अलग अलग तथ्य

जहां इतिहासिक घटनाआें का लेखा जोखा रखने वाली कुछ पुस्तकें कुंभ मेले का इतिहास कम से कम 850 साल पुराना मानती हैं, आैर उनके अनुसार इस महाउत्सव का आरंभ आदि शंकराचार्य के द्वारा किया गया एेसा माना जाता है। वहीं कुछ पौराणिक कथाओं के अनुसार कुंभ की शुरुआत समुद्र मंथन के साथ आदिकाल से ही हो गई थी। इतिहासकार एस बी रॉय की मानें तो एक अनुष्ठानिक नदी स्नान के रूप में कुंभ का आरंभ १०,००० ईसापूर्व कहा जा सकता है। उनका कहना है कि कुंभ ने मेले के मौजूद स्वरूप ने इसी अवधि में लिया था। हालांकि ‘नारद पुराण’ आैर स्कंद पुराण जैसे ग्रंथों में कुंभ मले जैसे आयोजन का जिक्र पुण्यकारी स्नान के उत्सव के रूप में मिलता है।

एेतिहासिक पुस्तकों में कुंभ

सम्राट हर्षवर्धन के राज्यकाल में 629 ई.पू. में  भारत आये चीनी यात्री ‘ह्वेन सांग’ ने  अपनी पुस्तक भारतयात्रा में कुंभ मेले का जिक्र किया है। उसने प्रयाग के एक कुंभ में हर्षवर्धन के शामिल होने की बात कही है। एेसा ही कुछ वर्णन बौद्ध लेखों में 600 ई.पू. का मिलता है। 400ई.पू. का एक वर्णन सम्राट चंद्रगुप्त के काल का भी मिलता है जिसका जिक्र एक यूनानी दूत ने उनके दरबार में किया एेसा माना जाता है। मराठी भाषा की एक अन्य पुस्तक गुरुचरित्र में भी कुंभ का उल्लेख किया गया है। नासिक में हुर्इ एक खुदार्इ के दौरान मिले तामपत्र में भी 1690 में कुंभ होने की बात कही गर्इ है। एस बी रॉय ने ही सबसे पहले अखाड़े के तौर पर अभान नाम का उल्लेख किया है।

क्या हैं अखाड़े

कुंभ मेलों के दौरान सबसे ज्यादा चर्चा अखाड़ों की होती है एेसे में ये जिज्ञासा होनी स्वाभाविक है कि आखिर अखाड़े क्या हैं आैर उनका चलन कैसे आरंभ हुआ। एेसे में प्रयागराज कुंभ मेले 2019 के दौरान उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा उपलब्ध करार्इ जानकारी के अनुसार अखाड़ों के वजूद को सामने लाने का काम भी आदि शंकराचार्य ने ही किया था। उन्होंने साधुओं के संघों को मिलाने का प्रयास करने, सनातन धर्म को मानने वालों को आैर विभिन्न परम्पराओं व विश्वासों का अभ्यास करने वालों को एकजुट करने लिए अखाड़ों की स्थापना का विचार रखा। जिसके फलस्वरूप विभिन्न अखाड़ों का गठन हुआ। इन अखाड़ों के साधु-सन्तों की विशेषता यह होती है कि वे शास्त्र और शस्त्र दोनों में पारंगत होते हैं। मौजूदा अखाड़ों को तीन वर्गों में बांटा जा सकता है, शैव अखाड़े जिनके इष्ट भगवान शिव हैं। वैष्णव अखाड़े इनके इष्ट भगवान विष्णु हैं, आैर उदासीन अखाड़ा जो सिक्ख सम्प्रदाय के आदि गुरु श्री नानकदेव के पुत्र श्री चंद्रदेव जी का प्रवर्तक माना जाता है। ये मुख्य रूप से प्रणव अथवा ‘ॐ’ की उपासना करते हैं।

कैसे काम करते हैं अखाड़े

अखाड़ों की व्यवस्था आैर संचालन पांच लोगों की एक समिति करती है जिसे ब्रह्मा, विष्णु, शिव, गणेश आैर शक्ति का प्रतीक माना जाता है। वर्तमान अखाड़ों में संख्या के हिसाब से सबसे बड़ा अखाड़ा, जूना अखाड़ा है दूसरे स्थान पर निरञ्जनी और तीसरे स्थान पर महानिर्वाणी अखाड़ा है। इनके अध्यक्ष श्री महंत तथा अखाड़ों के प्रमुख आचार्य महामण्डेलेश्वर के रुप में जाने जाते हैं। महामण्डलेश्वर ही अखाड़े में आने वाले साधुओं को गुरु मन्त्र भी देते हैं। पेशवाई या शाही स्नान के समय में निकलने वाले जुलूस में आचार्य महामण्डलेश्वर और श्रीमहंत रथों पर सवार होते हैं, उनके सचिव हाथी पर, घुड़सवार नागा अपने घोड़ों पर तथा अन्य साधु पैदल चलते हैं।

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