मातृ नवमी और पितृ दोष का क्या है संबंध? कुंडली के इन भावों से जुड़ा है मातृ ऋण का गहरा ज्योतिषीय कनेक्शन
मातृ नवमी आश्विन कृष्ण नवमी को दिवंगत माताओं और स्त्रियों के श्राद्ध, तर्पण व पिंडदान के लिए समर्पित है। यह ...और पढ़ें

मातृ नवमी पर जानें पितृ दोष और मातृ ऋण का ज्योतिषीय संबंध (Picture Credit: AI Generated)
HighLights
मातृ नवमी दिवंगत माताओं के श्राद्ध और तर्पण हेतु समर्पित।
मातृ-कुल से उत्पन्न पितृ दोष का शमन संभव है।
मातृ ऋण मुक्ति हेतु जीवित माता की सेवा और दान करें।
धर्म डेस्क, नई दिल्ली। पितृ पक्ष की नवमी तिथि को मातृ नवमी के रूप में मनाया जाता है और इस दिन दिवंगत माताओं और मृत स्त्रियों का श्राद्ध होता है। ज्योतिष की मानें तो, इस तिथि को मातृ ऋण और पितृ दोष से जोड़ा जाता है।
ऐसा कहा जाता है कि माता या मातृकुल से जुड़े अधूरे कर्मों, पूर्वजों का अनादर या उपेक्षा करना जैसे काम व्यक्ति के जीवन में विभिन्न रूपों में दिखाई दे सकते हैं जिसकी वजह से पितृदोष और मातृ ऋण लगता है । जन्मकुंडली के चतुर्थ भाव, चंद्रमा और शुक्र को मातृ पक्ष से जुड़े महत्वपूर्ण संकेतक माना जाता है।
ऐसे में मातृ नवमी पर किए जाने वाले तर्पण, दान और सेवा को मातृ ऋण को दूर करने का एक माध्यम माना जाता है। एस्ट्रोपत्री के ज्योतिषी चंद्रेश शर्मा से जानें इससे जुड़ी कुछ बातें।
मातृ नवमी क्यों होती है?
एस्ट्रोपत्री के ज्योतिषी चंद्रेश शर्मा के अनुसार, पितृ पक्ष की आश्विन कृष्ण नवमी को मातृ नवमी कहा जाता है। यह तिथि विशेष रूप से परिवार की दिवंगत माताओं, दादियों, सास और उन समस्त स्त्रियों के श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान के लिए समर्पित है, जिनकी मृत्यु तिथि ज्ञात न हो या जिनकी अकाल मृत्यु हुई हो।
मातृ नवमी और पितृ दोष का संबंध
मातृ-कुल से बनने वाला दोष पितृ दोष केवल पिता या पितृ-वंश के कारण ही नहीं बनता, बल्कि मातृ-कुल (माता, नानी, दादी) की अतृप्त आत्माओं या उनके प्रति किए गए अनादर और उपेक्षा से भी उत्पन्न होता है।
मातृ ऋण को कैसे दूर करें?
मातृ नवमी के दिन यदि कुल-वधुएं या पुत्र अपनी दिवंगत माताओं के नाम से तर्पण, ब्राह्मण व सुहागिनों को भोजन और दान करते हैं, तो मातृ-पक्ष से बनने वाले दोष का पूर्ण शमन होता है।
इस तिथि पर किया गया तर्पण कुल में वंश वृद्धि और मानसिक शांति प्रदान करता है।
कुंडली में मातृ ऋण का निर्माण और ज्योतिषीय संबंध
संबंधित भाव और ग्रह: मातृ ऋण का सीधा संबंध कुंडली के चतुर्थ भाव, चंद्रमा और शुक्र से होता है।
ऋण का कारण: जब पूर्व जन्म में माता या माता तुल्य स्त्रियों का अनादर, कष्ट या उनके कर्तव्यों की उपेक्षा हुई हो, तो जन्मपत्री में मातृ ऋण का निर्माण होता है।
मातृ ऋण और दोष शमन के अचूक उपाय
जीवित माता की सेवा: मातृ ऋण से मुक्ति का सबसे बड़ा उपाय जीवित माता के प्रतिदिन चरण स्पर्श करना और उनका आदर करना है।
दिवंगत माताओं के लिए दान: यदि माता दिवंगत हो चुकी हैं, तो मातृ नवमी पर चांदी, श्वेत वस्त्र, दूध, चावल और खीर का दान करें तथा सुहागिन स्त्रियों को भोजन कराएं।
चंद्रमा और चतुर्थ भाव के उपाय: चतुर्थ भाव और चंद्रमा को बल देने के लिए बहते पानी में चांदी प्रवाहित करना या कनिष्ठिका उंगली में शुद्ध चांदी की अंगूठी धारण करना शुभ माना जाता है।
अगर आप भी मातृ नवमी के दिन दिवंगत माताओं के लिए श्राद्ध जैसे कर्म करते हैं, तो मातृ ऋण से मुक्ति मिलती है।
अस्वीकरण: इस लेख में बताए गए उपाय/लाभ/सलाह और कथन केवल सामान्य सूचना के लिए हैं। दैनिक जागरण यहां इस लेख फीचर में लिखी गई बातों का समर्थन नहीं करता है। इस लेख में निहित जानकारी विभिन्न माध्यमों/ज्योतिषियों/पंचांग/प्रवचनों/मान्यताओं/धर्मग्रंथों/दंतकथाओं से संग्रहित की गई हैं। पाठकों से अनुरोध है कि लेख को अंतिम सत्य अथवा दावा न मानें एवं अपने विवेक का उपयोग करें। दैनिक जागरण अंधविश्वास के खिलाफ है।
