यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Jan 03, 2012 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।
प्रार्थना की शक्ति
प्रार्थना से हमारे भीतर विपत्तियों से लड़ने की ऊर्जा आ जाती है और हम संकल्पों को पूरा करने की ओर अग्रसर होते हैं..

कई बार हमारे चारों ओर विपत्ति के बादल मंडराने लगते हैं, निराशा का अंधकार छा जाता है। लगता है कि कोई हमारे दर्द को महसूस नहीं करता, उस समय हम किसी ऐसे की तलाश करते हैं, जिससे हम अपनी बात कह सकें और वह हमारे दुख दूर कर सके। तब हमारे संबल की तलाश ईश्वर पर जाकर खत्म होती है। ईश्वर का संबल मिलते ही हमारा आत्मबल मजबूत होने लगता है। विपत्तियां भले ही नष्ट न हों, लेकिन हमारे भीतर उनसे लड़ने की अपार ऊर्जा आ जाती है। इस ऊर्जा से हम न सिर्फ विपत्तियों पर विजय प्राप्त कर लेते हैं, बल्कि अपने संकल्पों को पूरा करने की ओर अग्रसर भी होते हैं।
प्रार्थना के लिए किसी भाषा या व्याकरण की जरूरत नहीं है। आवश्यकता है पूर्ण आस्था के साथ ईश्वर के समक्ष संपूर्ण समर्पण। ईश्वर में हमारा विश्वास हमारे भीतर आत्मबल पैदा करता है। प्रार्थना का अभिप्राय यह नहीं है कि हमारी इच्छा पूर्ण हो ही जाए। यह तो आप पर है कि ईश्वर का संबल लेकर अपने आत्मबल को आप कितना मजबूत बना लेते हैं।
प्रार्थना से तात्पर्य है- जीवात्मा की परमात्मा के समक्ष निजभाव की अभिव्यक्ति। ऐसे में मन को ईश्वर में केंद्रित करना होगा, तभी आप उससे अपने मन की बात कह सकेंगे। ऐसा करने से न सिर्फ हम अपनी कुंठाओं का विसर्जन कर देते हैं, बल्कि हमें ध्यान का भी अभ्यास होता है। ध्यान मन को भटकने से नियंत्रित करता है। हम समस्याओं को व्यापक फलक पर देखने लगते हैं और उनके मूल में जाकर हल खोज लेते हैं। इससे हमें संकट से मुक्ति मिल जाती है।
प्रार्थना के संबंध में पौराणिक कथाओं में अनेक कथाएं हैं। भक्त प्रह्लाद की पुकार पर भगवान नृसिंह-रूप धारण करके खंभे से प्रकट हो गए थे। कौरवों की सभा में जब द्रौपदी का चीर-हरण होने लगा, तब उसकी पुकार पर भगवान वस्त्ररूपी कवच बन गए, जिसे महाबली दु:शासन तोड़ न सका। गज को जब तक अपनी ताकत का अभिमान था, वह ग्राह [मगरमच्छ] से लड़ता रहा। पर जब गज को लगा कि वह अपने बल पर अपने प्राणों की रक्षा नहीं कर पाएगा, तब उसने श्रीहरि को पुकारा। भक्तवत्सल भगवान ने उसकी रक्षा की और गजेंद्रमोक्ष एक आदर्श प्रार्थना बन गई। इन कथाओं में देखा जाए, तो भगवान ने उन्हीं लोगों की सहायता की जिनका आत्मबल चरम पर रहा, जिन्होंने परिस्थितियों से समझौता नहीं किया।
मनोवैज्ञानिक मानते हैं कि प्रार्थना से अंतर्मन की सोई हुई ऊर्जा सक्रिय हो जाती है, जिनसे असाध्य रोग तक ठीक हो जाते हैं। प्रार्थना एक प्रकार का योग है, जिसका अभ्यास प्रतिदिन करना चाहिए। फिर आप रोज प्रार्थना के परमानंद-रस का आस्वादन लेंगे और प्रार्थना का प्रतिफल भी देखेंगे।
[डॉ. अतुल टण्डन]
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