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Mahashivratri 2026: महादेव के विचित्र श्रृंगार में छिपे हैं जीवन के गहरे सूत्र, जानें इनका आध्यात्मिक महत्व

Published: Fri, 13 Feb 2026 12:01 PM (IST)

महाशिवरात्रि पर जानें भगवान शिव के अद्भुत श्रृंगार का असली मतलब। गले में सांप, सिर पर गंगा और शरीर पर ...और पढ़ें

Mahashivratri 2026: क्या है महादेव के श्रृंगार का मलतब (Image Source: Freepik)

Mahashivratri 2026: क्या है महादेव के श्रृंगार का मलतब (Image Source: Freepik)

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धर्म डेस्क, नई दिल्ली। महाशिवरात्रि का पर्व आने वाला है और चारों ओर 'हर-हर महादेव' की गूंज सुनाई देने लगी है। भगवान शिव (Lord Shiva), जिन्हें हम देवों के देव महादेव कहते हैं, उनका स्वरूप अन्य देवताओं से बिलकुल अलग और निराला है। जहां अन्य देव आभूषणों और रेशमी वस्त्रों से सुसज्जित होते हैं। वहीं, शिवजी के शरीर पर भस्म, गले में सांप और सिर पर गंगा की धारा होती है।

क्या आपने कभी सोचा है कि शिवजी का यह 'अजीब' दिखने वाला श्रृंगार हमें क्या संदेश देता है? दरअसल, शिव का हर प्रतीक हमें जीवन जीने की एक गहरी सीख देता है।

शिव के श्रृंगार का गहरा अर्थ

1. मस्तक पर चंद्रमा और गंगा का वास

शिव के मस्तक पर अर्धचंद्र इस बात का प्रतीक है कि उन्होंने 'समय' (काल) को अपने वश में कर रखा है। चंद्रमा मन का कारक भी है, जो यह दर्शाता है कि एक योगी का अपने मन पर पूर्ण नियंत्रण होना चाहिए। वहीं, शिव की जटाओं से बहती गंगा 'ज्ञान' की अविरल धारा का प्रतीक है, जो हमें सिखाती है कि ज्ञान हमेशा बहते रहना चाहिए।

2. गले में लिपटे नागराज

जहरीले सांपों को गले का हार बनाना यह संदेश देता है कि हमें अपने भीतर के 'अहंकार' और 'डर' पर काबू पाना चाहिए। सांप तामसी प्रवृत्ति का प्रतीक है, जिसे शिव ने अपने वश में कर रखा है।

3. शरीर पर भस्म (विभूति)

शिवजी अपने पूरे शरीर पर श्मशान की भस्म मलते हैं। यह श्रृंगार हमें जीवन की नश्वरता की याद दिलाता है। भस्म बताती है कि अंत में यह शरीर मिट्टी (राख) में ही मिल जाएगा, इसलिए सांसारिक मोह-माया में पड़ने के बजाय आत्मा की शुद्धि पर ध्यान देना चाहिए।

Shiva (1)

(Image Source: AI-Gene)

4. तीसरी आंख और नीला कंठ

शिव की तीसरी आंख 'विवेक' और 'अंतर्दृष्टि' का प्रतीक है, जो साधारण आंखों से न दिखने वाले सत्य को देख सकती है। वहीं, उनका नीला कंठ 'नीलकंठ' कहलाता है, क्योंकि उन्होंने दुनिया को बचाने के लिए विष पी लिया था। यह हमें सिखाता है कि बुराई (विष) को अपने भीतर दबाकर समाज को शांति देनी चाहिए।

5. त्रिशूल और डमरू

शिव का त्रिशूल तीन गुणों- सत्व, रज और तम- पर नियंत्रण का प्रतीक है। वहीं, डमरू की ध्वनि ब्रह्मांड के निर्माण और लय को दर्शाती है। यह सिखाता है कि जीवन में संतुलन और संगीत (लय) का होना बहुत जरूरी है।

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अस्वीकरण: इस लेख में बताए गए उपाय/लाभ/सलाह और कथन केवल सामान्य सूचना के लिए हैं। दैनिक जागरण तथा जागरण न्यू मीडिया यहां इस लेख फीचर में लिखी गई बातों का समर्थन नहीं करता है। इस लेख में निहित जानकारी विभिन्न माध्यमों/ज्योतिषियों/पंचांग/प्रवचनों/मान्यताओं/धर्मग्रंथों/दंतकथाओं से संग्रहित की गई हैं। पाठकों से अनुरोध है कि लेख को अंतिम सत्य अथवा दावा न मानें एवं अपने विवेक का उपयोग करें। दैनिक जागरण तथा जागरण न्यू मीडिया अंधविश्वास के खिलाफ है।