वाराणसी। शहीदाने कर्बला को मुस्लिम बहुत ही सम्मान से याद करते हैं। पैगम्बरे इस्लाम के नवासे हजरत इमाम हुसैन ने इराक के शहर कर्बला में अपने लोगों के बीच हिंदुस्तान जाने की इच्छा जाहिर की थी। अल्लाह को कुछ और ही मंजूर था, शायद हुसैन की हिंदुस्तान जाने की इच्छा इसी वजह से पूरी नहीं हो सकी।

अपने खानदान वालों के साथ इमाम हुसैन जंग में शहीद नहीं हुए होते तो शायद वर्तमान में मजहबे इस्लाम की स्थिति दूसरी होती। तालिबान व अलकायदा आदि संगठन इस्लाम के नाम पर दहशतगर्दी फैलाए हैं। ऐसे को हुसैन से सबक लेना चाहिए। कर्बला में इमाम हुसैन ने नौ मुहर्रम की रात यजीदी सेना से खुदा की इबादत के लिए एक रात की मोहलत मांगी थी। हुसैन के खानदान वालों ने सारी रात जागकर इबादत की। यही वजह है कि शिया हजरात शहादत की पूर्व संध्या पर सारीरात मजलिस-मातम में मशगूल रहते हैं। 10 मुहर्रम को दिन में जंग शुरू हुई। यजीदी सेना लाखों में थी और सामने हुसैनी लश्कर में सिर्फ 72 प्यासे लोग थे। इमाम हुसैन की बहन जैनब के दो छोटे बेटे औन व मोहम्मद, भाई इमाम हसन के बेटे कासिम व युवा बेटे अली अकबर शहीद हुए।

बहादुर भाई हजरत अब्बास ने जंग की इजाजत चाही तो इमाम हुसैन की छोटी बेटी सकीना सूखी मशक लेकर आई और चाचा से पानी लाने का आग्रह किया। हजरत अब्बास ने नहरे फुरात पर हमला करके नहर पर कब्जा करके मशक में पानी भर लिया। वापसी में यजीदी सेना ने भाले से दोनों हाथ काटकर पानी भरे मशक में तीर से सुराख किया। हजरत अब्बास वहीं गिरकर शहीद हो गए। अब सिर्फ इमाम हुसैन के छह माह के बच्चे हजरत अली असगर बचे थे। अपने मासूम बच्चे को लेकर यजीदी फौज के पास आए और कहा कि बच्चा प्यासा है किसी भी धर्म में बेगुनाह माना जाता है। इस बात का यजीदियों पर कोई असर नहीं हुआ। इस बीच यजीदी सेनापति उमर इबने साद ने हुरमुला को इशारा किया, उसने तीर से बच्चे को शहीद कर दिया। इमाम हुसैन को 10 मुहर्रम 61 हिजरी (वर्तमान 1435 हिजरी) को मुहर्रम के तीसरे पहर नमाज में सजदे के दौरान तलवार से इमाम हुसैन का सर धड़ से अलग करके शहीद कर दिया।

दहकते अंगारों को पैरों से राख में किया तब्दील-

इमाम हुसैन के भतीजे हजरत कासिम की याद में 9वीं मुहर्रम गुरुवार की रात 11.30 बजे शिवाला इमामबाड़ा से विश्व प्रसिद्ध दूल्हा का जुलूस निकला। दूल्हा बनने से पहले परंपरा निभाते हुए व्यक्ति ने शिवाला घाट पर गंगा स्नान किया। या हुसैन, या हुसैन, नार-ए-तकबीर अल्लाहो अकबर की सदा के साथ काफी गहमा-गहमी के बाद दूल्हा को इमामबाड़ा से बाहर लाया गया। रिक्शे पर ध्वनि विस्तारक यंत्र से दो व्यक्ति जुलूस संचालित कर रहे थे। शिवाला में कई स्थानों पर लगे अलाव पर कूदते हुए जुलूस में शामिल लोग 72 अलाव पर कूदेंगे। प्रत्येक अलाव में 10 मन लकड़ी जलाई गई थी। रास्ते के दोनों ओर घरों की छतों, बरामदे व खिड़कियों पर महिलाएं जुलूस को देख रही थीं। जुलूस के आगे-पीछे पुलिस चल रही थी।

इमामचौकों पर बैठाए गए ताजिये-

शहीदाने कर्बला की याद में 9 मुहर्रम गुरुवार की शाम से रात तक लगभग सभी इमामचौकों पर या हुसैन की सदा के साथ सुन्नी हजरात ने ताजिये बैठा दिए। हालांकि परंपरा को निभाते हुए चंद इमामचौकों पर दो दिन पहले ही ताजिये बैठाए गए।

कुछ ताजिये तो इतने आकर्षक हैं कि निगाह पड़ने पर लोग बारीक कारीगरी को निहारकर वाह-वाह कहने को मजबूर हो गए। इनमें छित्तनपुरा में नगीना, माताकुंड में रांगा, अर्दलीबाजार में जाली, मछरहट्टा फाटक में फूलवाला, बाकराबाद में बुर्राक, नईसड़क में चपरखट, बजरडीहा में शीशा, मदनपुरा में सनई, लल्लापुरा में मोती, दक्षिणी ककरमत्ता के तीनों इमामचौक व हुकुलगंज स्थित इमामचौक पर रखे कागज के ताजिये आदि शामिल हैं। कई स्थानों पर महफिले मीलाद, नातिया कलाम के बाद तबरुक तक्सीम किया गया। प्रत्येक इमामचौक पर बच्चों की संख्या खासी थी।

ग्रामीण क्षेत्रों में रखे गए ताजिये - चिरईगांव सहित सभी ग्रामीण क्षेत्रों में इमामचौकों पर ताजिये बैठाए गए। जाल्हूपुर के पचरांव, उकथी, मुस्तफाबाद व छितौना गांव में इमामचौकों पर ताजिये रखे गए। वहीं चिरईगांव के कमौली उमरहां, दीनापुर, कौरकलां आदि के इमामचौकों पर या हुसैन की सदा के साथ ताजिये बैठाए गए।

आज होंगे ठंडे - नगर के इमामचौकों पर बैठने वाले ताजिये आज यौमें आशूरा (10 मुहर्रम) शुक्त्रवार को विभिन्न स्थानों पर ठंडे किये जाएंगे। इनमें दरगाह फातमान, लाट सरैया इमामबाड़ा के अलावा शिवाला घाट शामिल हैं। सभी ताजिये जुलूस की शक्ल में गंतव्य तक पहुंचेंगे।

युद्धकला कौशल का होगा प्रदर्शन प्राचीन काल में होने वाले युद्धकला कौशल का प्रदर्शन कुछ जुलूस में किया जाएगा। इनमें तलवारबाजी, भाला, लाठी से दुश्मनों पर वार आदि की कला शामिल है।

रखा गया नफ्ल रोजा - नफ्ल रोजा रखने वालों ने पहले दिन मगरिब की अजान के साथ अफ्तार किया। अल-सुबह सहरी खाकर रोजा रखा गया। उलमा का कहना है कि मुहर्रम में 9 व 10 को रोजा रखने का बहुत सवाब हासिल होता है। रोजा रखने वालो में महिलाएं ज्यादा थीं।

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