो जाम्बवान जी ने अपनी सारी सेना को सुनाते हुए कहा कि हे राम! आपका नाम ही वह सदृढ़ सेतु है, जिसका आश्रय लेकर संसार के सारे प्राणी भवसागर को पार कर सकते हैं। यह तो आपकी कृपा है, जो आपने हमारे पुरुषार्थ भाग को धन्य कर दिया, इस समुद्र पर सेतु बनाने के लिए तो मात्र आपका संकल्प ही पर्याप्त है :

सुनहु भानुकुल केतु जामवंत कर जोरि कह।

नाथ नाम तव सेतु नर चढि़ भव सागर तरहिं।।

पुरुषार्थ और उत्साह जगाने वाले

अंगद को दूत बनाकर लंका भेजते समय भी वह सुझाव देते हुए वे कहते हैं :

सुनु सर्बग्य सकल उर बासी।

बुधि बल तेज धर्म गुन रासी।।

हे श्रीराम! आप सर्वव्यापी हैं। सबके हृदय में आपका बास है। बुद्धि, बल, तेज और धर्म रूपी सारे गुण संसार में आपसे ही प्राप्त होते हैं। सार्वजनिक रूप से यह कहकर उन्होंने बंदरों के अंदर पुरुषार्थ और उत्साह का वह स्वरूप प्रकट किया, जो पुरुषार्थ का चरम होकर भी सर्वथा अहं रहित है। पुरुषार्थ में अहं आते ही वह लक्ष्य रहित हो जाता है। वहां उपस्थित बंदरों को ऐसा लगा कि सतयुग में बलि की राजसभा में जिन्होंने दो घड़ी में भगवान के विराट रूप की सात परिक्रमाएं कर लीं, जब वे जाम्बवान जी उनके लिए ऐसा बोल रहे हैं तो निश्चित रूप से हमें भी श्रीराम पर विश्वास करके कदापि हतोत्साहित नहीं होना चाहिए।

हनुमान जी जब लंका जलाकर, सीता जी की सुधि लेकर आते हैं, तब जाम्बवान जी वाणी का सही उपयोग करते हुए हनुमान जी की भूरि-भूरि प्रशंसा करते हुए कहते हैं कि प्रभु! हनुमान ने जो कार्य किया है, उसका वर्णन तो हजारों मुखों के द्वारा भी नहीं किया जा सकता है।

इसका तात्पर्य है कि हम अपने स्थान पर अपने साथियों और सहयोगियों के गुणों और कार्यों को अनिर्वचनीय बताकर ही रावण, कुंभकर्ण, मेघनाद जैसे दुर्गुणों पर विजय प्राप्त करके रामराज्य की स्थापना कर सकते हैं। बड़ों के चरणों में अपने गुणों का विसर्जन कर देना ही राम का सेतुबंध है। अपने इसी गुण के कारण वे जीवनपर्यंत, लीला में आद्योपांत सेतु ही सेतु बनाते गये।

जो जाम्बवान त्रेतायुग के वर्तमान में अब लगभग कम शक्ति वाले हैं, पर उनमें भी गुण दर्शन करके राम ने गुण दर्शन की अभेद्य वृत्ति को असीमित गुण प्रदान कर दिए। जैसे किसी भारी वस्तु को उठाने के लिए छोटी-सी युक्ति का उपयोग कर लिया जाता है, जाम्बवान जी के पास भगवान के प्रति निरंतर निष्ठा और आस्था की पूंजी और युक्ति है, उसी से उन्होंने श्रीराम की वह निजता पाई, जिसका उपयोग श्रीराम ने पग-पग पर किया।

गुणों का संयोजन, संग्रह और फिर उसका उपयोग, ये शक्तियां स्वभाव से प्रकट करनी पड़ती हैं। हनुमान जी की प्रशंसा के पश्चात जाम्बवान जी सारे बंदरों में आशा की किरण जगाने के लिए, उत्साहित करने के लिए एक भविष्योन्मुख वक्रोक्ति का उपयोग करते हैं :

जामवंत कह सुनु रघुराया।

जापर नाथ करहु तुम्ह दाया।

ताहि सदा सुभ कुसल निरंतर।

सुर नर मुनि प्रसन्न ता ऊपर।।

सोइ बिजई बिनई गुन सागर।

तासु सुजसु त्रैलोक उजागर।

प्रभु आप जिस पर कृपा कर देते हैं वही गुणी, विजयी तथा गुणों का आगार हो जाता है। आज हम लोगों का जन्म लेना धन्य हो गया, जब आपने हमें अपनी शरण में लिया और सेवा का अवसर दिया।

संत मैथिलीशरण (भाई जी)