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भगवान शिव के क्रोध से कैसे हुई वीरभद्र और भद्राकाली की उत्पत्ति? जानिए पौराणिक कथा

Published: Sun, 07 Jun 2026 08:00 PM (IST)

माता सती के आत्मदाह के बाद भगवान शिव के क्रोध से वीरभद्र और भद्राकाली की उत्पत्ति हुई। इन्होंने प्रजापति दक्ष ...और पढ़ें

भद्राकाली और वीरभद्र की उत्पत्ति की कथा (Picture Credit AI- Generated Image)

भद्राकाली और वीरभद्र की उत्पत्ति की कथा (Picture Credit AI- Generated Image)

HighLights

  1. शिव के क्रोध से वीरभद्र और भद्राकाली की उत्पत्ति।

  2. माता सती के आत्मदाह के बाद हुआ यह प्रसंग।

  3. दक्ष के यज्ञ का विध्वंस कर अहंकार का नाश।

धर्म डेस्क, नई दिल्ली। हिंदू धर्म से जुड़े शास्त्रों में भगवान शिव के रौद्र रूप वीरभद्र और आदिशक्ति के संहारक रूप भद्राकाली की उत्पत्ति से जुड़ी कथा सबसे शक्तिशाली प्रसंगों में से एक है। जब प्रजापति दक्ष (ब्रह्मा जी के मानस पुत्र) भगवान शिव के प्रति विद्वेष स्वभाव रखते थे।

जब दक्ष ने कनखल (हरिद्वार) में एक विशाल यज्ञ का आयोजन किया, तो उन्होंने समस्त देवी-देवताओं को आमंत्रित किया, लेकिन भगवान शिव और सती को निमंत्रण नहीं भेजा। माता सती अपने पिता के घर बिना बुलाए पहुंच गई, जहां दक्ष ने भगवान शिव का घोर अपमान किया।

पति का अपमान न सहन कर पाने के कारण माता सती ने योगाग्नि में कूदकर अपने प्राणों की आहुति दे दी।

शिव के क्रोध से वीरभद्र-भद्राकाली की उत्पत्ति

जब महादेव को सती के आत्मदाह की खबर मिली, तो वे काफी गुस्सा हो उठे। श्रीमद्भागवत पुराण के श्लोक के अनुसार-

क्रुद्ध: सुदष्टष्ठपुट: स धूर्जटिर्जटां तडिद्वह्लिसटोग्ररोचिषम्।
उत्कृत्य रुद्र: सहसोत्थितो हसन गम्भीरनादो विससर्ज तां भुवि॥

मतलब गुस्से से भरे शिव ने अपनी एक बिजली और आग की लपट जैसी चमकती हुई जटा को उखाड़ा और उसे पर्वत (पृथ्वी) पर पटक दिया। पृथ्वी पर गिरने के साथ ही उस जटा के दो हिस्से हो गए। शिव पुराण के मुताबिक, मुख्य भाग से एक अत्यंत विशाल, हजार भुजाओं वाले, त्रिशूल-तलवार से सुसज्जित और साक्षात काल के समान भयंकर योद्धा प्रकट हुए, जिन्हें वीरभद्र कहा गया। वे शिव के रौद्र रूप और उनके गणों के अधिपति भी बनें।

भद्राकाली और वीरभद्र की उत्पत्ति की कथा

भद्राकाली की उत्पत्ति

जटा के दूसरे हिस्से से साक्षात महाविनाश और संरक्षक की देवी भद्राकाली प्रकट हुईं। शिव पुराण और ब्रह्मा पुराण के अनुसार वे वीरभद्र की शक्ति और सहयोगी के रूप में प्रकट हुई, जिनका उद्देश्य दुष्टों का दमन और धर्म की रक्षा करना था।

दक्ष के यज्ञ का विध्वंस

भगवान शिव ने वीरभद्र और भद्राकाली को आदेश दिया कि वे तुरंत जाकर दक्ष के यज्ञ को नष्ट करें। दोनों महाशक्तियों ने शिवगणों की सेना के साथ दक्ष के यज्ञ मंडप पर आक्रामण कर दिया।

मां भद्राकाली ने अपनी संहारक शक्ति से वहां मौजूद आसुरी तत्वों और दिशाओं को भयभीत कर दिया। जबकि वीरभद्र ने भगवान विष्णु के सुदर्शन चक्र के वेग को भी रोक दिया (जिसका उल्लेख ललितापाख्यान में भी देखने को मिलता है) और आखिर में प्रजापति दक्ष का सिर काटकर यज्ञ कुंड में डाल दिया। इसके बाद ब्रह्मा जी की प्रार्थना पर शिव ने दक्ष को बकरे का सिर लगाकर पुनर्जीवित कर दिया।

पौराणिक और दार्शनिक नजरिए से वीरभद्र और भद्राकाली की उत्पत्ति सिर्फ क्रोध का प्रदर्शन नहीं, बल्कि अंहकार के विनाश और ब्रह्मांडीय संतुलन की पुनर्स्थापना का भी प्रतीक है। आज भी दक्षिण भारत (लेपाक्षी मंदिर) और उत्तर भारत में इन्हें कुलदेवता और रक्षक शक्ति के रूप में पूजा जाता है।

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अस्वीकरण: इस लेख में बताए गए उपाय/लाभ/सलाह और कथन केवल सामान्य सूचना के लिए हैं। दैनिक जागरण यहां इस लेख फीचर में लिखी गई बातों का समर्थन नहीं करता है। इस लेख में निहित जानकारी विभिन्न माध्यमों/ज्योतिषियों/पंचांग/प्रवचनों/मान्यताओं/धर्मग्रंथों/दंतकथाओं से संग्रहित की गई हैं। पाठकों से अनुरोध है कि लेख को अंतिम सत्य अथवा दावा न मानें एवं अपने विवेक का उपयोग करें।